ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पहला अध्याय ] २९५ द्यावा पृथिवी का निविद् सूक्त यह है :- प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी नमोभिः । ( ऋ० ७।५३ ) इसमें 'प्र' है जो चौथे दिन का रूप है :- ऋभुश्रों का निविद् सूक्त यह है :- प्र ऋभुभ्यो दूतमिव वाचमिष्ये । ( ऋ० ४।३३ ) इसमें 'प्र' और 'वाचमिष्ये' पड़ा है जो चौथे दिन का रूप है । विश्वेदेव का निविद् सूक्त यह है :- प्र शुक्रैतु देवी मनीषा । ( ऋ० ७।३४ ) इसमें 'प्र' और 'शुक्र' है जो चौथे दिन का रूप है । इसके छन्द भिन्न-भिन्न हैं । दो पद के और चार पदों के । यह चौथे दिन का रूप है । अग्नि-मारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :- वैश्वानरस्य सुमतौ, स्याम राजा हि कं भुवनानामभि श्रीः । इतो जातो विश्वमिदं विचष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण ॥ ( ऋ० १।९८ ) इसमें 'जात' शब्द आया है । यह चौथे दिन का रूप है । मरुतों का निविद् सूक्त यह है :- क इं व्यक्ता नरः सनीडा रुद्रस्य मर्या अधास्वश्वाः । नकिह्रै षां जनू षि वेद ते अङ्ग विद्र मिथों जनित्रम् ॥ ( ऋ० ७।५६ ) इसमें 'नकिह्रैषां जनू षि वेद' में 'जात' शब्द आया है यह चौथे दिन का रूप है । इसके छन्द भिन्न-भिन्न हैं । कोई दो पद के और कोई चार पद के । यह चौथे दिन का रूप है । जातवेद मंत्र वही है "जातवेदसे सुनवाम सोमम्” ( ऋ० १।९९।१ )। जातवेद का निविद् सूक्त यह है :- अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युती जनयन्त प्रशस्तम् । ( ऋ० ७।१ )
२९६ [ पाँचवीं पञ्चिका इसमें 'जनयन्त' शब्द आया है। यह चौथे दिन का रूप है। इसके छन्द भिन्न-भिन्न हैं। विराज् और त्रिष्टुभ् । यह चौथे दिन का रूप है। (५) ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त हुआ।
दूसरा अध्याय ६—पाँचवें दिन का देवता गौ है। स्तोम त्रिणव है। साम शक्वर है, छन्द पंक्ति है। जो यह जानता है कि कौन देवता है, कौन स्तोम है, कौन साम है और कौन छन्द है उसका यज्ञ सफल होता है। जिसमें 'आ' और 'प्र' न हो और जो 'स्थित' हो वह पांचवें दिन का रूप है। दूसरे दिन के रूप भी पांचवें दिन के रूप हैं, जैसे ऊर्ध्व, प्रति, अन्तः, वृषन्, वृधन्। बीच के पाद में देवता का निर्वचन और अन्तरिक्ष का उल्लेख। इनके सिवाय यह विशेषतायें और हैं:— दुग्ध, ऊध, धेनु, पृश्नि, मद, पशुओं का रूप, अभ्यास (अर्थात् घटना बढ़ना) क्योंकि पशु बड़े छोटे होते हैं। पांचवां दिन जागत है अर्थात् जगत् से सम्बन्ध रखता है, पशु जगत् है (चलता फिरता) है; यह बार्हत भी है क्योंकि बृहती छन्द पशुओं का है। यह पांक्त भी है क्योंकि पशु पंक्ति छन्द से सम्बन्ध रखते हैं। यह 'वाम' है क्योंकि पशु उलटे हैं। यह हविष्मत् है क्योंकि पशु हवि हैं। यह वसुमत है क्योंकि पशुओं ( २९७ )
२९८ [ पाँचवीं पञ्चिका के वसु या शरीर है। यह शाक्वर पांक्त है और दूसरे दिन के समान वर्तमान काल है। यह पांचवें दिन के रूप हैं। आज्य शस्त्र है "इममृधुवो अतिथि मुषुबु धम्" (ऋ० ६।१५) छन्द जगती है और छन्दों के साथ भी। यह पशुओं का रूप है। यह पांचवें दिन का रूप है। पांचवे' दिन के प्र-उग शस्त्र में जो बृहत् छन्द में हैं नीचे के मंत्र हैं :— आ नो यज्ञं दिविस्पृशं वायो याहि सुमन्मभिः। अन्तः पवित्र उपरि श्रीणानोयं शुक्नो अयामि ते॥ वेत्यध्वर्युः पथिभी रजिष्ठैः प्रति हव्यानि वीतये। अधा नियुत्व उभयस्य नः पिब शुचिं सोमं गवाशिरम्॥ (ऋ० ८।१०१।