भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 285

पाँचवाँ अध्याय ] २७९ अद्या नो देव सवितः प्रजावत् सावीः सौभगम् । परा दुःष्वप्न्यं सुव ॥ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परा सुव । यद् भद्रं तन्न आ सुव ॥ अनागसो अदितये देवस्यसवितुः सवे । विश्वा वामानि धीमहि ॥ ( ऋ० ५।८२।४-६ ) यह रथंतर दिन का है। यही पहले दिन का रूप है। सविता का निविद् सूक्त है "युंजते मन उत" (ऋ० ५।८१) इसमें 'युज' शब्द पड़ा है। यह पहले दिन का रूप है। द्यावा पृथिवी का निविद् सूक्त "प्र द्यावा यज्ञैः" (ऋ० १।१५९) है। इसमें 'प्र' शब्द आया है। यह पहले दिन का रूप है। ऋभुओं का निविद् सूक्त "इहे ह वो मनसा" (ऋ० ३।६०) है। अगर इनमें 'प्र' और 'आ' होता तो 'प्रा' हो जाता। जिसका अर्थ है 'जाना'। और यजमान इस संसार से चल बसता। इसलिए 'इहे ह वो मनसा' सूक्त पढ़ते हैं। इसमें पहले दिन का रूप नहीं आता। (इस सूक्त में) 'इह' का अर्थ है 'यह लोक'। इस प्रकार यजमान इस लोक को भोगता है। वैश्वदेव का निविद् सूक्त है:— देवान् हुवे बृहच्छ्रवसः स्वस्तय इति (ऋ० १०।६६) इसके पहले पद में 'देवतों' का वर्णन है। यह पहले दिन का रूप है। जो लोग संवत्सर या द्वादशाह को करते हैं वे बड़ी लम्बी लम्बी यात्रा पर जाते हैं। इस लिये वैश्वदेवों का जो ऊपर दिया हुआ निविद् सूक्त (देवान् हुवे...) पढ़ा जाता है यह यात्रा के लिए। जो इस रहस्य को समझता है उसका कल्याण होता है और वह अपने साल को अच्छी तरह पार कर लेता है। और जो लोग इस रहस्य को समझ कर होता से इस वैश्वदेव निविद् को पढ़ाते हैं उनका भी कल्याण होता है।