ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
दूसरा अध्याय ] ३०९ प्र नू॒नं ब्रह्म॑णस्पतिः... ( ऋ० १।४०।५-६) अग्निर्ने॒ता... ( ऋ० ३।२०।४ ) त्वं सोम॒ क्रतु॑भिः... ( ऋ० १।९१।२ ) पिन्व॒न्त्यपो॑ · ( ऋ० १।६४।६ ) न किः सुदासो॒ रथं... (ऋ० ७।३२।१०) “यं त्वं रथमंद्र मेधसातये” ( ऋ० १।१२९ ) यह परुच्छेप ऋषि का सूक्त है । अतिच्छन्द छन्द है और सात पद वाला है । यह छठे दिन का रूप है । “स यो वृषावृष्ण्येभिः समोका” ( ऋ० १।१०० ) यह समानोदर्क सूक्त है। यह छठे दिन का रूप है । “इन्द्रमरुत्व इह पाहि सोमम्” ( ऋ० ३।५१।७ ) इस सूक्त के ९वें मन्त्र में “तेभिः साकं पिबतुवृत्र खाद” ऐसा आया है । इसमें 'वृत्र खाद' 'अन्त' पद वाला है । यह छठे दिन का रूप है । त्रिष्टुप् छन्द के इस सूक्त से जिसके पद क्रायन हैं सवन को ठीक स्थान पर रक्खा जाता है और सवन गिरने नहीं पाता । 'अयं ह येन वा इदं' (ऋ० ८।७६।४) यह पर्यास है। इसमें 'स्वर्मकृत्वता जितम्' पद है, इसमें 'जितम्' अन्त वाला है। यह छठे दिन का रूप है । यह गायत्री छन्द में है। गायत्री मध्य सवन का वाहक है । जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा जाता है । गायत्री छन्द का निविद् रखते हैं । रेवतीर्नः सधमादे......( ऋ० १।३०।१३-१५ ) रेवाँ इन्द्रवन्तः स्तोता......( ऋ० ८।२१।१३-१५ ) यह रैवत पृष्ठ हैं । बृहत् छन्द में हैं । यह छठे दिन का रूप है । धाय्य वही है :—यद् वावान......
३१० [ पाँचवीं पञ्चिका त्वामिद्धि हवामहे ( ऋ० ६।४६।१-२ ) से होता बृहत् योनि की ओर सब को फेरता है। क्योंकि क्रमानुसार यह बृहत् दिवस है। इन्द्रमिद्धे वतातये ( ऋ० ८।३।५-६ ) यह साम प्रगाथ है। इसमें निवृत्त आता है। यह छठे दिन का रूप है। तार्क्ष्य वही है :- त्यमुषु वाजिनं देवजूतम् । ( ७ ) १३- "एन्द्र पाह्य_पनः परावतो" ( १।१३० ) यह परुच्छेप ऋषि का सूक्त है। छन्द अतिच्छन्द है और इसमें सात पद हैं। यह छठे दिन का रूप है। "प्र घा न्वस्य महतो महानि" ( ऋ० २।१५ ) यह समानोदर्क है और छठे दिन का रूप है। 'अभूरकोरयिपतेरयीणाम्' ( ऋ० ६।३१ ) इस सूक्त में ५ वें मंत्र में यह पद है "रथमा तिष्ठतु विन्तृम्णाभीमम्' इसमें 'स्था' धातु का 'तिष्ठतु' अन्तवाला है। यह छठे दिन का रूप है। त्रिष्टुभ् छन्द के इस रूप से सवन स्थित रहता है और गिरने नहीं पाता। उप नो हरिभिः सुतम् ( ऋ० ८।९३।३१-३३ ) यह समानोदर्क पर्यास है। यह छठे दिन का रूप है। यह गायत्री छन्द में है। गायत्री इस त्र्यह के मध्य सवन का वाहक है। जो छन्द वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा जाता है। इसलिये यह गायत्री छन्द वाला निविद् रक्खा गया है। वैश्वदेव शस्त्र का प्रतिपद् यह है- अभित्यं देवं सवितारमोण्योः ( यजु० ४।२५ ) यह अतिच्छन्द छन्द में है। यह छठे दिन का रूप है। इसके अनुचर यह हैं:-
