भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पाँचवाँ अध्याय ] २७५ “यद् वावान्” । साम प्रगाथ है :— उभयं शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः । सत्राच्या मघवा सोमपीतये धिया शविष्ठ आ गमत् ॥ तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः । उतोपमानां प्रथमो नि षीदसि सोमकामं हि ते मनः॥ ( ऋ० ८।६१।१-२ ) उभय का अर्थ है जो आज है और जो कल था । यह बृहत् साम का है। यह दूसरे दिन का रूप है। तार्क्ष्य वही है:— “त्यमूषु वाजिनं देवजूतम् ॥” ( ३ ) ३२—निष्केवल्य शस्त्र का निविद् है :— यां त ऊतिरवमा या परमा...(ऋ० ६।२५) इसमें “वृष्ण्यानि” शब्द आया है । 'वृषन्' दूसरे दिन का रूप है । वैश्वदेवशस्त्र का प्रतिपद् यह है :— विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरीत सख्यम् । विश्वो राय इषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे ॥ ( ऋ० ५।५०।१ ) तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥ देवस्य सवितुर्वयं वाजयनतः पुरन्ध्या । भगस्य रातिमीमहे ॥ ( ऋ० ३।६२।१०-११ ) इसके अनुचर यह हैं :— आ विश्वदेवं सत्पतिं सूक्तैरद्या वृणीमहे । सत्यसवं सवितारम् ॥ य इमे उभे अहनी पुर एत्यप्रयुच्छन् । स्वाधीर्देवः सविता ॥ य इम विश्वा जातान्याश्रावयति श्लोकेन । प्र च सुवाति सविता ॥ ( ऋ० ५।८२।७-९ ) यह बृहत् दिन या दूसरे दिन के हैं। दूसरा दिन का यही रूप है। सविता का निविद् सूक्त यह है :—