६-१०) आ नोने वायो महे तने याहि मखाय पाजसे। वयं हि ते चकृमा भूरि दावने सद्यश्चिन्महि दावने। (ऋ० ८।४६।२५) रथेन पृथु पाजसा दाश्वांसमुप गच्छतम्। इन्द्रवायू इहागतम्॥ इन्द्रवायू अयं सुतस्तं देवेभिः सजोषा। पिवतं दाशुषो गृहे॥ इह प्रयाणमस्तु वामिन्द्र वायू विमोचनम्। इह वां सोम पीतये॥ (ऋ० ४।४६।५-७) बहवः सूरचक्षसोऽग्निजिह्वा ऋतावृधः। त्रीणि ये येमुर्विदथानि धीतिभिर्विश्वानि परिभूतिभिः॥ वि ये दधुः शरदं मासमादर्हर्यज्ञमक्तुं चाहृचम्। अनाप्यं वरुणो मित्रो अर्यमा क्षत्रं राजान आशत॥ तद्वो अद्य मनामहे सूक्तैः सूर उदिते। यदोहते वरुणो मित्रो अर्यमा यूयमृतस्य रथ्यः॥ (ऋ० ७।६६।१०-१२) इमा उ वां दिविष्टय उस्रा हवन्ते अश्विना। अयं वामह्वे ऽवसे शचीवसू विशं विशं हि गच्छथः॥
दूसरा अध्याय ] २९९ युवं चित्रं ददथुर्भोजनं नरा चोदेथां सूनृतावते । अर्वाग्रथं समनसा नियच्छतं पिवतं सोम्यं मधु ॥ आ यातमुप भूषतं मध्वः पिवतमश्विना । दुग्धं पयो वृषणा जेन्या- वसू मा नो मर्धिष्टमा गतम् ॥ ( ऋ० ७।७४।१-३ ) पिवा सुतस्य रसिनो मत्सवा न इन्द्र गोमतः । आपिनों बोधि सध- माद्यो वृधेऽस्माँ अवन्तु ते धियः । भूयाम ते सुमतौ वाजिनो वयं मा नः स्तरभिमातये । अस्माञ् चित्राभिरवतादभीष्टिभिरा नः सुम्नेषु यामय ॥ इमां उ त्वा पुरुवसो गिरोवर्धन्तु या मम । पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितोऽभि स्तोमैरनूषत ॥ (ऋ० ८।३।१-३) देवन्देवं वोऽवसे देवन्देवमभिष्टये । देवन्देवं हुवेम वाजसातये . गृणन्तो देव्या धिया ॥ देवासो हिष्मा मनवे समन्यवो विश्वे साकं सरातयः । ते नो अद्य ते अपरं तुचे तु नो भवन्तु वीरवोविदः ॥ प्रवः शंसाम्यद्रुहः संस्थ· उपस्तुतीनाम् । न तं धूर्तिर्वरुण मित्र मर्त्यं यो वो धामभ्योऽविधत् ॥ (ऋ० ८।२७।१३-१५) बृहद्गायिषे वचोऽसुर्यान्नदीनाम् । सरस्वतीमिन् महया सुवृक्तिभिः स्तौमैर्वसिष्ठ रोदसी ॥ उभे यत् ते महिना शुभ्रे अन्धसी अधिक्षियन्ति पूरवः । सा नो चोधयित्री मरुत् सखा चोद राधो मघोनाम् ॥ भद्रमिद्भद्रा कृणवत् सरस्वत्यकवारी चेतति वाजिनीवती । गृणाना जमदग्निवत् स्तुवाना च वसिष्ठवत् ॥ (ऋ० ७।९६।१-३) मारुतीय शस्त्र का प्रतिपद् यह हैः- यत् पाञ्चजन्यया विशेन्द्र घोषा असृक्षत । अस्तृणाद्बर्हणा विपोऽ- र्यो मानस्य स क्षयः ॥ (ऋ० ८.६३।७) इसमें 'पांचजन्य' शब्द आया है । यह पाँचवें दिन का रूप है ।
३०० [ पाँचवीं पञ्चिका ( मरुत्वतीय शस्त्र के ) आतान वहीँ हैं जो दूसरे दिन के:— इन्द्र इत् सोमपा एक...... (ऋ० ८।२।४) इन्द्र नेदीय एदिहि (ऋ० ८।५३।५) उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते (ऋ० १।४०।१) अग्निर्नेता (ऋ० ३।२०।४) त्वं सोम क्रतुभिः (ऋ० १।९१।२) पिन्वन्ति अपो (ऋ० १।६४।६) बृहदिन्द्राय गायत (ऋ० ८।८९।१) यह पाँचवें दिन का रूप है । अवितासि सुन्वतो वृक्त बर्हिषः... (ऋ० ८।३६) इस सूक्त में 'मद' शब्द है । इसके पहले मंत्र में पाँच पद हैं और पंक्ति छन्द है । यह पाँचवें दिन का रूप है । इत्था हि सोम इन्मदे... (ऋ० १।८०) इस भी 'मद' शब्द है । पाँच पद हैं और पंक्ति छन्द है । यह पाँचवें दिन का रूप है । इन्द्र पिब तुभ्यं सुतोमदाय...... (ऋ० ६।४०) इसमें भी 'मद' है । यह त्रिष्टुभ् है । इस पद से जो प्रतिष्ठित है, सवन की प्रतिष्ठा होती है कि कहीं गिर न पड़े । नीचे का तृच पर्यास है :— मरुत्वाँ इन्द्र मीढ्वः पिबासोमं शतक्रतो । अस्मिन् यज्ञे पुरुष्टुत ॥ तुभ्येदिन्द्र मरुत्वते सुताः सोमासो अद्रिवः । हृदा हूयन्त उक्थिनः ॥ पिबेदिन्द्र मरुत्सखा सुतं सोमं दिविष्टुषु । वज्रं शिशान ओजसा ॥ (ऋ० ८।७६।७-९) इनमें न 'प्र' है न 'अ' । यह पाँचवें दिन का रूप है । गायत्री छन्द में हैं । यह गायत्री इस त्र्यह के मध्यसवन को वाहक है । वाहक वही छन्द होता है जिसमें निविद् सूक्त
