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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

चौथा अध्याय ] २६३ और उनका दीक्षा का सा रूप हो जाता है । ( अर्थात् यजमान को दीक्षा में उपवास करके दुबला हो जाना चाहिये ) । दीक्षा से पहले वह प्रजापति के लिये पशु का आलभन करता है, इसके लिए १७ सामधेनियों का पाठ करना चाहिये । क्योंकि प्रजापति १७ भागों वाला है। यह प्रजापति तक पहुँचने के लिए है। इसके आप्रि मन्त्र जामदग्नि के मंत्र हैं। इस पर प्रश्न उठता है कि अन्य पशुयागों में तो वही आप्रिमंत्र पढ़े जाते हैं जो उन उन यजमानों के गोत्र वाले ऋषियों के हों। फिर इस प्रजापति यज्ञ में सब लोग जमदग्नि के ही मंत्र क्यों पढ़ते हैं। इसका उत्तर यह है कि जमदग्नि के मंत्र सर्वरूप और सर्वसमृद्ध हैं। और यह पशु भी सर्वरूप और सर्व समृद्ध है। जमदग्नि के मन्त्र इस लिए पढ़े जाते हैं कि सर्वरूपता और सर्व-समृद्धता प्राप्त हो जाय । इस पशु का पुरोडाश वायु का है। इस पर प्रश्न उठाते हैं कि जब पशु दूसरे देवता (अर्थात् प्रजापति) का है तो पुरोडाश वायु का क्यों देते हैं ? इसका उत्तर यह है कि यज्ञ प्रजापति है। यज्ञ को विना भूल के समाप्त करने के लिए ( वायु का पुरोडाश होता है ) । यद्यपि वायु का पुरोडाश है तथापि इसका यह अर्थ नहीं कि यह प्रजापति का नहीं है। क्योंकि वायु ही प्रजापति है। मंत्र में ऋषि ने कहा है— पवमानः प्रजापतिः । ( ऋ० ६।५।६ ) अर्थात् प्रजापति वह है जो बहता है अर्थात् वायु । यदि ( द्वादशाह ) सत्र के रूप में किया जाय तो यजमानों को अपनी सब अग्नियां इकट्ठी कर लेनी चाहियें और उनमें यज्ञ करना चाहिये। सबको दीक्षा लेनी चाहिये और सब को

२६४ [चौथी पञ्चिका सोम बनाना चाहिये । ( सूत्र में सब १६ ऋत्विज् यजमान बन कर एक दूसरे के लिए यज्ञ करते हैं ) । वसन्त में समाप्त करता है । वसन्त रस है । ऐसा करने से वह यज्ञ की समाप्ति रस से करता है । (४) २७—छन्दों ने एक दूसरे का स्थान लेना चाहा । गायत्री ने त्रिष्टुभ् और जगती का स्थान लेना चाहा । त्रिष्टुभ् ने गायत्री और जगती का । और जगती ने गायत्री और त्रिष्टुभ् का । प्रजापति ने देखा कि यह द्वादशाह व्यूळ्हच्छंदस ( तितर बितर ) हो गया । उसने इसे लिया और इससे यज्ञ किया । इस प्रकार छन्दों की कामनायें पूरी हुई । जो इस रहस्य को समझता है उसकी कामनायें पूरी हो जाती हैं । छन्दों को उनकी जगह से हटाता है जिससे यज्ञ में कोई त्रुटि न हो । जैसे कोई दूर की यात्रा करने में मंजिल मंजिल पर नये घोड़ों या बैलों को जोतता है जो थके न हों, उसी प्रकार स्वर्ग की यात्रा करने के लिये यह ताज़ा ताज़ा छन्दों का प्रयोग करता है जो थक न गये हों । छन्दों की जगह बदलने का यही प्रयोजन है । यह दोनों लोक पहले मिले थे । फिर अलग हो गये । इससे न वर्षा हुई, न सूरज तपा । पंचजन मेल से न रहे । देवों ने इन लोकों को मिला दिया, इन दोनों ने देवरीति से एक दूसरे के साथ विवाह कर लिया । रथंतर से पृथ्वी स्वर्ग से जुड़ी है और बृहत्-साम से स्वर्ग पृथ्वी से । नौधस साम के द्वारा पृथ्वी स्वर्ग से जुड़ी है । और श्यैत साम द्वारा स्वर्ग पृथ्वी से । धुयें के द्वारा पृथ्वी स्वर्ग से जुड़ी है और वर्षा के द्वारा स्वर्ग पृथ्वी से जुड़ा है । पृथ्वी ने स्वर्ग में देवयजन अर्थात् देवों के यज्ञ के लिये स्थान बनाया और स्वर्ग ने पृथ्वी में पशु बनाये ।