दूसरा अध्याय ] ३११ तत्सवितुर्वरेण्यम् ( ३।६२।१०-११ ) दोषो अगात् यहाँ 'अगात्' जाने के अर्थ में 'अन्त' वाला है । यह छठे दिन का रूप है । सविता का निविद् सूक्त यह है :— उदुष्य देवः सविता सवाय ( ऋ० २।३८ ) इसमें 'शश्वत्तमं तदपावह्निरस्थात्' में 'स्थ' अन्त वाला है । द्यावापृथिवी का निविद् सूक्त यह है :— कतरा पूर्वा कतरापरायोः••••••( ऋ० १।१८५।१ ) यह समानोदर्क है । यह छठे दिन का रूप है । किमुश्रेष्ठः किं यविष्ठो न आजगन्••••••( ऋ० १।१६१ ) उपनोवाजा अध्वरमुमुक्षा••••••( ऋ० ४।३७ ) यह ऋतुओं का नाराशंसी सूक्त है । इसमें 'त्रि' शब्द है । यह छठे दिन का रूप है । नीचे के दो सूक्त वैश्वदेव (नाभानेदिष्ठ) के हैं :— इदमित्थारौद्रं गूर्तवचा••••••( ऋ० १०।६१ ) ये यज्ञेन दक्षिणाया समक्ता••••••( ऋ० १०।६२ ) ( ८ ) १४—अब नाभानेदिष्ठ पढ़ता है । नाभानेदिष्ठ मनु का पुत्र था जो ब्रह्मचर्य आश्रम में था । उसके भाइयों ने उसको घर की सम्पत्ति से अलग कर दिया । उसने भाइयों के पास आकर कहा, "मेरा कितना भाग है ?" उन्होंने कहा, "फैसला करने वाले के पास जा" । इससे उनका आशय पिता से था । इसलिये पिता को पुत्रों के झगड़ों का फैसला करने वाला कहते हैं । वह पिता के पास आया और बोला, "यह मेरा भाग बाँट कर खा गये ।"
३१२ [ पाँचवीं पञ्चिका पिता ने कहा, "पुत्र, चिंता मत कर। अंगिरा स्वर्ग लोक के लिये सत्र कर रहे हैं। जब वह छठे दिन का कृत्य करने बैठते हैं वह भूल जाते हैं। उनसे छठे दिन के यह दोनों सूक्त (१०।६१,६२) पढ़वाओ। वे तुझको एक सहस्र देंगे जो कि सत्र करने वाले दिया करते हैं"। उसने कहा "अच्छा!"। वह तब उनके पास गया और कहा कि हे बुद्धि वाले लोगो ! मुझ मनु के पुत्र को ले लो"। उन्होंने कहा, "तुम क्या चाहते हो जो ऐसा कहते हो" ? उसने कहा, "मैं तुमको छठे दिन का कृत्य करने की विधि बताऊंगा। और जब तुम स्वर्ग को जाने लगो तो मुझे सत्र की दक्षिणा एक सहस्र देना"। उन्होंने उसने उनसे छठे दिन उन दो सूक्तों का पाठ कराया। तब उनको यज्ञ और स्वर्गलोक का ज्ञान हुआ। इसलिये छठे दिन यह दो सूक्त पढ़े जाते हैं कि यजमान को यज्ञ का ज्ञान हो जाय और स्वर्गलोक का निर्देश हो जाय। जब वह स्वर्ग को जाने लगे तो उन्होंने कहा, "हे ब्राह्मण यह सहस्र तुम्हारा है"। जब वह इस सहस्र को इकट्ठा कर रहा था तो एक मैले से कपड़ों का आदमी उतरा और कहने लगा, "यह मेरा है, मैं इसे यहाँ छोड़ गया था"। उसने कहा "यह मुझे अंगिरा दे गये हैं !" तब उसने कहा, "तो यह हममें से एक का है, तेरे पिता निश्चय करेंगे। वह अपन के पास गया। पिता ने पूछा, "क्या अंगिरा ने तुझे दक्षिणा नहीं दी?" उसने कहा, "उन्होंने तो दी थी। लेकिन एक मैले कपड़े
दूसरा अध्याय ] ३१३ वाला उतरा और मेरे पास आकर कहने लगा कि यह मेरा है। मैं इसे यहाँ छोड़ गया था। यह कह कर उसने ले लिया"। उसके पिता ने कहा, "बेटा, यह उसी का है। लेकिन वह तुमको दे देगा"। वह उसके पास गया और कहा, "मेरे पिता ने कहा है कि यह तुम्हारा ही है"। उसने कहा, "मैं तुमको देता हूँ क्योंकि तुमने सच बोला"। इस लिये विद्वान् को सच ही बोलना चाहिये। यह नाभा- नेदिष्ठ का सहस्र वाला मंत्र है। जो इस रहस्य को समझता है उसके ऊपर 'सहस्र' की वर्षा होती है। और वह छठे दिन के द्वारा स्वर्ग के दर्शन रता है। (९) १५—अब (वैश्वदेव शस्त्रके) सहचर सूक्त पढ़ता है, जैसे नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि, एवया मरुत। यदि इनमें से कोई छूट जाय तो यजमान को क्षति होगी। यदि नाभानेदिष्ठ छूट जाय तो यजमान को वीर्य की क्षति होगी। बालखिल्य छूट जाय तो प्राणों की। वृषाकपि छूट जाय तो आत्मा की। एवयामरुत छूट जाय तो प्रतिष्ठा की। अर्थात् मनुष्यों और देवों में जो उसकी प्रतिष्ठा है वह जाती रहे! नाभानेदिष्ठ से वह यजमान में वीर्य धारण कराता है। बालखिल्य से आकृति धारण कराता है। कक्षीवान् के पुत्र सुकीर्ति ने इस सूक्त के द्वारा गर्भ को बच्चा उत्पन्न करने योग्य बनाया। इसके पहले मंत्र में (ऋ० १०।१३१।१) आया है "उरौ यथा तव शर्मन् मदेम" (हे इन्द्र, हम तेरे उदार शरण में सुख पावें)। इस लिये गर्भ चाहें बड़ा हो और योनि छोटी हो तब भी वह उसे हानि नहीं पहुँचाता। अगर ब्रह्म सुकीर्ति सूक्त द्वारा योनि को सुरक्षित रखता है, तो यजमान एवयामरुत सूक्त (ऋ० ५।८७) द्वारा गतिवान हो जाता है। यदि यजमान
३१४ [ पाँचवीं पञ्चिका के लिये यह सब किया जाय तो यजमान चलने के योग्य हो जाता है । अग्निमारुतशस्त्र का प्रतिपद् यह है :— अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च वि वर्तेते रजसी वेद्याभिः । वैश्वानरो जायमानो न राजाऽवातिरज् ज्योतिषाग्निस्तमांसि ॥ ( ऋ० ६।६।१ ) 'अहः' 'अहः' यह पुनरावृत्ति और निवृत्ति है, यह छठे दिन का रूप है । 'मध्वो वो नाम मारुतं यजत्रा' यह मरुत सूक्त है । यह बहुवचन है । बहुवचन 'अन्त' वाला है । यह छठे दिन का रूप है । जातवेदस मंत्र वही है “जातवेदसे सुनवाम” ( १।९९।१ ) जातवेदस का निविद् सूक्त “स प्रत्नथा सहसा जायमानः” ( १।९६।१ ) है । यह समानोदर्क है, यह छठे दिन का रूप है । इस सूक्त के हर मंत्र में 'धारयन्' आता है । इस प्रकार ऋत्विज् यज्ञ को दोनों सिरों पर बाँधता है जैसे रस्सी को दोनों सिरों पर बाँधते हैं, ( आग्रन्थन और निर्ग्रन्थन ) सादी गाँठ और लपेट की गाँठ । यह जैसे किसी चीज को दो खूटियाँ गाड़ कर तान देते हैं, यह यज्ञ की निर्विघ्नता के लिये किया जाता है । जो इस रहस्य को समझते हैं उनका यह् निर्विघ्न समाप्त हो जाता है । ( १० ) ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ।
तीसरा अध्याय १६—'अ' और 'प्र' सातवें दिन के रूप हैं। सातवाँ दिन पहले के समान है। युक्त, रथ, आशु, पिब, पहले पाद में देवता का निर्वचन, इस लोक का उल्लेख, जात, अनिरुक्त और भविष्य कालिक क्रिया यह जो पहले दिन के रूप हैं वही सातवें दिन के रूप हैं। आज्य सूक्त यह है :— समुद्रादूर्भिर्मधुमाँ उदारत (ऋ० ४।५८।१) यहाँ कुछ अनिरुक्त है। यह सातवें दिन का रूप है। समुद्र वाणी है। क्योंकि न वाणी क्षीण होती है न समुद्र। इस लिये यह सातवें दिन का आज्य है। यज्ञ से ही यज्ञ तानते हैं। और वाणी को प्राप्त करते हैं। संतति अर्थात् सिलसिले के लिये। जो इस रहस्य को समझ कर यज्ञ करते हैं उनका त्र्यह छिन्न भिन्न नहीं होता। छठे दिन स्तोम समाप्त हो जाते हैं और छन्द समाप्त हो जाते हैं। जैसे दर्शपूर्णमास—इष्टि में आज्य पर घृत डाल कर उसे ताजा करते हैं, उसी प्रकार सातवें दिन के आज्य शस्त्र से स्तोम ( ३१५ )