दूसरा अध्याय ] ३०१ होता है । इसलिये निविद् को गायत्री छन्द में ही रखते हैं । (१) ७-पाँचवें दिन जो रथंतर दिन है शाक्वर स्वर से महा- नाम्नी का पाठ होता है । यह पाँचवें दिन का रूप है । इन्द्र ने इनके द्वारा अपने को महान् बनाया था । इस लिये उनका महानाम्नी नाम पड़ा । यह लोक भी महानाम्नी हैं क्योंकि यह बड़े हैं । जब प्रजा- पति ने इन सब को बनाया, तो इन सबके बनाने की उसमें शक्ति थी । चूँकि यह सृष्टि रच कर उसमें सब शक्तियाँ थीं इस लिये उनसे 'शक्वरी' उत्पन्न हुईं । इस लिये इनका नाम शक्वरी है । जो सोमा से बाहर पैदा हो गये वह सीमा से बाहर हो गये इसलिये 'सिमा' कहते हैं । यही सिमा का सिमात्व है । नीचे के मंत्र निष्केवल्य शस्त्र के "अनुरूप" हैं । स्वादो रित्था विषूवत··· (१।८४।१०) उप नो हरिभिः सुतम्··· (८।६३।३१) इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्··· (१।११।१) इनमें 'वृषन्', 'वृत्रिः', 'मद्' और 'वृधन्' शब्द आये हैं । यह पाँचवें दिन का रूप हैं । धाय्या वही है यद् वावान ॥ यह क्रम के अनुसार रथंतर दिन है । इसलिये अभित्वा शूर नोनुमो··· (७।३२।२२) पढ़ने से होता रथंतर की योनि की ओर लौटाता है । मोषु त्वा वाघतश्चन··· (७।३२।१-२) साम प्रगाथ है । इसमें एक पद अधिक है । यह पशुओं का रूप है । जो पाँचवें दिन का रूप है । तार्क्ष्य वही है अर्थात् त्यमूषु वाजिनं । (१०।१७८।१) (२) ८—प्रैदं ब्रह्मवृत्रतूर्येष्वाविथ··· (८।३७ )
३०२ [ पाँचवीं पञ्चिका इस सूक्त का छन्द पंक्ति है। और पाँच पद हैं। यह पाँचवें दिन का रूप है। 'इन्द्रो मदाय वावृधे' ( १।८१ ) इसमें 'मद' है, पंक्ति छन्द है। पाँच पद हैं। यह पाँचवें दिन का रूप है। सत्रा मदासस्तव विश्वजन्याः सत्रा रायोऽध ये पार्थिवासः। सत्रा वाजानामभवो विभक्ता यद् देवेषु धारयथा असुर्यम् ॥ ( ऋ० ६।३६।१ ) इसमें 'मद' है और यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इसके स्थिर पदों द्वारा यह सत्रन को ठीक स्थान पर रखता है और गिरने नहीं देता। नीचे तृच पर्यास है :- तमिन्द्रं वाजयामसि महे वृत्राय हन्तवे। स वृषा वृषभो भुवत् ॥ इन्द्रः स दामने कृत ओजिष्ठः स मदे हितः। द्युम्नी श्लोकी स सोम्यः ॥ गिरा वज्रो न सम्भृतः सबलो अनपच्युतः। ववक्ष ऋष्वो अस्तृतः ॥ ( ऋ० ८।९३।७-९ ) यहाँ "सवृषा वृषभो भुवत्" में पशु का रूप है। यह पांचवें दिन का रूप है। यह गायत्री छन्द में है। त्र्यहं के मध्य सवन की वाहक गायत्री हैं। निविद् उसी छन्द में रक्खा जाता है जो वाहक होता है, इसलिये निविद् को गायत्री में रक्खा है। वैश्वदेव शस्त्र की प्रतिपद है :- तत् सवितुर्वृणीमहे......( ५।८२।१) और अनुचर है अद्या नो देव सवितः ( ५।८२।४ ) यह रथन्तर दिन का रूप है जो पांचवां दिन है और यह पांचवें दिन का रूप है।