चौथा अध्याय ] २६५ यह जो पृथिवी ने स्वर्ग में देवयजन बनाया यह चन्द्रमा का काला दाग है। इसलिये शुक्ल पक्षों में यज्ञ करते हैं जिससे चन्द्रमा का काला दाग प्राप्त हो जाय । स्वर्ग ने पृथिवी में चरने के लिये ऊपा (चरागाह) बनाई। तुरः काविषेय ने कहा “हे जनमेजय, पोष क्या और ऊपा क्या ?” इसीलिए गव्य अर्थात् गाय के दूध आदि की चिन्ता करने वाले पूछा करते हैं “क्या वहां ऊपा अर्थात् चरने के लिये स्थान है ?” क्योंकि ऊपा ही चारा है। वह लोक इस लोक की ओर झुक गया। इससे द्यौ और पृथिवी हो गये। न अन्तरिक्ष से द्यौ हुआ, न अन्तरिक्ष से पृथिवी । (५) २८—पहले बृहत् और रथंतर थे। उनसे वाणी और मन हुये। रथंतर वाणी है और बृहत् मन । बृहत् पहले हुआ इस लिये उसने रथंतर को कम समझा। रथंतर ने अपने में गर्भ धारण किया और वैरूप उत्पन्न किया। रथंतर और वैरूप मिल गये और बृहत् को कम समझने लगे। बृहत् ने अपने में गर्भ धारण किया और उससे वैराज पैदा हुआ। यह दोनों बृहत् और वैराज मिल गये और रथंतर और वैरूप को कम समझने लगे । रथन्तर ने तब अपने में गर्भ स्थापित किया और शक्कर का जन्म हुआ। इन तीनों अर्थात् रथंतर, वैरूप और शक्कर ने बृहत् और वैराज को कम समझा। बृहत् ने तब अपने में गर्भ स्थापित किया और रैवत का जन्म हुआ। हर पक्ष के तीन तीन साम छः पृष्ठ हो गये (अर्थात् रथंतर, वैरूप, शक्कर एक ओर और बृहत्, वैराज और रैवत दूसरी ओर)। इस पर तीनों छन्द (गायत्री, त्रिष्टुभ् और जगती) इन छः पृष्ठों को न पा सके। गायत्री ने गर्भ धारण किया और

२६६ [ चौथी पञ्चिका अनुष्टुभ् उत्पन्न हुआ। त्रिष्टुभ् ने गर्भ धारण किया और पंक्ति हुई। जगती ने गर्भ धारण किया और अतिच्छन्दस् हुआ। यह तीन छन्द जब छः हो गये तो वे ६ पृष्ठों को पा सके। जो इन छन्दों और पृष्ठों की उत्पत्ति के रहस्य को समझ कर इस अवसर पर दीक्षा लेता है उसके लिये और उसके प्रिय जनों के ( जनता के ) लिये यज्ञ कल्याणकारी होता है। (६) ऐतरेय ब्राह्मण की चौथी पञ्चिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ।

