भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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२६२ [ चौथी पञ्चिका (तीन दिन) निचला है (अर्थात् प्रातः से सायं तक छन्दों के अक्षर घटते रहते हैं)। पहला त्र्यह ऊर्ध्व है। इस लिये अग्नि ऊपर को जाती है। ऊपर की दिशा अग्नि की है। दूसरा त्र्यह तिर्यक् है इसलिये वायु तिर्यक् चलता है और पानी तिर्यक् बहता है। यह उसकी दिशा है। पिछला त्र्यह निचला है। इसलिए सूर्य नीचे को तपता है। मेंह नीचे को बरसता है और नक्षत्र रोशनी नीचे को फेंकते हैं, यह उसकी दिशा है। यह तीनों लोक मिले जुले हैं। यह तीन त्र्यह भी मिले जुले हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसके लिये यह तीनों लोक समृद्धि प्रदान करते हैं। (३) २६—दीक्षा देवों से चली गई। उन्होंने इसे वसन्त के दो महीनों में घेर दिया। वे उसे इन दो वसन्त के महीनों से निकाल न सके। तब उन्होंने उसे ग्रीष्म, बरसात, शरद्, हेमन्त के दो दो महीनों में घेरा। वे उसको हेमन्त के दो महीनों में से न निकाल सके। तब उन्होंने उसे दो शिशिर के महीनों में घेर लिया। उन्होंने उसको इन महीनों से निकाल लिया। जो इस रहस्य को समझता है वह सब इच्छाओं की पूर्ति कर लेता है और उसका शत्रु उसको पा नहीं सकता। इसलिए जो क्षत्रिय दीक्षा ले, वह इन दो शिशिर के महीनों में ले। इस प्रकार उसे उस समय दीक्षा मिलती है जब दीक्षा साक्षात् होती है। और वह दीक्षा को प्रत्यक्ष रूप से ग्रहण कर लेता है। इन शिशिर के महीनों में दीक्षा क्यों ले? इसका कारण यह कि इन दो महीनों में गाँव के और जंगल के सभी पशु बहुत दुबले हो जाते हैं और उनकी हड्डियां निकल आती हैं