दूसरा अध्याय ] ३०३ सविता का निविद् सूक्त यह है :— उदुष्य देवः सविता दमूना हिरण्यपाणिः प्रतिदोषमस्थात् । अयो हनूर्यजतो मन्द्रजिह्व आदाशुषे सुवति भूरिवामम् ॥ ( ६।७१।४-६ ) इसमें 'दाशुषे सुवति भूरिवामम्' इस वाक्य में 'वाम' शब्द पड़ा है । यह पशु रूप है । पांचवें दिन का यही रूप होता है । द्यावापृथिवी का निविद् सूक्त है । मही द्यावापृथिवी इहज्येष्ठे ( ४।५६ ) इसमें 'ऋवृद्धोता' शब्द आया है । ऋवृद्धोता प्रथमानेभिरेवैः ( ४।५६।१ ) यह पशु रूप है । यह पांचवें दिन का रूप है । ऋभुओं का निविद् सूक्त यह हैं । ऋभुर्विभ्वा वाज इन्द्रो नो अच्छ ( ४।३४ ) पशु वाज हैं । यह पशु रूप है। यह पांचवें दिन का रूप है । स्तुषे जनं सुव्रतं नवासीभिः······( ६।४९।१ ) यह वैश्वदेव का अध्यास है । यह पशु रूप है । यह पांचवें दिन का रूप है । अग्नि-मारुत् शस्त्र का प्रतिपद् यह है :— हविष्पान्तमजरं स्वर्विदि दिविस्पृश्याहुतं जुष्टमग्नौ । तस्य भर्मणे भुवनाय देवा धर्मणे कं स्वधया पप्रथन्त ॥ ( ऋ० १०।८८।१ ) 'हविष्मत्' पांचवें दिन का रूप है । मरुतों का निविद् सूक्त यह है :— वपुर्नु तच्चिकितुषे चिदस्तु । ( ऋ० ६।६६।१ ) इसमें वपु शब्द आया है । यह पांचवें दिन का रूप है । धाय्या वही है...जातवेदसे सुनवाम सोमम् । अग्निहोता गृहपतिः स राजा विश्वा वेद जनिमा जातवेदाः । देवा- नामुत यो मर्त्यानां यजिष्ठः स प्र यजतामृतावा ॥ ( ऋ० ६।१५।१३ ) यह जातवेद का अध्यास पशुरूप है । यह पांचवें दिन का रूप है । ( ३ )
३०४ [ पाँचवीं पञ्चिका ९—छठा दिन देवक्षेत्र है। जो छठे दिन में प्रवेश करते हैं वह देव क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। देव एक दूसरे के घर में नहीं रहा करते ! कहावत है कि एक ऋतु दूसरी ऋतु के घर में नहीं रहती । इसलिये ऋत्विज लोग अपना अपना ऋतुयाज करते हैं। दूसरे से नहीं कराते । इस प्रकार ऋत्विज लोग सभी ऋतुओं के कृत्य करते हैं। किसी को छोड़ते नहीं। सब के कल्याण के लिये। कहा जाता है कि ऋतुओं के कृत्य के लिए न कोई आज्ञा चाहिये, न वषट्कार। आज्ञा वाणी से होती है और वाणी छठे दिन थक जाती है। यदि वह आज्ञा देंगे और वषट्कार करेंगे तो थकी हुई वाणी बोझ के नीचे दब जायगी। और वाणी गड़बड़ हो जायगी । और अगर ऋत्विज आज्ञा न दें और वषट्कार न करें तो यज्ञ की सीमा से पतित हो जाते हैं। यज्ञ भंग हो जाता है और यज्ञ, प्राण, प्रजापति और पशु नहीं रहते और वे टेढ़े चलने लगते हैं। इसलिये आज्ञा और याज्य मंत्र से पहले एक ऋचा बोलनी चाहिये। इसी प्रकार न तो वाणी थकेगी, न बोझ से दबेगी, न उसमें गड़बड़ होगी । न यज्ञ भंग होगा, न वे यज्ञ, प्राण, प्रजापति या पशुओं से च्युत होंगे और न टेढ़े चल सकेंगे। (४) १०—पहले दो सत्रों में प्रत्येक प्रस्थित याज्य से पहले परुच्छेप ऋषि वाली एक एक ऋचा को रखते हैं। इस छन्द का नाम रोहित है। इसके द्वारा इन्द्र सात स्वर्गों को चढ़ गया
दूसरा अध्याय ] ३०५ था । जो इस रहस्य को समझता है वह भी सात स्वर्गों को चढ़ जाता है । यहां शंका होती है कि जब पांच पदों की ऋचायें पांचवें दिन बोली जाती हैं और छः पदों की छठे दिन तो सात पद वाले छन्द छठे दिन क्यों पढ़े जायं । ( इसका उत्तर यह है ) कि छः पदों से छठे दिन को प्राप्त हो जाते हैं। लेकिन सातवें दिन को काट कर सातवें पद से ( स्वर्ग में ) स्थिर हो जाते हैं। इस प्रकार वह संतति या सिलसिले के लिए वाणी को प्राप्त कर लेते हैं। जो इस रहस्य को समझ कर कृत्य करते हैं उनका त्र्यह छिन्न-भिन्न नहीं होता । (५) ११—देवों और असुरों ने इन लोकों में झगड़ा किया । देवों ने छठे दिन के कृत्य से असुरों को इन लोकों से निकाल दिया। असुरों को जो कुछ हस्तगत हो सका उसको उन्होंने ल लिया और समुद्र में फेंक दिया। देव पीछे दौड़े और इस छन्द के द्वारा जो कुछ उन्होंने लिया था उसे छीन लाये । इस सातवें पद ने कटियां ( अंकुश ) का काम दिया जिससे समुद्र से