पाँचवाँ अध्याय २९—पहले दिन का देवता अग्नि है। स्तोम त्रिवृत् है, साम रथंतर है और छन्द गायत्री है। जो समझता है कि देवता कौन है वह सफल हो जाता है । ‘आ’ और ‘प्र’ पहले दिन के रूप (विशेषतायें) हैं। प्रथम दिन की विशेषतायें यह भी हैं :— ‘युक्त’, ‘रथ’, ‘आशु’, ‘पिव’ यह शब्द अवश्य आयेंगे । मन्त्रों के पहले पाद में देवताओं का स्पष्ट नाम होगा । इस लोक अर्थात् पृथ्वी के विषय में कुछ होगा । रथंतर के समान साम होंगे । गायत्री के लगभग छन्द होगा । और ‘कृ’ धातु का भविष्यकाल का कोई रूप होगा । पहले दिन का आज्य सूक्त यह है :— उपप्रयन्तो अध्वरं ( ऋ० १।७४।१ ) क्योंकि इस में ‘प्र’ आया है । ‘प्र’ पहले दिन का रूप (विशेषता) है । प्रउग शस्त्र है “वायवायाहि दर्शत” ( ऋ० १।२।१-३ ) क्योंकि इसमें ‘आ’ आया है । ‘आ’ पहले दिन का रूप है । ( २६७ )

ब्राह्मणास्पत्य प्रगाथ यह है :-

२६८ [ चौथी पञ्चिका मरुत्वती शस्त्र का प्रतिपद् या पहला भाग यह है : आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि । तुवि कूर्मिमृतीष हर्मीन्द्र शविष्ठ सत्पते ॥ तुवि शुष्म तुविक्क्रतो शचीवो विश्वया मते । आ पप्राथ महित्वना ॥ यस्य ते महिना महः परि ज्मायन्तम्रीयतुः । हस्ता वज्रं हिरण्ययम् ॥ ( ऋ० ८।६८।१-३ ) इसका अनुचर या पिछला भाग यह है :- इदं वसो सुतमन्धः पिवा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन् ररिमा ते ॥ नृभिर्धूतः सुतो अश्नैरव्यो वारैः परिपूतः । अश्वो न निक्तो नदीषु ॥ तं ते यवं यथा गोभिः स्वादुमक्रम श्रीणन्तः । इन्द्र त्वा- स्मिन्त्सधमादे ॥ ( ऋ० ८।२।१-३ ) इनमें 'रथ' और 'पिव' आये हैं। यह पहले दिन का रूप है। इन्द्र-निहव प्रगाथ यह है :- इन्द्र नेदीय एदिहि मितमेधाभिरूतिभिः । आ शन्तम शन्तमाभिर- भिष्टिभिरा स्वापे स्वापिभिः ॥ आजितुरं सत्पतिं विश्वचर्षणिं कृधि प्रजास्वाभगम् । प्र सू तिरा शचीभिर्ये त उक्थिनः ऋतुं पुनत आनुषक् ॥ ( ऋ० ८।५३।५, ६ ) इसके पहले पद में देवता का वर्णन है। यह पहले दिन का रूप है। ब्राह्मणास्पत्य प्रगाथ यह है :- प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्रदेव्येतु सूनृता । अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥ यो वाघते ददाति सूनरं वसु स धत्ते अक्षिति श्रवः ! तस्मा इडां सुवीरामा यजामहे सुप्रतूर्तिमनेहसम् ॥ ( ऋ० १-४०।३-४ ) इसमें 'प्र' आया है। यह पहले दिन का रूप है। यह धाय्य यह है:- अग्निर्नैता, त्वं सोमऋतुभिः, पिन्वंत्यपः ॥ (ऐतरेय ब्राह्मण ३।१८)

