ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२७४ [ चौथी पञ्चिका ब्रह्मणस्पति का प्रगाथ यह है "उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते" । इसमें “उत्तिष्ठ” (उत्) शब्द ऊर्ध्व के अर्थ में है । यह दूसरे दिन का रूप है। धाय्य वही हैं :- अग्निर्नैता, त्वं सोम ऋतुभिः, पिन्वन्त्यपः । (ऐतरेय ब्रा० ३।१८) मरुत्वतीय प्रगाथ यह है :- बृहदिन्द्राय गायत मरुतो वृत्रहन्तमम् । येन ज्योतिरजनयन्नृतावृधो देवं देवाय जागृवि ।। अपाधमत्तमिश्रस्तिरस्तिहाऽथेन्द्रो द्युभ्यामभवत् । देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे बृहद् भानो मरुद्गणं ॥ ( ऋ० ८।८६।१-२ ) इसमें 'ऋतावृधः' शब्द में 'वृधन्' शब्द आ गया । यही दूसरे दिन का रूप है। मरुत्वतीय शस्त्र का निविद् सूक्त यह है :- इन्द्र सोमं सोमपते.........( ऋ० ३।३२ ) इसमें 'आवृषस्व' में वृषन् शब्द आया है । [गवाशिरं...... तृपदा वृषस्वा ३।३२।२] यह दूसरे दिन का रूप है। बृहत् पृष्ठ यह है :- त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः । त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठा स्वर्वतः ॥ स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया महः स्तवानो अद्रिवः । गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे ।। ( ऋ० ६।४६।१-२ ) त्वं ह्येहि चेरवे विदा भगं वसुत्तये । उद्वावृषस्व मघवन् गविष्टय उदिन्द्राश्वमिष्टये ॥ त्वं पुरु सहस्राणि शतानि च यूथा दानाय मंहसे । आ पुरन्दरं चकृम विप्रवचस इन्द्रं गायन्तोऽवसे ।। ( ऋ० ८।६१।७-८ ) यह बार्हत दिन का होता है। यह दूसरे दिन का रूप है। निष्केवल्य शस्त्र की धाय्या वही है-