ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६० [चौथी पञ्चिका दिशा और दो से इस लोक में प्रतिष्ठा । जो इस रहस्य को समझता है वह इस बृहती के द्वारा अपनी सब कामनायें पूरी कर लेता है । (२) २५—यह जो द्वादशाह है वह प्रजापति यज्ञ है। प्रजापति ने पहले यही द्वादशाह यज्ञ किया था। उसने ऋतुओं और महीनों से कहा, "तुम मुझसे द्वादशाह कराओ।" उन्होंने उसे दीक्षा दी और परिक्रमा कराते हुये ऐसा कर दिया कि वहाँ से जाने न पावे । तब उससे कहा, "पहले हमको दिलवाओ । तब यज्ञ करायेंगे"। उसने उनको अन्न (इषं) और रस (ऊज) दिया । वही रस ऋतुओं और महीनों में निर्धारित है। उसने दिया तब उन्होंने यज्ञ कराया । इसलिए जो आदमी कुछ दे सकता है वही यज्ञ भी कर सकता है । उससे लेकर उन्होंने यज्ञ कराया । इसलिये लेकर ही यज्ञ कराना चाहिये । इस प्रकार दोनों समृद्धि को प्राप्त होते हैं, वह भी जो इस रहस्य को समझ कर दूसरों को यज्ञ कराते हैं और वह भी जो अपने लिये यज्ञ कराते हैं । ऋतुओं और महीनों ने द्वादशाह में दक्षिणा पाकर अपने को आभारी अनुभव किया (अर्थात् हमारे ऊपर बोझ चढ़ गया ) उन्होंने प्रजापति से कहा, "द्वादशाह यज्ञ हमको भी कराओ" । वह मान गया । उसने कहा, "दीक्षित हो" । पूर्वपक्षों (शुक्ल पक्ष) ने पहले दीक्षा ली और उनका पाप छूट गया । इस लिए वे दिन के समान रोशनी में रहते हैं। जिनका पाप छूट जाता है वह मानो रोशनी में ही रहते हैं । दूसरे पक्षों ने फिर दीक्षा ली । परन्तु वे सब पापों को न छोड़ सके । जिनके पाप नहीं छूटते वे अंधकार में रहते हैं । इस लिए जो इस रहस्य को समझता है उसे पहले दीक्षा