पाँचवाँ अध्याय ] २६९ इनके पहले पाद में देवतों का नाम आया है । यह पहले दिन का रूप है । मरुत्वतीय प्रगाथ यह है:— प्र व इन्द्राय बृहते मरुतो ब्रह्मार्चत । वृत्रं हनति वृत्रहा शतक्रतुर्वज्रेण शतपर्वणा ॥ अभि प्र भर धृषता धृषन्मनः श्रवश्चित्ते असद् बृहत् । अर्षन्त्वापो जवसा वि मातरो हनो वृत्रं जया स्वः॥ (ऋ० ८।८६।३-४) इसमें 'प्र' आया है । यह पहले दिन का रूप है । निविद् सूक्त यह है:— आ यात्विन्द्रो वस उप न इह..........इत्यादि । (ऋ० ४।२१) इसमें 'आ' है, यह पहले दिन का रूप है । रथतंतर पृष्ठ यह है :— अभि त्वा शूर नोनुमोऽदुग्धा इव धेनवः । ईशानमस्य जगतः स्वदृशमीशानमिन्द्र तस्थुषः ॥ न त्वावाँ अन्यो दिव्यो न पार्थिवो न जातो न जनिष्यते । अश्वायन्तो मघवन्निन्द्र वाजिनो गव्यन्तस्त्वा हवामहे ॥ (ऋ० ७।३२।२२-२३) अभित्वा पूर्वपीतय इन्द्रस्तोमेभिरायवः । समीचीनास ऋभवः समस्वरन् रुद्रा गृणन्त पूर्व्यम् ॥ अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्यं शवो मदे सुतस्य विष्णवि । अद्या तमस्य महिमानमायवोऽनुष्टुवन्ति पूर्वथा ॥ (ऋ० ८।३।७-८) यह रथंतर पृष्ठ है, यह पहले दिन का रूप है । धाय्य यह है :— “यद् वावानपुरुतमं पुराषाड्” । (ऐतरेय ब्रा० ३।२२) इसमें 'आ' आया है । यह पहले दिन का रूप है । साम प्रगाथ यह है :— पिबा सुतस्य रसिनो मत्स्वा न इन्द्र गोमतः । आपिनो बोधि सधमाद्यो वृधे३ऽस्माँ अवन्तु ते धियः ॥

२७० [ चौथी पञ्चिका भूयाम ते सुमतौ वाजिनो वयं मा नः स्तरभिमातये । अस्माञ् चित्राभिरवतादभिष्टिभिरा नः सुम्नेषु यामय ॥ (ऋ० ८।३१-२ ) इसमें 'पिव' शब्द आया है। यह पहले दिन का रूप है। तात्पर्य्य यह है :- त्यमूषु वाजिनं देवजूतम् । यह निविद् सूक्त के पहले पढ़ा जाता है। तात्पर्य कल्याण के लिये है। जो इस रहस्य को समझता है, उसका मार्ग कल्याणयुक्त हो जाता है और अपने साल को कल्याण से व्यतीत करता है। (१) ३०- ( निष्केवल्य शस्त्र का निविद् ) सूक्त यह है:- आ न इन्द्रो दूरादान आसात् । इत्यादि (ऋ० ४।२० ) इसमें 'आ' आया है। यह पहले दिन का रूप है। निष्केवल्य और मरुत्वतीय शस्त्रों के निविद् संपात कहलाते हैं। वामदेव ने इन तीनों लोकों को देखकर इन्हीं संपातों द्वारा उनको प्राप्त किया। ('संपतत्' = प्राप्त हुआ, से संपात बन गया )। इसीलिए इनका नाम संपात हो गया। पहले दिन संपात इसलिए पढ़े जाते हैं कि स्वर्गलोक तक पहुँच जायें। उसे प्राप्त कर लें और वहां की संगति का लाभ हो। पहले दिन अर्थात् रथंतर दिन के वैश्वदेव शस्त्र का 'प्रतिपद्' अर्थात् शुरू यह है:- तत् सवितुर्वृणीमहे वयं देवस्य भोजनम् । श्रेष्ठं सर्वधातमं तुरं भगस्य धीमहि ॥ अस्य हि स्वयशस्तरं सवितुः कच्चन प्रियम् । न मिनन्ति स्वराज्यम् ॥ स हि रत्नानि दाशुषे सुवाति सविता भगः । तं भागं चित्रमीमहे ॥ (ऋ० ५।८२।१-३ ) इसका 'अनुचर' ( पिछला भाग ) यह है :-

