भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

पहला अध्याय ] २९५ द्यावा पृथिवी का निविद् सूक्त यह है :- प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी नमोभिः । ( ऋ० ७।५३ ) इसमें 'प्र' है जो चौथे दिन का रूप है :- ऋभुश्रों का निविद् सूक्त यह है :- प्र ऋभुभ्यो दूतमिव वाचमिष्ये । ( ऋ० ४।३३ ) इसमें 'प्र' और 'वाचमिष्ये' पड़ा है जो चौथे दिन का रूप है । विश्वेदेव का निविद् सूक्त यह है :- प्र शुक्रैतु देवी मनीषा । ( ऋ० ७।३४ ) इसमें 'प्र' और 'शुक्र' है जो चौथे दिन का रूप है । इसके छन्द भिन्न-भिन्न हैं । दो पद के और चार पदों के । यह चौथे दिन का रूप है । अग्नि-मारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :- वैश्वानरस्य सुमतौ, स्याम राजा हि कं भुवनानामभि श्रीः । इतो जातो विश्वमिदं विचष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण ॥ ( ऋ० १।९८ ) इसमें 'जात' शब्द आया है । यह चौथे दिन का रूप है । मरुतों का निविद् सूक्त यह है :- क इं व्यक्ता नरः सनीडा रुद्रस्य मर्या अधास्वश्वाः । नकिह्रै षां जनू षि वेद ते अङ्ग विद्र मिथों जनित्रम् ॥ ( ऋ० ७।५६ ) इसमें 'नकिह्रैषां जनू षि वेद' में 'जात' शब्द आया है यह चौथे दिन का रूप है । इसके छन्द भिन्न-भिन्न हैं । कोई दो पद के और कोई चार पद के । यह चौथे दिन का रूप है । जातवेद मंत्र वही है "जातवेदसे सुनवाम सोमम्” ( ऋ० १।९९।१ )। जातवेद का निविद् सूक्त यह है :- अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युती जनयन्त प्रशस्तम् । ( ऋ० ७।१ )