३१६ [ पाँचवीं पञ्चिका और छन्दों को फिर ताजा करते हैं। छन्द त्रिष्टुभ् है क्योंकि यह इस त्र्यह के प्रातः सवन् का छन्द है। प्र-उग शस्त्र यह है :- आ वायो भूष शुचिपा उप नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववार। उपो ते अन्धो मद्यमयासि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयम् ॥ ( ऋ० ७।६२।१ ) प्र याभिर्यासि दाश्वांसमच्छा नियुद्भिर्वायविष्टये दुरोणे। नि नो रयिं सुभोजसं युवस्व निवीरं गव्यमश्व्यं च राधः॥ ( ऋ० ७।६२।३ ) प्र सोता जीरो अध्वरेष्वस्थात् सोममिन्द्राय वायवे पिबध्यै। प्र यद्वां मध्वो अग्रियं भरन्त्यध्वर्यवो देवयन्तः शचीभिः॥ ( ऋ० ७।९२।२ ) ये वायव इन्द्रमादनास आदेवासो नितोशनासो अर्यः। घ्नन्तो वृत्राणि सूरिभिः ष्याम सासह्वांसो युधा :नृभिरमित्रान् ॥ ( ऋ० ७।६२।४ ) या वां शतं नियुतो याः सहस्रमिन्द्रवायू विश्ववाराः सचन्ते। आभिर्यातं सुविदत्राभिर्वाक् पातं नरा प्रतिभृतस्य मध्वः॥ ( ऋ० ७।६१।६ ) प्र यद्वां मित्रावरुणा स्पूर्धन् प्रिया धाम युवधिता मिनन्ति। न ये देवास ओहसा न मर्ता अयज्ञ साचो अप्यो न पुत्राः॥ वि यद्वाचं कीस्तासो भरन्ते शंसन्ति के चिन्निविदो मनानाः। आद्वां ब्रवाम सत्यान्युक्था नकिर्देवेभिर्यतथो महित्वा॥ अवोरित्था वां छर्दिषो अभिष्टौ युवोर्मित्रा वरुणावस्कृधोयु। अनु यद् गावः स्फुरानृजिप्यं धृष्णुं यद्रणे वृषणं युनजन्॥ ( ऋ० ६।६७।६-११ ) आ गोमता नासत्या रथेनाऽश्वावता पुरुश्चन्द्रेण यातम्। अभि वां विश्वा नियुतः सचन्ते स्पार्हया श्रिया तन्वा शुभाना॥ आ नो देवेभिरुप यातमर्वाक् सजोषा नासत्या रथेन। युवोर्हिं नः सख्या पित्र्याणि समानो बन्धुरुत तस्यवित्तम्॥
तीसरा अध्याय ] ३१७ उदुस्तोमासो अश्वनोरुबुध्रञ्जामि ब्रह्माह्युषसश्च देवीः । आवविवास- नू रोदसी धिषण्येमे अच्छा विप्रो नासत्या विवक्ति ॥ (ऋ० ७।७२।१-३) आ नो देव शवसा याहि शुष्मिन् भवा वृध इन्द्र रायो अस्य । महे नृम्णाय नृपते सुवज्र महिष्ठत्राय पौंस्याय शूर ॥ हवन्त उ त्वा हव्यं विवाचि तनूषु शूराः सूर्यस्य सातौ । त्वं विश्वेषु सेन्यो जनेषु त्वं वृत्राणि रन्धया सुहन्तु ॥ अहा यदिन्द्र सुदिना व्युच्छाद्दधो यत् केतुमुपमं समत्सु । न्यग्निः सीददसुरो न होता हुवानो अत्र सुभगाय देवान् ॥ ( ऋ० ७।३०।१-३ ) प्र वो यज्ञेषु देवयन्तो अर्चये द्यावा नमोभिः पृथिवी इषध्यै । येषां ब्रह्माण्यसमानि विप्रा विष्वाग् वियन्ति वनिनो न शाखाः । प्र यज्ञ एतु हेत्वो सप्तिरुद्यच्छध्वं समनसो घृताचीः । स्तृणीत बर्हिरध्वराय साधूर्ध्वा शोचींषि देवयून्यस्थुः ॥ आ पुत्रासो न मातरं विभृत्राः सानौ देवासो बर्हिषः सदन्तु । आ विश्वाची विदथ्यामनक्त्वग्ने मा नो देवतातार्मुधस्कः ॥ ( ऋ० ७।४३।१-३ ) प्र क्षोदसा धायसा सस्र एषा सरस्वती धरुणमायसीपूः । प्रबाबधाना रथ्येव याति विश्वा अपो महिना सिन्धुरन्याः ॥ एकाचेतत् सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्य आ समुद्रात् । रायश्चेतन्ती भुवनस्य भूरेर्घृतं पयो दुदुहे नाहुषाय ॥ संवावृधे । नर्यो ऽयोषणासु वृषा शिशुर्वृषभो यज्ञियासु । स वाजिनं मघवद्भ्यो दधाति वि सातये तन्वं मामृजीत ॥ ( ऋ० ७।९५।१-३ ) इन मंत्रों में 'आ' और 'प्र' आये हैं । यह सातवें दिन का रूप है । यह त्रिष्टुभ छन्द में हैं । इस त्र्यह के प्रातः सवन का छन्द त्रिष्टुभ् है ।