पाँचवाँ अध्याय ] २७९ अद्या नो देव सवितः प्रजावत् सावीः सौभगम् । परा दुःष्वप्न्यं सुव ॥ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥ अनागसो अदितये देवस्यसवितुः सवे । विश्वा वामानि धीमहि ॥ ( ऋ० ५।८२।४-६ ) यह रथंतर दिन का है। यही पहले दिन का रूप है। सविता का निविद् सूक्त है "युंजते मन उत" (ऋ० ५।८१) इसमें 'युज' शब्द पड़ा है। यह पहले दिन का रूप है। द्यावा पृथिवी का निविद् सूक्त "प्र द्यावा यज्ञैः" (ऋ० १।१५९) है। इसमें 'प्र' शब्द आया है। यह पहले दिन का रूप है। ऋभुओं का निविद् सूक्त "इहे ह वो मनसा" (ऋ० ३।६०) है। अगर इनमें 'प्र' और 'आ' होता तो 'प्रा' हो जाता। जिसका अर्थ है 'जाना'। और यजमान इस संसार से चल बसता। इसलिए 'इहे ह वो मनसा' सूक्त पढ़ते हैं। इसमें पहले दिन का रूप नहीं आता। (इस सूक्त में) 'इह' का अर्थ है 'यह लोक'। इस प्रकार यजमान इस लोक को भोगता है। वैश्वदेव का निविद् सूक्त है:— देवान् हुवे बृहच्छ्रवसः स्वस्तय इति (ऋ० १०।६६) इसके पहले पद में 'देवतों' का वर्णन है। यह पहले दिन का रूप है। जो लोग संवत्सर या द्वादशाह को करते हैं वे बड़ी लम्बी लम्बी यात्रा पर जाते हैं। इस लिये वैश्वदेवों का जो ऊपर दिया हुआ निविद् सूक्त (देवान् हुवे...) पढ़ा जाता है यह यात्रा के लिए। जो इस रहस्य को समझता है उसका कल्याण होता है और वह अपने साल को अच्छी तरह पार कर लेता है। और जो लोग इस रहस्य को समझ कर होता से इस वैश्वदेव निविद् को पढ़ाते हैं उनका भी कल्याण होता है।

२७२ [चौथी पञ्चिका अग्निमारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :— वैश्वानराय पृथु पाजसे विप इति ( ऋ० ३।३ ) इसके पहले पद में देवता का उल्लेख है। यह पहले दिन का रूप है । मरुतों का निविद यह है :— “प्रत्वक्षसः प्रतवसोविरप्शिन” इति ( ऋ० १।८७ ) इसमें ‘प्र’ आया है। यह पहले दिन का रूप है। जातवेद सूक्त के पहले यह मंत्र पढ़ना है :— जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो नि दहाति वेदः। स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः। ( ऋ० १।९६।१ ) यह जातवेद मंत्र कल्याण मार्ग के कल्याण के लिये पढ़ा जाता है। इससे यजमान को कल्याण मिलता है। जो इस रहस्य को समझता है उसका साल कल्याण पूर्वक व्यतीत हो जाता है। जातवेद का निविद सूक्त है :— प्रतव्यसीं नव्यसीं...इति ( ऋ० १।१४३ ) इसमें ‘प्र’ आया है। यह पहले दिन का रूप है। द्वादशाह के पहले दिन का अग्निमारुत शस्त्र वही है जो अग्निष्टोम का । जो यज्ञ में समान किया जाता है उसी पर प्रजा जीती हैं इस लिए अग्निमारुत शस्त्र वही होता है। (२) ३१—दूसरे दिन का देवता इन्द्र है। पंचदश स्तोम है। बृहत् साम है और त्रिष्टुभ् छन्द है। जो यह जानता है कि कौन सा देवता है, कौन सा स्तोम है, कौ न सा साम है और कौन सा छन्द है, वह सफल हो जाता है । दूसरे दिन ‘प्र’ और ‘आ’ नहीं आते। दूसरे दिन का रूप है ‘स्थ’।

