ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७२ [चौथी पञ्चिका अग्निमारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :— वैश्वानराय पृथु पाजसे विप इति ( ऋ० ३।३ ) इसके पहले पद में देवता का उल्लेख है। यह पहले दिन का रूप है । मरुतों का निविद यह है :— “प्रत्वक्षसः प्रतवसोविरप्शिन” इति ( ऋ० १।८७ ) इसमें ‘प्र’ आया है। यह पहले दिन का रूप है। जातवेद सूक्त के पहले यह मंत्र पढ़ना है :— जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो नि दहाति वेदः। स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः। ( ऋ० १।९६।१ ) यह जातवेद मंत्र कल्याण मार्ग के कल्याण के लिये पढ़ा जाता है। इससे यजमान को कल्याण मिलता है। जो इस रहस्य को समझता है उसका साल कल्याण पूर्वक व्यतीत हो जाता है। जातवेद का निविद सूक्त है :— प्रतव्यसीं नव्यसीं...इति ( ऋ० १।१४३ ) इसमें ‘प्र’ आया है। यह पहले दिन का रूप है। द्वादशाह के पहले दिन का अग्निमारुत शस्त्र वही है जो अग्निष्टोम का । जो यज्ञ में समान किया जाता है उसी पर प्रजा जीती हैं इस लिए अग्निमारुत शस्त्र वही होता है। (२) ३१—दूसरे दिन का देवता इन्द्र है। पंचदश स्तोम है। बृहत् साम है और त्रिष्टुभ् छन्द है। जो यह जानता है कि कौन सा देवता है, कौन सा स्तोम है, कौ न सा साम है और कौन सा छन्द है, वह सफल हो जाता है । दूसरे दिन ‘प्र’ और ‘आ’ नहीं आते। दूसरे दिन का रूप है ‘स्थ’।