चीज़ें निकाल ली गईं । इसलिये जो इस रहस्य को समझता है वह अपने शत्रु से धन छीन लेता है और सब लोकों से उनको निकाल देता है । (६) १२—छठे दिन का वाहक देवता द्यौ है। तैंतीस स्तोम हैं। रैवत साम है। अतिच्छन्द छन्द है। जो यह जानता है कि कौन देवता है, कौन स्तोम है, कौन साम है और कौन छन्द है, उसका यज्ञ सफल हो जाता है । छठे दिन का वही रूप है जो तीसरे दिन का अर्थात् समानोदर्क होना, 'अश्व' और 'अन्त' शब्द आना, पुनरावृत्ति, निवृत्ति ( rhyme ), रति या रमण करना, पर्याय, तीन, २०
३०६ [ पाँचवीं पञ्चिका अन्त का रूप, पिछले पद में देवता का निरूपण, परलोक का उल्लेख । सातवें दिन की और विशेषतायें यह हैं:-- सात पदों का परुच्छेप, नराशंस, नाभानेदिष्ठ, रैवत, अति- च्छन्द, और भूतकालिक क्रिया । जो तीसरे दिन का रूप है वही छठे दिन का है । "अयं जायत मनुषो धरीमणि" ( ऋ० १।१२८ ) आज्य शस्त्र का सूक्त है। इसका ऋषि परुच्छेप है, छन्द सात पदों का अतिच्छन्द है। यह छठे दिन का रूप है। प्र-उग शस्त्र ये हैं। इन सब का परुच्छेप ऋषि है और सात पदों वाला अतिच्छन्द है :-- स्तीर्णं बर्हिरुप नो याहि वीतये सहस्रेण नियुता नियुत्वते शतिनी- भिर्नियुत्वते । तुभ्यं हि पूर्वपीतये देवा देवाय येमिरे । प्र ते सुतासो मधुमन्तो अस्थिरन्मदाय क्रत्वे अस्थिरन् ॥ तुभ्यायं सोमः परिपूतो अद्रिभिः स्पार्हा वसानः परि कोशमर्षति शुक्रा वसानो अर्षति । तवायं भाग आयुषु सोमो देवेषु हूयते । वह वायो नियुतो याह्यस्मयुर्जुषाणो याह्यस्मयुः ॥ आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वरं सहस्रिणीभिरुप याहि वीतये वायो हव्यानि वीतये । तवायं भाग ऋत्वियः सरश्मिः सूर्ये सचा । अध्वर्युभिर्भरमाणा अयंसत वायो शुक्रा अयंसत ॥ ( ऋ० १।१३५।१-३ ) आ वां रथो नियुत्वान्वक्षदवसेऽभि प्रयांसि सुधितानि वीतये । वायो हव्यानि वीतये । पिबतं मध्वो अन्धसः पूर्वपेयं हि वां हितम् । वायवा चन्द्रेण राधसा गतमिन्द्रश्च राधसा गतम् ॥ आ वां धियो ववृत्युरध्वरां उपेममिन्दुं ममृजन्त वाजिन माशुमत्त्यं न वाजिनम् । तेषां पिबतमस्मयू आ नो गन्तमिहोत्या । इन्द्रवायू सुता- नामद्रिभिर्युवं मदाय वाजदा युवम् ॥
दूसरा अध्याय ] ३०७ इमे वां सोमा अप्सवा सुता इहाध्वर्युभिर्भरमाणा अयंसत वायो शुक्रा अयंसत । एते वामभ्यसृक्षत तिरः पवित्रमाशवः । युवायवोऽति रोमाशयण्व्या सोमासो अत्यण्व्या ॥ ( ऋ० १।१३५।४-६ ) सुषुमा यातमद्रिभिर्गों श्रीता मत्सरा इमें सोमासो मत्सरा इमे । आ राजाना दिविस्पृशाऽस्मत्रा गन्तमुपनः । इमे वां मित्रावरुणा गवाशिरः सोमाः शुक्रा गवाशिरः ॥ इम आ यातमिन्दवः सोमासो दध्याशिरः सुतासो दध्याशिरः । उत वामुषसो बुध्रि साकं सूर्यस्य रश्मिभिः । सुतो मित्राय वरुणाय पीतये चारुऋताय पीतये ॥ तां वां धेनुं न वासरीमंशुं दुहन्त्यद्रिभिः सोमं दुहन्त्यद्रिभिः । अस्मत्रा गन्तमुप नोऽर्वाञ्चा सोमपीतये । अयं वां मित्रावरुणा नृभिः सुतः सोम आ पीतये सुतः ॥ ( ऋ० १।१३७।१-३ ) अचेति दस्रा व्युनाकमूष्वथो युञ्जते वां रथयुजो दिविष्टुष्वध्व- स्मानो दिविष्टुषु । अधि वां स्थाम वन्धुरे रथे दस्रा हिरण्यये । पथेव यन्तावनुशास्ता रजोऽङ्कसा शासता रजः ॥ शचीभिनंः शचीवसू दिवा नक्तं दशस्यतम् । मा वां रातिरूप दसत् कदाचनास्मद्रातिः कदाचन ॥ वृषन्निन्द्र वृषपाणास इन्दव, इमे सुता अद्रिषुतास उद्भिदस्तुभ्यं सुतास उद्भिदः । ते त्वा मन्दन्तु दावने महे चित्राय राधसे । गीर्भिर्गिर्वाहः स्तवमान आ गहि सुमृडीको न आ गहि ॥ ( ऋ० २।१३६।४-६ ) अवर्मह इन्द्र दादृहि श्रुधी नः सुशोच हि द्यौः क्षा न भीषाँ अद्रिवो घृणान भीषाँ अद्रिवः । शुष्मिन्तमो हि शुष्मिभिर्वधैरुरु भिरीयसे । अपूरुषघ्नो अप्रतीत शूर सत्वभिज्ञिसत् : शूर सत्वभिः ॥ वनोति हि सुन्वन्त्क्षयं परीणसः सुन्वानो हि ष्मा यजत्यव द्विषो देवानामव द्विषः । सुन्वान इत्सिषा सति सहस्रा वाज्यवृतः । सुन्वाना- येन्द्रो ददात्याभुवं रयिं ददात्यभुवम् ॥ ( ऋ० १।१३३।६।७ )