३१८ [ पाँचवीं पञ्चिका सातवें दिन के आहान मंत्र वही हैं जो पहले दिन के और यह सातवें दिन का रूप है। वे मंत्र यह हैं :- आ त्वा रथं ( ८।६८।१-२ ) इदं वसो सुतं ( ८।२।१-२ ) इन्द्र नेदीय ( ८।५३।५-६ ) प्र तु ब्रह्मणस्पतिः ( १।४०।३-४ ) अग्निंनेता ( ३।२०।४ ) त्वं सोम क्रतुभिः ( १।६१।२ ) पिन्वन्त्यपः ( १।६४।६ ) प्र व इन्द्राय बृहते ( ८।८६।३ ) “कया शुभा सवयसः सनीडा” ( १।१६५ ) में “न जाय- मानो नशते न जात” यह पद आया है। इसमें 'जात' शब्द है। यह सातवें दिन का रूप है। इस 'कयाशुभीय' सूक्त से एकमत और दीर्घायु होती है। इस कयाशुभीय सूक्त के द्वारा इन्द्र, अगस्त्य और मरुत एकमत हो गये थे। 'कयाशुभीय' सूक्त के पढ़ने से होता एकमत करता है। लेकिन यह दीर्घायु भी करता है। जो इसकी कामना करे वह 'कयाशुभीय' सूक्त का पाठ करे। यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इसके ठहरे हुये पद से होता सवन को ठीक स्थान पर कायम रखता है और गिरने नहीं देता। “त्यं सुमेषं महयास्वर्विदम्” ( १।५२ ) इस सूक्त में पहले मंत्र के दूसरे पद में “अत्यं न वाजं ह वनस्य दं रथम्” में 'रथ' शब्द आया है यह सातवे दिन का रूप है। यह जगती छन्द में है। इस व्यह के मध्य सवन का छन्द जगती है। जो छन्द वाहक होता है उसों में निविद् रक्खा जाता है। इस लिये निविद् को जगती छन्द में रखते हैं। अब मैथुन सम्बन्धी सूक्त पढ़े जाते हैं। त्रिष्टुभ् और जगती
तीसरा अध्याय ] ३१९ पशु मिथुन हैं । पशु छन्दोम हैं, यह पशुओं की बढ़ती के लिये किया जाता है । सातवें दिन के बृहत् पृष्ठ यह हैं :— त्वामिद्धि हवामहे... ( ऋ० ६।४६।१ ) त्वं ह्येहिचेरवे... ( ऋ० ८।६१।७ ) पृष्ठ वही हैं जो छठे दिन के । वैरूप रथन्तर है और वैराज बृहत् । शक्वर रथंतर है और रैवत बृहत् । इसलिये सातवें दिन बृहत् पृष्ठ होता है । क्योंकि वे छठे दिन के बृहत् सातवें दिन के बृहत् से बाँध देते हैं स्तोमों को जारी रखने के लिये । क्योंकि यदि ( बृहत् का विरोधी ) रथंतर पढ़ा जांय तो जोड़ा ( मिथुन ) टूट जाये । इस लिये बृहत् का प्रयोग होता है । धाय्या वही है अर्थात् यद् वावान... “अभित्वा शूर नोनुमः” के पाठ से होता सबको योनि तक लौटा लाता है । यह क्रम के अनुसार रथंतर है । साम प्रगाथ यह है— “पिबा सुतस्य रसिनः”... ( दा३।१-२ ) इसमें 'पिब' शब्द है । यह सातवें दिन का रूप है । ताक्ष्यँ वही है “त्यमूषु वाजिनं देवजूतम्” । ( १ ) १७—इन्द्रस्य नुवीर्याणि... ( ऋ० १।३२ ) इस सूक्त में 'प्र' है । यह सातवें दिन का रूप है । यह त्रिष्टुभ् छन्द में है । इन पदों के द्वारा जो ठहरे हुये हैं होता सवन को कायम रखता है और पतित नहीं होने देता । “अभि त्यं मेषं पुरुहूतमुक्थ्यम्' सूक्त ( १।५१ ) में 'प्र' के स्थान में 'अभि' है । यह सातवे' दिन का रूप है । यह जगती छन्द में है । मध्य सवन के वाहक जगती छन्द हैं । जो छन्द
