ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७० [ चौथी पञ्चिका भूयाम ते सुमतौ वाजिनो वयं मा नः स्तरभिमातये । अस्माञ् चित्राभिरवतादभिष्टिभिरा नः सुम्नेषु यामय ॥ (ऋ० ८।३१-२ ) इसमें 'पिव' शब्द आया है। यह पहले दिन का रूप है। तात्पर्य्य यह है :- त्यमूषु वाजिनं देवजूतम् । यह निविद् सूक्त के पहले पढ़ा जाता है। तात्पर्य कल्याण के लिये है। जो इस रहस्य को समझता है, उसका मार्ग कल्याणयुक्त हो जाता है और अपने साल को कल्याण से व्यतीत करता है। (१) ३०- ( निष्केवल्य शस्त्र का निविद् ) सूक्त यह है:- आ न इन्द्रो दूरादान आसात् । इत्यादि (ऋ० ४।२० ) इसमें 'आ' आया है। यह पहले दिन का रूप है। निष्केवल्य और मरुत्वतीय शस्त्रों के निविद् संपात कहलाते हैं। वामदेव ने इन तीनों लोकों को देखकर इन्हीं संपातों द्वारा उनको प्राप्त किया। ('संपतत्' = प्राप्त हुआ, से संपात बन गया )। इसीलिए इनका नाम संपात हो गया। पहले दिन संपात इसलिए पढ़े जाते हैं कि स्वर्गलोक तक पहुँच जायें। उसे प्राप्त कर लें और वहां की संगति का लाभ हो। पहले दिन अर्थात् रथंतर दिन के वैश्वदेव शस्त्र का 'प्रतिपद्' अर्थात् शुरू यह है:- तत् सवितुर्वृणीमहे वयं देवस्य भोजनम् । श्रेष्ठं सर्वधातमं तुरं भगस्य धीमहि ॥ अस्य हि स्वयशस्तरं सवितुः कच्चन प्रियम् । न मिनन्ति स्वराज्यम् ॥ स हि रत्नानि दाशुषे सुवाति सविता भगः । तं भागं चित्रमीमहे ॥ (ऋ० ५।८२।१-३ ) इसका 'अनुचर' ( पिछला भाग ) यह है :-