३०८ [ पाँचवीं पञ्चिका अस्तु श्रौषट् पुरो अग्निं धिया दध आ नु तच्छर्धो दिव्यं वृणीमह इन्द्रवायू वृणीमहे । यद्ध क्राणा विवस्वति नामा सन्दायि नव्यसी । अथ प्र सू न उप यन्तु धीतयो देवां अच्छा न धीतयः ॥ ( ऋ० १।१३६।१ ) ओ ३म् शो अग्निं शृणुहि त्वमीडितो देवेभ्यो ब्रवसि यज्ञियेभ्यो राजभ्यो यज्ञियेभ्यः । यद्धत्यामङ्गिरोभ्यो धेनुं देवा अदत्तन । वितां दुहे अर्यमा कर्तरी सचाँ एष तां वेद मे सचा ॥ ( ऋ० १।१३९।७ ) ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश स्थ । अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम् ॥ (ऋ० १।१३९।११) इयमददाद् रभसमृणच्युतं दिवोदासं वध्र्यश्वाय दाशुषे । या शश्वन्तमा चखादावसं पणिं ता ते दात्राणि तविषा सरस्वति ॥ इयं शुष्मेभिर्बिसखा इवारुजत् सानु गिरीणां तविषे भिरूर्मिभिः । पारावतघ्नीमवसे सुवृक्तिभिः सरस्वतीमा विवासेम धीतिभिः ॥ सरस्वति देवनिदो नि बर्हय प्रजां विश्वस्य बृसयस्य मायिनः । उत क्षितिभ्योऽवनीरविन्दो विषमेभ्यो अस्रवो वाजिनीवति ॥ (ऋ० ६।६१।१-३) मरुत्वतीय शस्त्र का प्रतिपद् यह है :- स पूर्व्यो महानां वेनः ऋतुभिरानजे । यस्यद्वारा मनुष्पिता देवेषु धिय आनजे ॥ दिवो मानं नोऽसदन्त्सोमपृष्ठासो अद्रयः । उक्था ब्रह्म च शंस्या ॥ स विद्वां अङ्गिरोभ्य इन्द्रो गा अवृणोदप । स्तुषे तदस्य पौंस्यम् ॥ ( ऋ० ८।६३।१-३ ) 'महत्' अन्तशब्द है । अन्त छठे दिन का रूप है । नीचे की ऋचायें ( मरुत्वतीय शस्त्र की ) आतान ( appen- dages ) हैं और तीसरे दिन के समान हैं :- त्रय इन्द्रस्य सोमा...( ऋ० ८।२।७-६ ) इन्द्र नेदीय एदिहि...( ऋ० ८।५३।५-६)
दूसरा अध्याय ] ३०९ प्र नू॒नं ब्रह्म॑णस्पतिः... ( ऋ० १।४०।५-६) अग्निर्ने॒ता... ( ऋ० ३।२०।४ ) त्वं सोम॒ क्रतु॑भिः... ( ऋ० १।९१।२ ) पिन्व॒न्त्यपो॑ · ( ऋ० १।६४।६ ) न किः सुदासो॒ रथं... (ऋ० ७।३२।१०) “यं त्वं रथमंद्र मेधसातये” ( ऋ० १।१२९ ) यह परुच्छेप ऋषि का सूक्त है । अतिच्छन्द छन्द है और सात पद वाला है । यह छठे दिन का रूप है । “स यो वृषावृष्ण्येभिः समोका” ( ऋ० १।१०० ) यह समानोदर्क सूक्त है। यह छठे दिन का रूप है । “इन्द्रमरुत्व इह पाहि सोमम्” ( ऋ० ३।५१।७ ) इस सूक्त के ९वें मन्त्र में “तेभिः साकं पिबतुवृत्र खाद” ऐसा आया है । इसमें 'वृत्र खाद' 'अन्त' पद वाला है । यह छठे दिन का रूप है । त्रिष्टुप् छन्द के इस सूक्त से जिसके पद क्रायन हैं सवन को ठीक स्थान पर रक्खा जाता है और सवन गिरने नहीं पाता । 'अयं ह येन वा इदं' (ऋ० ८।७६।४) यह पर्यास है। इसमें 'स्वर्मकृत्वता जितम्' पद है, इसमें 'जितम्' अन्त वाला है। यह छठे दिन का रूप है । यह गायत्री छन्द में है। गायत्री मध्य सवन का वाहक है । जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा जाता है । गायत्री छन्द का निविद् रखते हैं । रेवतीर्नः सधमादे......( ऋ० १।३०।१३-१५ ) रेवाँ इन्द्रवन्तः स्तोता......( ऋ० ८।२१।१३-१५ ) यह रैवत पृष्ठ हैं । बृहत् छन्द में हैं । यह छठे दिन का रूप है । धाय्य वही है :—यद् वावान......
