ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 279, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] २६५ यह जो पृथिवी ने स्वर्ग में देवयजन बनाया यह चन्द्रमा का काला दाग है। इसलिये शुक्ल पक्षों में यज्ञ करते हैं जिससे चन्द्रमा का काला दाग प्राप्त हो जाय । स्वर्ग ने पृथिवी में चरने के लिये ऊपा (चरागाह) बनाई। तुरः काविषेय ने कहा “हे जनमेजय, पोष क्या और ऊपा क्या ?” इसीलिए गव्य अर्थात् गाय के दूध आदि की चिन्ता करने वाले पूछा करते हैं “क्या वहां ऊपा अर्थात् चरने के लिये स्थान है ?” क्योंकि ऊपा ही चारा है। वह लोक इस लोक की ओर झुक गया। इससे द्यौ और पृथिवी हो गये। न अन्तरिक्ष से द्यौ हुआ, न अन्तरिक्ष से पृथिवी । (५) २८—पहले बृहत् और रथंतर थे। उनसे वाणी और मन हुये। रथंतर वाणी है और बृहत् मन । बृहत् पहले हुआ इस लिये उसने रथंतर को कम समझा। रथंतर ने अपने में गर्भ धारण किया और वैरूप उत्पन्न किया। रथंतर और वैरूप मिल गये और बृहत् को कम समझने लगे। बृहत् ने अपने में गर्भ धारण किया और उससे वैराज पैदा हुआ। यह दोनों बृहत् और वैराज मिल गये और रथंतर और वैरूप को कम समझने लगे । रथन्तर ने तब अपने में गर्भ स्थापित किया और शक्कर का जन्म हुआ। इन तीनों अर्थात् रथंतर, वैरूप और शक्कर ने बृहत् और वैराज को कम समझा। बृहत् ने तब अपने में गर्भ स्थापित किया और रैवत का जन्म हुआ। हर पक्ष के तीन तीन साम छः पृष्ठ हो गये (अर्थात् रथंतर, वैरूप, शक्कर एक ओर और बृहत्, वैराज और रैवत दूसरी ओर)। इस पर तीनों छन्द (गायत्री, त्रिष्टुभ् और जगती) इन छः पृष्ठों को न पा सके। गायत्री ने गर्भ धारण किया और