३२४] [पाँचवीं पञ्चिका वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा जाता है। इसलिये इसमें निविद् रक्खा गया है। अब मिथुन सम्बन्धी सूक्त पढ़े जाते हैं। यह त्रिष्टुभ् और जगती में हैं, पशु मिथुन हैं। और छन्दोम पशु हैं। यह पशुओं की बढ़ती के लिये किया जाता है। वैश्वदेव शस्त्र के प्रतिपद् और अनुचर यह हैं:— तत् सवितुर्वृणीमहे (ऋ० ५।८२।१-३) अद्या नो देव सवितः (ऋ० ५।८२।४-५) यह रथन्तर है। यह सातवें दिन के रूप हैं। अभि त्वा देव सवितः (ऋ० १।२४।३) यह सविता का निविद् सूक्त है। इसमें 'अभि' 'अ' का स्थानीय है। यह सातवें दिन का रूप है। द्यावापृथिवी का निविद् सूक्त यह है:— प्रेतां यज्ञस्य (ऋ० २।४१।१६) इसमें 'प्र' है यह सातवें दिन का रूप है। ऋभुओं का निविद् सूक्त यह है:— अयं देवाय जन्मने (ऋ० १।२०) इसमें 'जन्म' आया है। यह सातवें दिन का रूप है। आ याहि वनसा सह गावः सचन्त वर्तनिं यदूधभिः ॥१॥ आ याहि वस्व्या धिया मंहिष्ठो जारयन् मखः सुदानुभिः ॥२॥ (ऋ० १०।१७२) इत्यादि दो पदों वाले मंत्रों का पाठ करता है। पुरुष दो- पाया है। पशु चौपाये हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की बढ़ती के लिए यह किया जाता है। एभिरग्ने दुवोगिरः (ऋ० १।१४) विश्वेदेवों का निविद् सूक्त है। इसमें 'आ' है यह सातवें दिन का रूप है। यह गायत्री छन्द में है। इस त्र्यह के तृतीय
तीसरा अध्याय ] ३२१ सवन का छन्द गायत्री है। इसलिये यह गायत्री छन्द में है। अग्निमारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :— “वैश्वानरो अजीजनत्” इसमें 'जात' शब्द है, यह सातवें दिन का रूप है। मरुतों का निविद् सूक्त यह है :— प्र यद्धरिख्ष्टुभमिषम्... । ( ऋ० ८।७ ) इसमें 'प्र' है। यह सातवें दिन का रूप है। जातवेदस मंत्र वही है :— जातवेदसे सुनवाम ( ऋ० १।६६।१ ) जातवेदों का निविद् यह है :— दूतं वो विश्ववेदसम् । ( ऋ० ४।८ ) इसमें 'जातवेद' का स्पष्ट वर्णन नहीं है। यह सातवें दिन का रूप है। यह छन्द गायत्री में हैं। इस त्र्यह के तीसरे सवन का वाहक गायत्री छन्द है। (२) १८—आठवें दिन का रूप यह है कि न 'अ' हो, न 'प्र' और 'स्थित' हो। आठवाँ वही है जो दूसरा। इसके रूप यह हैं :—ऊर्ध्व, प्रति, अन्तः, वृषण्, वृधन, बीच के पाद में देवता का निर्वचन, अन्तरिक्ष का उल्लेख, दो बार अग्नि शब्द, महद्, विहूत, पुनः, और वर्तमान कालिक क्रिया। अग्निं वो देवमग्निभिः सजोषा......( ऋ० ७।३ ) यह आठवें दिन का आज्य है। इसमें दो बार अग्नि आया है। यह आठवें दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इस त्र्यह के प्रातः सवन का वाहक त्रिष्टुभ् छन्द है। इसके प्र-उग शस्त्र के मन्त्र यह हैं :-- कुविदङ्ग नमसा ये वृधासः पुरा देवा अनवद्यास आसन्। ते वायवे मनवे बाधितायाऽवासयन्नुषसं सूर्येण ॥ ( ऋ० ७।६१।१ ) २१
