ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 315, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] ३०१ होता है । इसलिये निविद् को गायत्री छन्द में ही रखते हैं । (१) ७-पाँचवें दिन जो रथंतर दिन है शाक्वर स्वर से महा- नाम्नी का पाठ होता है । यह पाँचवें दिन का रूप है । इन्द्र ने इनके द्वारा अपने को महान् बनाया था । इस लिये उनका महानाम्नी नाम पड़ा । यह लोक भी महानाम्नी हैं क्योंकि यह बड़े हैं । जब प्रजा- पति ने इन सब को बनाया, तो इन सबके बनाने की उसमें शक्ति थी । चूँकि यह सृष्टि रच कर उसमें सब शक्तियाँ थीं इस लिये उनसे 'शक्वरी' उत्पन्न हुईं । इस लिये इनका नाम शक्वरी है । जो सोमा से बाहर पैदा हो गये वह सीमा से बाहर हो गये इसलिये 'सिमा' कहते हैं । यही सिमा का सिमात्व है । नीचे के मंत्र निष्केवल्य शस्त्र के "अनुरूप" हैं । स्वादो रित्था विषूवत··· (१।८४।१०) उप नो हरिभिः सुतम्··· (८।६३।३१) इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्··· (१।११।१) इनमें 'वृषन्', 'वृत्रिः', 'मद्' और 'वृधन्' शब्द आये हैं । यह पाँचवें दिन का रूप हैं । धाय्या वही है यद् वावान ॥ यह क्रम के अनुसार रथंतर दिन है । इसलिये अभित्वा शूर नोनुमो··· (७।३२।२२) पढ़ने से होता रथंतर की योनि की ओर लौटाता है । मोषु त्वा वाघतश्चन··· (७।३२।१-२) साम प्रगाथ है । इसमें एक पद अधिक है । यह पशुओं का रूप है । जो पाँचवें दिन का रूप है । तार्क्ष्य वही है अर्थात् त्यमूषु वाजिनं । (१०।१७८।१) (२) ८—प्रैदं ब्रह्मवृत्रतूर्येष्वाविथ··· (८।३७ )