ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०० [ पाँचवीं पञ्चिका ( मरुत्वतीय शस्त्र के ) आतान वहीँ हैं जो दूसरे दिन के:— इन्द्र इत् सोमपा एक...... (ऋ० ८।२।४) इन्द्र नेदीय एदिहि (ऋ० ८।५३।५) उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते (ऋ० १।४०।१) अग्निर्नेता (ऋ० ३।२०।४) त्वं सोम क्रतुभिः (ऋ० १।९१।२) पिन्वन्ति अपो (ऋ० १।६४।६) बृहदिन्द्राय गायत (ऋ० ८।८९।१) यह पाँचवें दिन का रूप है । अवितासि सुन्वतो वृक्त बर्हिषः... (ऋ० ८।३६) इस सूक्त में 'मद' शब्द है । इसके पहले मंत्र में पाँच पद हैं और पंक्ति छन्द है । यह पाँचवें दिन का रूप है । इत्था हि सोम इन्मदे... (ऋ० १।८०) इस भी 'मद' शब्द है । पाँच पद हैं और पंक्ति छन्द है । यह पाँचवें दिन का रूप है । इन्द्र पिब तुभ्यं सुतोमदाय...... (ऋ० ६।४०) इसमें भी 'मद' है । यह त्रिष्टुभ् है । इस पद से जो प्रतिष्ठित है, सवन की प्रतिष्ठा होती है कि कहीं गिर न पड़े । नीचे का तृच पर्यास है :— मरुत्वाँ इन्द्र मीढ्वः पिबासोमं शतक्रतो । अस्मिन् यज्ञे पुरुष्टुत ॥ तुभ्येदिन्द्र मरुत्वते सुताः सोमासो अद्रिवः । हृदा हूयन्त उक्थिनः ॥ पिबेदिन्द्र मरुत्सखा सुतं सोमं दिविष्टुषु । वज्रं शिशान ओजसा ॥ (ऋ० ८।७६।७-९) इनमें न 'प्र' है न 'अ' । यह पाँचवें दिन का रूप है । गायत्री छन्द में हैं । यह गायत्री इस त्र्यह के मध्यसवन को वाहक है । वाहक वही छन्द होता है जिसमें निविद् सूक्त