भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 287

पाँचवाँ अध्याय ] २७६ ऊर्ध्व, प्रति, अंतः, वृषण्, वृधन् यह शब्द तथा दूसरे पदों में देवतों का स्पष्ट उल्लेख, अन्तरिक्ष की ओर संकेत. बृहत् साम और त्रिष्टुभ् छन्द और वर्तमानकाल । यह दूसरे दिन के रूप अर्थात् विशेषतायें हैं । दूसरे दिन का आज्य सूक्त यह है :- अग्निं दूतं वृणीमहे...... (ऋ० १।१२ ) इसमें ‘वृणीमहे’ यह वर्तमानकाल आया है । यह दूसरे दिन का रूप है । प्रउग शस्त्र यह है :- वायो ये ते सहस्रिणः ( ऋ० २।४१ ) इसमें ‘अयं वा मित्रावरुणा सुतः सोमऋतावृधा’ (२।४१।४) में 'वृधन्' शब्द आ गया । यह दूसरे दिन का रूप है । मरुत्वतीय शस्त्र का प्रतिपद् यह है :- विश्वानरस्य वस्पति मनानतस्य शवसः । एवैश्च चर्षणीनामूती हुवे रथानाम् ॥ अभिष्टये सदावृधं स्वमी॑डेहेषु यं नरः । नाना हवन्त ऊतये ॥ परोमात्रमृचीषममिन्द्रमुग्रं सुराधसम् । ईशानं चिद् वसूनाम् ॥ ( ऋ० ८।६८।४-६ ) इसका अनुचर यह है :- इन्द्र इत् सोमपा एक इन्द्रः सुतपा विश्वायुः । अन्तर्देवान्मत्र्याँ अ । न यं शुक्नो न दुराशीर्न तृप्रा उरुव्यचसम् । अपस्पृण्वते सुहार्दम् ॥ गोभिर्यदीमन्वे अस्मन्मृगं न व्रा मृगयन्ते । अमत्सिरन्ति धेनुभिः ॥ ( ऋ० ८।२।४-६ ) इनमें 'वृधन्' और 'अन्तः' शब्द आये हैं । यह दूसरे दिन का रूप हैं। इन्द्र-निह्वव प्रगाथ वही रहता है । "इन्द्र नेदीय एदिहि" । ( ऋ० ८।५३।५-६ ) १८