भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 277

चौथा अध्याय ] २६३ और उनका दीक्षा का सा रूप हो जाता है । ( अर्थात् यजमान को दीक्षा में उपवास करके दुबला हो जाना चाहिये ) । दीक्षा से पहले वह प्रजापति के लिये पशु का आलभन करता है, इसके लिए १७ सामधेनियों का पाठ करना चाहिये । क्योंकि प्रजापति १७ भागों वाला है। यह प्रजापति तक पहुँचने के लिए है। इसके आप्रि मन्त्र जामदग्नि के मंत्र हैं। इस पर प्रश्न उठता है कि अन्य पशुयागों में तो वही आप्रिमंत्र पढ़े जाते हैं जो उन उन यजमानों के गोत्र वाले ऋषियों के हों। फिर इस प्रजापति यज्ञ में सब लोग जमदग्नि के ही मंत्र क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर यह है कि जमदग्नि के मंत्र सर्वरूप और सर्वसमृद्ध हैं। और यह पशु भी सर्वरूप और सर्व समृद्ध है। जमदग्नि के मन्त्र इस लिए पढ़े जाते हैं कि सर्वरूपता और सर्व-समृद्धता प्राप्त हो जाय । इस पशु का पुरोडाश वायु का है। इस पर प्रश्न उठाते हैं कि जब पशु दूसरे देवता (अर्थात् प्रजापति) का है तो पुरोडाश वायु का क्यों देते हैं ? इसका उत्तर यह है कि यज्ञ प्रजापति है। यज्ञ को विना भूल के समाप्त करने के लिए ( वायु का पुरोडाश होता है ) । यद्यपि वायु का पुरोडाश है तथापि इसका यह अर्थ नहीं कि यह प्रजापति का नहीं है। क्योंकि वायु ही प्रजापति है। मंत्र में ऋषि ने कहा है— पवमानः प्रजापतिः । ( ऋ० ६।५।६ ) अर्थात् प्रजापति वह है जो बहता है अर्थात् वायु । यदि ( द्वादशाह ) सत्र के रूप में किया जाय तो यजमानों को अपनी सब अग्नियां इकट्ठी कर लेनी चाहियें और उनमें यज्ञ करना चाहिये। सबको दीक्षा लेनी चाहिये और सब को