पाँचवाँ अध्याय ] २७६ ऊर्ध्व, प्रति, अंतः, वृषण्, वृधन् यह शब्द तथा दूसरे पदों में देवतों का स्पष्ट उल्लेख, अन्तरिक्ष की ओर संकेत. बृहत् साम और त्रिष्टुभ् छन्द और वर्तमानकाल । यह दूसरे दिन के रूप अर्थात् विशेषतायें हैं । दूसरे दिन का आज्य सूक्त यह है :- अग्निं दूतं वृणीमहे...... (ऋ० १।१२ ) इसमें ‘वृणीमहे’ यह वर्तमानकाल आया है । यह दूसरे दिन का रूप है । प्रउग शस्त्र यह है :- वायो ये ते सहस्रिणः ( ऋ० २।४१ ) इसमें ‘अयं वा मित्रावरुणा सुतः सोमऋतावृधा’ (२।४१।४) में 'वृधन्' शब्द आ गया । यह दूसरे दिन का रूप है । मरुत्वतीय शस्त्र का प्रतिपद् यह है :- विश्वानरस्य वस्पति मनानतस्य शवसः । एवैश्च चर्षणीनामूती हुवे रथानाम् ॥ अभिष्टये सदावृधं स्वमी॑डेहेषु यं नरः । नाना हवन्त ऊतये ॥ परोमात्रमृचीषममिन्द्रमुग्रं सुराधसम् । ईशानं चिद् वसूनाम् ॥ ( ऋ० ८।६८।४-६ ) इसका अनुचर यह है :- इन्द्र इत् सोमपा एक इन्द्रः सुतपा विश्वायुः । अन्तर्देवान्मत्र्याँ अ । न यं शुक्नो न दुराशीर्न तृप्रा उरुव्यचसम् । अपस्पृण्वते सुहार्दम् ॥ गोभिर्यदीमन्वे अस्मन्मृगं न व्रा मृगयन्ते । अमत्सिरन्ति धेनुभिः ॥ ( ऋ० ८।२।४-६ ) इनमें 'वृधन्' और 'अन्तः' शब्द आये हैं । यह दूसरे दिन का रूप हैं। इन्द्र-निह्वव प्रगाथ वही रहता है । "इन्द्र नेदीय एदिहि" । ( ऋ० ८।५३।५-६ ) १८

२७४ [ चौथी पञ्चिका ब्रह्मणस्पति का प्रगाथ यह है "उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते" । इसमें “उत्तिष्ठ” (उत्) शब्द ऊर्ध्व के अर्थ में है । यह दूसरे दिन का रूप है। धाय्य वही हैं :- अग्निर्नैता, त्वं सोम ऋतुभिः, पिन्वन्त्यपः । (ऐतरेय ब्रा० ३।१८) मरुत्वतीय प्रगाथ यह है :- बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम् । येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो देवं देवाय जागृवि ।। अपाधमत्तमिश्रस्तिरस्तिहाऽथेन्द्रो द्युभ्यामभवत् । देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे बृहद् भानो मरुद्गणं ॥ ( ऋ० ८।८६।१-२ ) इसमें 'ऋतावृधः' शब्द में 'वृधन्' शब्द आ गया । यही दूसरे दिन का रूप है। मरुत्वतीय शस्त्र का निविद् सूक्त यह है :- इन्द्र सोमं सोमपते.........( ऋ० ३।३२ ) इसमें 'आवृषस्व' में वृषन् शब्द आया है । [गवाशिरं...... तृपदा वृषस्वा ३।३२।२] यह दूसरे दिन का रूप है। बृहत् पृष्ठ यह है :- त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः । त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठा स्वर्वतः ॥ स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया महः स्तवानो अद्रिवः । गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे ।। ( ऋ० ६।४६।१-२ ) त्वं ह्येहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये । उद्वावृषस्व मघवन् गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये ॥ त्वं पुरु सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय मंहसे । आ पुरन्दरं चकृम विप्रवचस इन्द्रं गायन्तोऽवसे ।। ( ऋ० ८।६१।७-८ ) यह बार्हत दिन का होता है। यह दूसरे दिन का रूप है। निष्केवल्य शस्त्र की धाय्या वही है-

प्रथमो नि षीदसि सोमकामं हि ते मनः॥ ( ऋ० ८।६१।१-२ )

