भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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दूसरा अध्याय ] ३०९ प्र नू॒नं ब्रह्म॑णस्पतिः... ( ऋ० १।४०।५-६) अग्निर्ने॒ता... ( ऋ० ३।२०।४ ) त्वं सोम॒ क्रतु॑भिः... ( ऋ० १।९१।२ ) पिन्व॒न्त्यपो॑ · ( ऋ० १।६४।६ ) न किः सुदासो॒ रथं... (ऋ० ७।३२।१०) “यं त्वं रथमंद्र मेधसातये” ( ऋ० १।१२९ ) यह परुच्छेप ऋषि का सूक्त है । अतिच्छन्द छन्द है और सात पद वाला है । यह छठे दिन का रूप है । “स यो वृषावृष्ण्येभिः समोका” ( ऋ० १।१०० ) यह समानोदर्क सूक्त है। यह छठे दिन का रूप है । “इन्द्रमरुत्व इह पाहि सोमम्” ( ऋ० ३।५१।७ ) इस सूक्त के ९वें मन्त्र में “तेभिः साकं पिबतुवृत्र खाद” ऐसा आया है । इसमें 'वृत्र खाद' 'अन्त' पद वाला है । यह छठे दिन का रूप है । त्रिष्टुप् छन्द के इस सूक्त से जिसके पद क्रायन हैं सवन को ठीक स्थान पर रक्खा जाता है और सवन गिरने नहीं पाता । 'अयं ह येन वा इदं' (ऋ० ८।७६।४) यह पर्यास है। इसमें 'स्वर्मकृत्वता जितम्' पद है, इसमें 'जितम्' अन्त वाला है। यह छठे दिन का रूप है । यह गायत्री छन्द में है। गायत्री मध्य सवन का वाहक है । जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा जाता है । गायत्री छन्द का निविद् रखते हैं । रेवतीर्नः सधमादे......( ऋ० १।३०।१३-१५ ) रेवाँ इन्द्रवन्तः स्तोता......( ऋ० ८।२१।१३-१५ ) यह रैवत पृष्ठ हैं । बृहत् छन्द में हैं । यह छठे दिन का रूप है । धाय्य वही है :—यद् वावान......