ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२६८ [ चौथी पञ्चिका मरुत्वती शस्त्र का प्रतिपद् या पहला भाग यह है : आ त्वा रथं यथोतये सुम्नाय वर्तयामसि । तुवि कूर्मिमृतीष हर्मीन्द्र शविष्ठ सत्पते ॥ तुवि शुष्म तुविक्क्रतो शचीवो विश्वया मते । आ पप्राथ महित्वना ॥ यस्य ते महिना महः परि ज्मायन्तम्रीयतुः । हस्ता वज्रं हिरण्ययम् ॥ ( ऋ० ८।६८।१-३ ) इसका अनुचर या पिछला भाग यह है :- इदं वसो सुतमन्धः पिवा सुपूर्णमुदरम् । अनाभयिन् ररिमा ते ॥ नृभिर्धूतः सुतो अश्नैरव्यो वारैः परिपूतः । अश्वो न निक्तो नदीषु ॥ तं ते यवं यथा गोभिः स्वादुमक्रम श्रीणन्तः । इन्द्र त्वा- स्मिन्त्सधमादे ॥ ( ऋ० ८।२।१-३ ) इनमें 'रथ' और 'पिव' आये हैं। यह पहले दिन का रूप है। इन्द्र-निहव प्रगाथ यह है :- इन्द्र नेदीय एदिहि मितमेधाभिरूतिभिः । आ शन्तम शन्तमाभिर- भिष्टिभिरा स्वापे स्वापिभिः ॥ आजितुरं सत्पतिं विश्वचर्षणिं कृधि प्रजास्वाभगम् । प्र सू तिरा शचीभिर्ये त उक्थिनः ऋतुं पुनत आनुषक् ॥ ( ऋ० ८।५३।५, ६ ) इसके पहले पद में देवता का वर्णन है। यह पहले दिन का रूप है। ब्राह्मणास्पत्य प्रगाथ यह है :- प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्रदेव्येतु सूनृता । अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥ यो वाघते ददाति सूनरं वसु स धत्ते अक्षिति श्रवः ! तस्मा इडां सुवीरामा यजामहे सुप्रतूर्तिमनेहसम् ॥ ( ऋ० १-४०।३-४ ) इसमें 'प्र' आया है। यह पहले दिन का रूप है। यह धाय्य यह है:- अग्निर्नैता, त्वं सोमऋतुभिः, पिन्वंत्यपः ॥ (ऐतरेय ब्राह्मण ३।१८)