पाँचवाँ अध्याय ] २७५ “यद् वावान्” । साम प्रगाथ है :— उभयं शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः । सत्राच्या मघवा सोमपीतये धिया शविष्ठ आ गमत् ॥ तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः । उतोपमानां प्रथमो नि षीदसि सोमकामं हि ते मनः॥ ( ऋ० ८।६१।१-२ ) उभय का अर्थ है जो आज है और जो कल था । यह बृहत् साम का है। यह दूसरे दिन का रूप है। तार्क्ष्य वही है:— “त्यमूषु वाजिनं देवजूतम् ॥” ( ३ ) ३२—निष्केवल्य शस्त्र का निविद् है :— यां त ऊतिरवमा या परमा...(ऋ० ६।२५) इसमें “वृष्ण्यानि” शब्द आया है । 'वृषन्' दूसरे दिन का रूप है । वैश्वदेवशस्त्र का प्रतिपद् यह है :— विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरीत सख्यम् । विश्वो राय इषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे ॥ ( ऋ० ५।५०।१ ) तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ देवस्य सवितुर्वयं वाजयनतः पुरन्ध्या । भगस्य रातिमीमहे ॥ ( ऋ० ३।६२।१०-११ ) इसके अनुचर यह हैं :— आ विश्वदेवं सत्पतिं सूक्तैरद्या वृणीमहे । सत्यसवं सवितारम् ॥ य इमे उभे अहनी पुर एत्यप्रयुच्छन् । स्वाधीर्देवः सविता ॥ य इम विश्वा जातान्याश्रावयति श्लोकेन । प्र च सुवाति सविता ॥ ( ऋ० ५।८२।७-९ ) यह बृहत् दिन या दूसरे दिन के हैं। दूसरा दिन का यही रूप है। सविता का निविद् सूक्त यह है :—

२७६ [ चौथी पञ्चिका उदुष्य देवः सविता हिरण्यया......... (ऋ० ६।७१) इसमें उत् शब्द ऊर्ध्व का सार्थक है। यह दूसरे दिन का रूप है। द्यावापृथिवी का निविद् सूक्त यह है :— "ते हि द्यावा पृथिवी विश्वशंभुव" (ऋ० १।१६०) इसमें 'अन्तः' शब्द आया है। यह दूसरे दिन का रूप है। ऋभुओं का निविद् सूक्त यह है :— तक्षन् रथं सुवृतं विद्मनापस...... (ऋ० १।१११) इस सूक्त में :— "तक्षन् हरी इंद्रवाहा वृषण्वसू..." इस मंत्र में 'वृषन्' शब्द आया है। यह दूसरे दिन का रूप है। वैश्वदेव निविद् सूक्त यह है :— यज्ञस्य वो रथ्यं विश्पतिं विशाम्......। (ऋ० १०।६२) इस सूक्त के "वृषा केतुर्यजतोद्यामशायत" में वृषन् शब्द आया है। यह दूसरे दिन का रूप है। इस सूक्त का ऋषि शार्यात है। जब अंगिरा लोग स्वर्ग- लोक में जाने के लिये सत्र कर रहे थे तब षडह के दूसरे दिन का कृत्य करने में भूल चूक कर जाते थे। मनु के पुत्र शार्यात ने 'यज्ञस्य रथं' वाला सूक्त दूसरे दिन पढ़वाया। इससे वह यज्ञ को जान गये और स्वर्गलोक को पहुँच गये। दूसरे दिन होता इस सूक्त को इसलिये पढ़ता है कि यज्ञ का ज्ञान हो जाय और स्वर्गलोक प्राप्त हो जाय। अग्नि-मारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :— पृक्षस्य वृष्णो अरुषस्य नू सहः......(ऋ० ६।८) इसमें वृषन् शब्द आया है। यह दूसरे दिन का रूप है। अग्नि मारुत शस्त्र में मरुतों का निविद् सूक्त यह है :— वृष्णो शर्धाय सुम्नाय वेधसे......(ऋ० १।६४)

पाँचवाँ अध्याय ] २७७ इसमें वृषन् शब्द आया है। यह दूसरे दिन का रूप है। जातवेद मंत्र वही है :— जातवेद से सुनवाम सो मम् । जातवेद का निविद् सूक्त यह है :— यज्ञेन वर्धत जातवेदसम्......( ऋ० २।२ ) इसमें 'वृध' है जो दूसरे दिन का रूप है। ( ४ ) ऐतरेय ब्राह्मण की चौथी पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ। ऐतरेय ब्राह्मण की चौथी पञ्चिका समाप्त हुई।

(पृष्ठ रिक्त / अस्पष्ट)

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पाँचवीं पञ्चिका CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri शान्ति पाठः CC-0:Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.