३१० [ पाँचवीं पञ्चिका त्वामिद्धि हवामहे ( ऋ० ६।४६।१-२ ) से होता बृहत् योनि की ओर सब को फेरता है। क्योंकि क्रमानुसार यह बृहत् दिवस है। इन्द्रमिद्धे वतातये ( ऋ० ८।३।५-६ ) यह साम प्रगाथ है। इसमें निवृत्त आता है। यह छठे दिन का रूप है। तार्क्ष्य वही है :- त्यमुषु वाजिनं देवजूतम् । ( ७ ) १३- "एन्द्र पाह्य_पनः परावतो" ( १।१३० ) यह परुच्छेप ऋषि का सूक्त है। छन्द अतिच्छन्द है और इसमें सात पद हैं। यह छठे दिन का रूप है। "प्र घा न्वस्य महतो महानि" ( ऋ० २।१५ ) यह समानोदर्क है और छठे दिन का रूप है। 'अभूरकोरयिपतेरयीणाम्' ( ऋ० ६।३१ ) इस सूक्त में ५ वें मंत्र में यह पद है "रथमा तिष्ठतु विन्तृम्णाभीमम्' इसमें 'स्था' धातु का 'तिष्ठतु' अन्तवाला है। यह छठे दिन का रूप है। त्रिष्टुभ् छन्द के इस रूप से सवन स्थित रहता है और गिरने नहीं पाता। उप नो हरिभिः सुतम् ( ऋ० ८।९३।३१-३३ ) यह समानोदर्क पर्यास है। यह छठे दिन का रूप है। यह गायत्री छन्द में है। गायत्री इस त्र्यह के मध्य सवन का वाहक है। जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा जाता है। इसलिये यह गायत्री छन्द वाला निविद् रक्खा गया है। वैश्वदेव शस्त्र का प्रतिपद् यह है- अभित्यं देवं सवितारमोण्योः ( यजु० ४।२५ ) यह अतिच्छन्द छन्द में है। यह छठे दिन का रूप है। इसके अनुचर यह हैं:-
दूसरा अध्याय ] ३११ तत्सवितुर्वरेण्यम् ( ३।६२।१०-११ ) दोषो अगात् यहाँ 'अगात्' जाने के अर्थ में 'अन्त' वाला है । यह छठे दिन का रूप है । सविता का निविद् सूक्त यह है :— उदुष्य देवः सविता सवाय ( ऋ० २।३८ ) इसमें 'शश्वत्तमं तदपावह्निरस्थात्' में 'स्थ' अन्त वाला है । द्यावापृथिवी का निविद् सूक्त यह है :— कतरा पूर्वा कतरापरायोः••••••( ऋ० १।१८५।१ ) यह समानोदर्क है । यह छठे दिन का रूप है । किमुश्रेष्ठः किं यविष्ठो न आजगन्••••••( ऋ० १।१६१ ) उपनोवाजा अध्वरमुमुक्षा••••••( ऋ० ४।३७ ) यह ऋतुओं का नाराशंसी सूक्त है । इसमें 'त्रि' शब्द है । यह छठे दिन का रूप है । नीचे के दो सूक्त वैश्वदेव (नाभानेदिष्ठ) के हैं :— इदमित्थारौद्रं गूर्तवचा••••••( ऋ० १०।६१ ) ये यज्ञेन दक्षिणाया समक्ता••••••( ऋ० १०।६२ ) ( ८ ) १४—अब नाभानेदिष्ठ पढ़ता है । नाभानेदिष्ठ मनु का पुत्र था जो ब्रह्मचर्य आश्रम में था । उसके भाइयों ने उसको घर की सम्पत्ति से अलग कर दिया । उसने भाइयों के पास आकर कहा, "मेरा कितना भाग है ?" उन्होंने कहा, "फैसला करने वाले के पास जा" । इससे उनका आशय पिता से था । इसलिये पिता को पुत्रों के झगड़ों का फैसला करने वाला कहते हैं । वह पिता के पास आया और बोला, "यह मेरा भाग बाँट कर खा गये ।"
३१२ [ पाँचवीं पञ्चिका पिता ने कहा, "पुत्र, चिंता मत कर। अंगिरा स्वर्ग लोक के लिये सत्र कर रहे हैं। जब वह छठे दिन का कृत्य करने बैठते हैं वह भूल जाते हैं। उनसे छठे दिन के यह दोनों सूक्त (१०।६१,६२) पढ़वाओ। वे तुझको एक सहस्र देंगे जो कि सत्र करने वाले दिया करते हैं"। उसने कहा "अच्छा!"