ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८६ [ पाँचवीं पञ्चिका ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभि प्रघ्नन्ति धृष्णुया । अध स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव ॥ ( ऋ० ६।४६।९-१० ) इसमें त्रि शब्द आया है । यह तीसरे दिन का रूप है । ताक्ष्यं वही है अर्थात् त्यमूषु वाजिनं... (ऋ० १०।१७८) (१) २—निविद् यह है :— यो जात एव प्रथमो मनस्वान् (ऋ० २।१२ ) इसमें समानोदर्क है ( अर्थात् इसके अन्त में 'सजनास, इन्द्र आता है ) । समानोदर्कता तीसरे दिन का रूप है । इसमें 'स जन' और 'इन्द्र' शब्द आये हैं । इसके पढ़ने से इन्द्र को इन्द्रिय शक्ति प्राप्त होती है । इसलिये साम गाने वाले लोग कहते हैं कि ऋग्वेदी इन्द्र की इन्द्रिय की प्रशंसा करते हैं । इसका ऋषि गृत्समद है । इस सूक्त से गृत्समद ने इन्द्र के प्रिय धाम को पाया । उसने परम लोक जीत लिया । जो इस रहस्य को समझता है वह इन्द्र के परम धाम को पाता है और परम लोक को जीत लेता है । वैश्वदेव के प्रतिपद् और अनुचर यह हैं :— तत्सवितुर्वृणीमहे इत्यादि ( ऋ० ५।८२।१-३ ) और अद्या नो देव सवितः ( ऋ०५।८२।४-५ ) यह रथंतर चिन है और यह तीसरे दिन का रूप है । सविता का निविद् सूक्त यह है :— तद्देवस्य सवितुर्वार्यं महत्... ( ऋ० ४।५३ ) इसमें 'महत्' शब्द आया है । अन्त बड़ा है । तृतीय दिन अन्त है। इसलिये यह तीसरे दिन का रूप है । द्यावा पृथिवी का निविद् सूक्त है :—