पहला अध्याय १—( द्वादशाह ) के तीसरे दिन का देवता है विश्वेदेवा । स्तोम है सत्रहवां । साम है वैरूप । छन्द जगती । जो यह जानता है कि देवता कौन है, स्तोम कौन है, साम कौन है और छन्द कौन है उसका यज्ञ सफल हो जाता है । तृतीय दिन का रूप है "समानोदर्क"*। इसके अन्य रूप यह हैं :—अश्व, अंत, पुनरावृत्ति, पुनर्निर्नृत्ति ( अर्थात् अन्त के स्वरों में समानता ), रति या रमण करना, पर्यस्ति ( ढकना ), तीन की संख्या, 'अन्त' का रूप, पिछले पद में देवता का उल्लेख, दूसरे लोक की ओर संकेत, वैरूप साम, जगती छन्द और भूत काल की क्रिया । तीसरे दिन का आज्य शस्त्र यह है :— युक्ष्वा हि देव हूतमाँऽअश्वाँऽअग्नेरथीरिव... (ऋ० ८।७५ ) तीसरे दिन के कृत्य के द्वारा देव स्वर्ग लोक की ओर चल पड़े । असुर राक्षसों ने रोका । उन्होंने असुरों से कहा, "विरूप *उदर्क का अर्थ है समाप्ति । 'समानोदर्क' का अर्थ है समान समाप्ति वाला । अर्थात् समान वाक्य पर समाप्त होने वाले सूक्त । ( २८१ )

२८२ [पाँचवीं पञ्चिका अर्थात् कुरूप हो जाओ । कुरूप हो जाओ ।” जब असुर कुरूप होने लगे, देव स्वर्ग को चले गये । इससे वैरूप साम उत्पन्न हुआ । इसीलिये इसको वैरूप ( कुरूप ) कहते हैं । जो पाप के कारण कुरूप हो गया हो, वह इस रहस्य को समझकर पाप से छूट जाता है । असुरों ने देवों को फिर सताया । देवों ने घोड़ा बनकर अपनी टापों से उनको मार दिया । इसीलिये घोड़ों का नाम हैं अश्व, जो इस रहस्य को समझता हैं वह समृद्धि को पाता है ( अश्नुते ) । घोड़ों ने पिछली टांगों से मारा इस लिये घोड़े सब पशुओं में तेज होते हैं । जो इस रहस्य को समझता है उसका पाप छूट जाता है । इसीलिये तीसरे दिन के आज्यशस्त्र में 'अश्व' शब्द आता है । यह तीसरे दिन का रूप है । प्र-उग शस्त्र में नीचे के तीन तीन मंत्र हैं :— ( १ ) वायवा याहि वीतये जुषाणो हव्यदातये । पिबा सुतस्यान्धसो अभिप्रयः ॥ सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः । निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभिप्रयः । (ऋ० ५।५१।५-७) ( २ ) वायो याहि शिवा दिवो वहस्वा सु स्वश्व्यम् । वहस्व महः पृथु- पक्षसा रथे ॥ त्वां हि सुप्सरस्तमं नृषदनेषु हूमहे । ग्रावाणं नाश्वपृष्ठं संहना ॥ स त्वं नो देव मनसा वायो मन्दानो अग्रियः । कृधि वाजाँ अपो धियः ॥ (ऋ० ८।२६।२४-२५) ( ३ ) इन्द्रश्च वायवेषां सुतानां पीतिमर्हतः । ताञ्जुषेथामरेपसावभि प्रयः । सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः । निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभि प्रयः ।