३२२ [पाँचवीं पञ्चिका] पीवो अन्नान् रयिवृधः सुमेधाः श्वेतः सिषक्ति नियुतामभिश्रीः। ते वायवे समनसो वि तस्थुर्विश्वेनरः स्वपत्यानि चक्रुः॥ (ऋ० ७।९१।३) उच्छन्नुषसः सुदिना अरिप्रा उरु ज्योतिर्विबिदुदीध्यानाः। गव्यं चिदूर्वमुशिजो वि वव्रु स्तोषामनु प्रदिवः सस्रुरापः॥ (ऋ० ७।९०।४) उशन्ता दूता न दभाय गोपा मासश्च पाथः शरदश्च पूर्वीः। इन्द्रवायू सुष्टुतिर्वामियाना मार्डीकमीट्टे सुवितं च नव्यम्॥ (ऋ० ७।९१।२) यावत् तरस्तन्वोर्यावदोजो यावन्नरश्चक्षसा दीध्यानाः। शुचिं सोमं शुचिपा पातमस्मे इन्द्रवायू सदतं बर्हिरेदम्॥ नियुवाना नियुतः स्पार्हवीरा इन्द्रवायू सरथं यातमर्वाक्। इदं हि वां प्रभृतं मध्वो अग्रमध प्रीणाना वि मुमुक्तमस्मे॥ (ऋ० ७।९१।४-६) प्रति वां सूर उदिते सूक्तैर्मित्रं हुवे वरुणं पूतदक्षम्। ययोरसुर्यमक्षितं ज्येष्ठं विश्वस्य यामन्नाचिता जिगत्नू॥ ता हि देवानामसुरो तावर्या ता नः क्षितीः करतमूर्जयन्तीः। अश्याम मित्रावरुणा वयं वां द्यावा च यत्र पीपयन्नहा च॥ ता भूरिपाशावनृतस्य सेतू दुरत्येतू रिपवे मर्त्याय। ऋतस्य मित्रावरुणा पथा वामपो न नावा दुरिता तरेम॥ (ऋ० ७।६५।१-३) धेनुः प्रत्नस्य काम्यं दुहानाऽन्तः पुत्रश्चरति दक्षिणायाः। आ द्योतनिं वहति शुभ्रयामोषसः स्तोमो अश्विनावजीगः॥ सुयुग् वहन्ति प्रति वामृतेनोर्ध्वा भवन्ति पितरेव मेधाः। जरेथा मस्मद् वि परोर्मनीषां युवोरवश्चकृमा पातमर्वाक्॥ सुयुग्भिरश्वैः सुवृता रथेन दस्राविमं शृणुतं श्लोकमद्रेः। किमङ्ग वां प्रत्यवर्तिं गमिष्ठाऽऽहुर्विप्रासो अश्विना पुराजाः॥ (ऋ० ३।५८।१-३)
तीसरा अध्याय ] ३२३ ब्रह्माण इन्द्रोप याहि विद्वानर्वाञ्चस्ते हरयः सन्तु युक्ताः । विश्वे चिद्धि त्वा विह्वन्त मर्ता अस्माकमिच्छृणुहि विश्वमिन्व ॥ हवं त इन्द्र महिमा व्यानड् ब्रह्म यत् पासि शवसिन्नृषीणाम् । आ यद्वज्रं दधिषे हस्त उग्र घोरः सन् क्रत्वा जनिष्ठा अषाळ्हः ॥ तव प्रणीतीन्द्र जोहुवानान्त्सं यन्नॄन् रोदसी निनेथ । महे क्षत्राय शवसे हि जज्ञेऽनूतुजिं चित् तूतूजिराशेशनत् ॥ ( ऋ० ७।२८।१-३ ) ऊर्ध्वो अग्निः सुमतिं वस्वो अश्रेत् प्रतीची जूर्णिर्देवतातिमेति । भेजाते अद्री रथ्येव पन्थामृतं होता न इषितो यजाति ॥ प्र वावृजे सुप्रया बर्हिरेषामा विश्पतीव वीरिट् इयाते । विशामक्तोरुषसः पूर्वहूतौ वायुः पूषा स्वस्तये नियुत्वान् ॥ जम्या अत्र वसवो रन्त देवा उरावन्तरिक्षेमर्ज्यन्त शुभ्राः । अर्वाक् पथ उरुप्रयः कृणुध्वं श्रोता दूतस्य जग्मुषो नो अस्य ॥ ( ऋ० ७।३६।१-३ ) उत स्या नः सरस्वती जुषाणोप श्रवत् सुभगा यज्ञे अस्मिन् । मितज्ञुभिर्नमस्यैरियाना राया युजा चिदुत्तरा सखिभ्यः ॥ इमा जुहाना युष्मदा नमोभिः प्रतिस्तोमं सरस्वति जुषस्व । तव शर्मन् प्रियतमे दधाना उपस्थेयाम शरणं न वृक्षम् ॥ अयमु ते सरस्वति वसिष्ठो द्वारावृतस्य सुभगे व्यावः । वर्ध शुभ्रे स्तुवते रासि वाजान् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥ ( ऋ० ७।६५।४-६ ) इन मन्त्रों में प्रति, अन्तः, विहूत, ऊर्ध्व आये हैं । यह त्रिष्टुभ् छन्द में हैं । इस त्र्यह के प्रातः सवन का वाहक त्रिष्टुभ् छन्द है । मरुत्वतीय शस्त्र के आतान जो दूसरे दिन के हैं, वही आठवें के और यही आठवें दिन का रूप है :-