। वह तब उनके पास गया और कहा कि हे बुद्धि वाले लोगो ! मुझ मनु के पुत्र को ले लो"। उन्होंने कहा, "तुम क्या चाहते हो जो ऐसा कहते हो" ? उसने कहा, "मैं तुमको छठे दिन का कृत्य करने की विधि बताऊंगा। और जब तुम स्वर्ग को जाने लगो तो मुझे सत्र की दक्षिणा एक सहस्र देना"। उन्होंने उसने उनसे छठे दिन उन दो सूक्तों का पाठ कराया। तब उनको यज्ञ और स्वर्गलोक का ज्ञान हुआ। इसलिये छठे दिन यह दो सूक्त पढ़े जाते हैं कि यजमान को यज्ञ का ज्ञान हो जाय और स्वर्गलोक का निर्देश हो जाय। जब वह स्वर्ग को जाने लगे तो उन्होंने कहा, "हे ब्राह्मण यह सहस्र तुम्हारा है"। जब वह इस सहस्र को इकट्ठा कर रहा था तो एक मैले से कपड़ों का आदमी उतरा और कहने लगा, "यह मेरा है, मैं इसे यहाँ छोड़ गया था"। उसने कहा "यह मुझे अंगिरा दे गये हैं !" तब उसने कहा, "तो यह हममें से एक का है, तेरे पिता निश्चय करेंगे। वह अपन के पास गया। पिता ने पूछा, "क्या अंगिरा ने तुझे दक्षिणा नहीं दी?" उसने कहा, "उन्होंने तो दी थी। लेकिन एक मैले कपड़े
दूसरा अध्याय ] ३१३ वाला उतरा और मेरे पास आकर कहने लगा कि यह मेरा है। मैं इसे यहाँ छोड़ गया था। यह कह कर उसने ले लिया"। उसके पिता ने कहा, "बेटा, यह उसी का है। लेकिन वह तुमको दे देगा"। वह उसके पास गया और कहा, "मेरे पिता ने कहा है कि यह तुम्हारा ही है"। उसने कहा, "मैं तुमको देता हूँ क्योंकि तुमने सच बोला"। इस लिये विद्वान् को सच ही बोलना चाहिये। यह नाभा- नेदिष्ठ का सहस्र वाला मंत्र है। जो इस रहस्य को समझता है उसके ऊपर 'सहस्र' की वर्षा होती है। और वह छठे दिन के द्वारा स्वर्ग के दर्शन रता है। (९) १५—अब (वैश्वदेव शस्त्रके) सहचर सूक्त पढ़ता है, जैसे नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि, एवया मरुत। यदि इनमें से कोई छूट जाय तो यजमान को क्षति होगी। यदि नाभानेदिष्ठ छूट जाय तो यजमान को वीर्य की क्षति होगी। बालखिल्य छूट जाय तो प्राणों की। वृषाकपि छूट जाय तो आत्मा की। एवयामरुत छूट जाय तो प्रतिष्ठा की। अर्थात् मनुष्यों और देवों में जो उसकी प्रतिष्ठा है वह जाती रहे! नाभानेदिष्ठ से वह यजमान में वीर्य धारण कराता है। बालखिल्य से आकृति धारण कराता है। कक्षीवान् के पुत्र सुकीर्ति ने इस सूक्त के द्वारा गर्भ को बच्चा उत्पन्न करने योग्य बनाया। इसके पहले मंत्र में (ऋ० १०।१३१।१) आया है "उरौ यथा तव शर्मन् मदेम" (हे इन्द्र, हम तेरे उदार शरण में सुख पावें)। इस लिये गर्भ चाहें बड़ा हो और योनि छोटी हो तब भी वह उसे हानि नहीं पहुँचाता। अगर ब्रह्म सुकीर्ति सूक्त द्वारा योनि को सुरक्षित रखता है, तो यजमान एवयामरुत सूक्त (ऋ० ५।८७) द्वारा गतिवान हो जाता है। यदि यजमान
३१४ [ पाँचवीं पञ्चिका के लिये यह सब किया जाय तो यजमान चलने के योग्य हो जाता है । अग्निमारुतशस्त्र का प्रतिपद् यह है :— अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च वि वर्तेते रजसी वेद्याभिः । वैश्वानरो जायमानो न राजाऽवातिरज् ज्योतिषाग्निस्तमांसि ॥ ( ऋ० ६।६।१ ) 'अहः' 'अहः' यह पुनरावृत्ति और निवृत्ति है, यह छठे दिन का रूप है । 'मध्वो वो नाम मारुतं यजत्रा' यह मरुत सूक्त है । यह बहुवचन है । बहुवचन 'अन्त' वाला है । यह छठे दिन का रूप है । जातवेदस मंत्र वही है “जातवेदसे सुनवाम” ( १।९९।१ ) जातवेदस का निविद् सूक्त “स प्रत्नथा सहसा जायमानः” ( १।९६।१ ) है । यह समानोदर्क है, यह छठे दिन का रूप है । इस सूक्त के हर मंत्र में 'धारयन्' आता है । इस प्रकार ऋत्विज् यज्ञ को दोनों सिरों पर बाँधता है जैसे रस्सी को दोनों सिरों पर बाँधते हैं, ( आग्रन्थन और निर्ग्रन्थन ) सादी गाँठ और लपेट की गाँठ । यह जैसे किसी चीज को दो खूटियाँ गाड़ कर तान देते हैं, यह यज्ञ की निर्विघ्नता के लिये किया जाता है । जो इस रहस्य को समझते हैं उनका यह् निर्विघ्न समाप्त हो जाता है । ( १० ) ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ।