ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 299, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ] २८५ त्वं सोम क्रतुभिः ( १।६१।२ ) पिन्वन्त्यपो ( ऋ० १।६४।६ ) मरुत्वतीय प्रगाथ यह है :- नकिः सुदासो रथं पर्यासं न रीरमत् । इन्द्रो यस्याविता यस्य मरुतो गमत्स गोमति व्रजे ॥ ( ऋ० ७।३२।१० ) इसमें 'पर्यस्त' है, यह तीसरे दिन का रूप है । मरुत्वतीय शस्त्र का निविद् सूक्त यह है :- त्रयर्यमा मनुषो देवतात ( ऋ० ५।२९ ) इसमें 'त्रि' शब्द है । यह तीसरे दिन का रूप है । तीसरे दिन के वैरूप पृष्ठ यह हैं :- यद्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः । न त्वा वज्रिन्सहस्रं सूर्या अनु न जात मष्ट रोदसी ॥ आ पप्रथ महिना वृष्ण्या वृषन् विश्वा शविष्ठ शवसा । अस्माँ अव मघवन् गोमति व्रजे वज्रिञ् चित्राभिरूतिभिः ॥ ( ऋ० ८।७०।५-६ ) यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय । स्तोतारमिद्धिधिषेय रदावसो न पापत्वाय रासीय ॥ शिक्षेयमिन् महयते दिवे दिवे राय आ कुहचिद्विदे । नहि त्वदन्य- न्मघवन्न आप्यं वस्यो अस्ति पिता चन ॥ ( ऋ० ७।३२।१८-१६ ) यह रथन्तर दिन है । यह तीसरे दिन का रूप है । धाय्य वही हैं :- यद्वावान इत्यादि । "अभित्वा शूर नोनुम" ( ऋ० ७।३२।२२-२३ ) पढ़कर इस दिन की योनि को फेर देता है । क्योंकि यह दिन क्रम के अनुसार रथन्तर दिन है । और रथंतर साम इसकी योनि है । साम प्रगाथ यह है :- इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत् । छर्दिर्यच्छ मघवद्भ्यश्च मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः ॥