ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६४ [चौथी पञ्चिका सोम बनाना चाहिये । ( सूत्र में सब १६ ऋत्विज् यजमान बन कर एक दूसरे के लिए यज्ञ करते हैं ) । वसन्त में समाप्त करता है । वसन्त रस है । ऐसा करने से वह यज्ञ की समाप्ति रस से करता है । (४) २७—छन्दों ने एक दूसरे का स्थान लेना चाहा । गायत्री ने त्रिष्टुभ् और जगती का स्थान लेना चाहा । त्रिष्टुभ् ने गायत्री और जगती का । और जगती ने गायत्री और त्रिष्टुभ् का । प्रजापति ने देखा कि यह द्वादशाह व्यूळ्हच्छंदस ( तितर बितर ) हो गया । उसने इसे लिया और इससे यज्ञ किया । इस प्रकार छन्दों की कामनायें पूरी हुई । जो इस रहस्य को समझता है उसकी कामनायें पूरी हो जाती हैं । छन्दों को उनकी जगह से हटाता है जिससे यज्ञ में कोई त्रुटि न हो । जैसे कोई दूर की यात्रा करने में मंजिल मंजिल पर नये घोड़ों या बैलों को जोतता है जो थके न हों, उसी प्रकार स्वर्ग की यात्रा करने के लिये यह ताज़ा ताज़ा छन्दों का प्रयोग करता है जो थक न गये हों । छन्दों की जगह बदलने का यही प्रयोजन है । यह दोनों लोक पहले मिले थे । फिर अलग हो गये । इससे न वर्षा हुई, न सूरज तपा । पंचजन मेल से न रहे । देवों ने इन लोकों को मिला दिया, इन दोनों ने देवरीति से एक दूसरे के साथ विवाह कर लिया । रथंतर से पृथ्वी स्वर्ग से जुड़ी है और बृहत्-साम से स्वर्ग पृथ्वी से । नौधस साम के द्वारा पृथ्वी स्वर्ग से जुड़ी है । और श्यैत साम द्वारा स्वर्ग पृथ्वी से । धुयें के द्वारा पृथ्वी स्वर्ग से जुड़ी है और वर्षा के द्वारा स्वर्ग पृथ्वी से जुड़ा है । पृथ्वी ने स्वर्ग में देवयजन अर्थात् देवों के यज्ञ के लिये स्थान बनाया और स्वर्ग ने पृथ्वी में पशु बनाये ।