३२४ [ पाँचवीं पञ्चिका विश्वानरस्य वस्पतिं ( ऋ० ८।६८।४ ) इन्द्र इत् सोमपा एकः ( ऋ० ८।२।४ ) इन्द्र नेदीय एदि हि ( ऋ० ८।५३।५-६ ) उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते ( ऋ० १।४०।१-२ ) अग्निर्नैता त्वं सोम ऋतुभिः...... अब 'महद्वत्' सूक्त पढ़े जाते हैं अर्थात् वह जिनमें 'महद्' शब्द आया है :- शंसा महाम्...( ऋ० ३।४६ ) महश्चित् त्वम्... ऋ० १।१६६ ) पिबा सोममभि यं...( ऋ० ६।१७ ) यहाँ इन्द्रो नृवत् ( ऋ० ६।१६ ) इन सब में 'महान्' शब्द आया है और यह आठवें दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इससे होता सवन को कायम रखता है और गिरने नहीं देता। "तमस्य द्यावा पृथिवी" ( ऋ० १०।११३ ) भी महद्वत् सूक्त है। क्योंकि पहले मन्त्र के दूसरे पाद में महिसानो शब्द आया है। इसका छन्द जगती हैं। इस त्र्यह् के मध्य सवन के वाहक छन्द जगती हैं। निविद् उसी छन्द में रक्खा जाता है जो वाहक होता है। इसलिये निविद् जगती छन्द में रक्खा गया है। अब मिथुन के सूक्त पढ़े जाते हैं त्रिष्टुभ् और जगती छन्दों में। पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये महद्वत् सूक्त पढ़े जाते हैं। अन्तरिक्ष महद् है। अन्तरिक्ष की प्राप्ति के लिये पाँच सूक्त पढ़े जाते हैं।
प्रथमो निषीदसि सोमकामं हि ते मनः ॥ ( ऋ० ८।६१।१-२ )
तीसरा अध्याय ] ३२५ पंक्ति में पाँच पद होते हैं। यज्ञ पंक्ति वाला है। पशु भी पंक्ति वाले हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये। आठवें दिन के रथन्तर पृष्ठ यह हैं :— अभित्वा शूर नो नुमो...... अभित्वा पूर्वपीतये...... धाय्या वही है......यद् वावान्...... ‘त्वामिद्धि हवामहे' इससे सबको मानि की ओर लौटाता है। क्रमानुसार यह बृहत् दिवस है। साम प्रगाथ यह है :— उभयं शृणवच्च न इन्द्रो अर्वागिदं वचः । सत्राच्या मघवा सोम पीतये धिया शविष्ठ आ गमत् ॥ तं हि स्वराजं वृषभं तमोजसे धिषणे निष्टतक्षतुः । उतोपमानां प्रथमो निषीदसि सोमकामं हि ते मनः ॥ ( ऋ० ८।६१।१-२ ) इनमें वह भी है जो आज है और वह भी जो कल था। यह बृहत् दिवस अर्थात् आठवें दिन का रूप है। तार्क्ष्य वही है अर्थात् त्यमूषु वाजिनम्......(३) १९—पाँच महद्वत् सूक्त यह हैं :— अपूर्व्या पुरुतमान्यस्मै...( ऋ० ६।३२ ) इसमें 'महेवीराय तवसे तुराय' में 'महद्' शब्द आया है। यह आठवें दिन का रूप है। तां सु ते कीर्तिं मघवन् महित्वा...( ऋ० १०।५४ ) इसमें भी 'महद्' है। यह भी आठवें दिन का रूप है। त्वं महां इंद्र यो ह शुष्मैः...( ऋ० १।६३ ) इसमें 'महद्' है यह भी आठवें दिन का रूप है। त्वं महां इंद्र तुभ्यं ह क्षा......( ऋ० ४।१७)
३२६ [ पाँचवीं पञ्चिका इसमें भी 'महद्' है। यह भी आठवें दिन का रूप है। यह त्रिष्टुभ् छन्द में है। इसके द्वारा प्रतिष्ठित करके वह सवन को थामे रहता है गिरने नहीं देता । दिवश्चिद्दस्य वरिमा वि पप्रथ......( ऋ० १।५५ ) इस सूक्त में "इन्द्र' न महा" में महद् शब्द है यह आठवें दिन का रूप है। यह जगती छन्द में है। इस त्र्यह का मध्य सवन का वाहक गायत्री छन्द है। जो छन्द सवन का वाहक होता है उसी में निविद् रक्खा जाता है। इसलिये निविद् जगती छन्द में है। अब मिथुन सूक्त पढ़ते हैं। त्रिष्टुभ् भी और जगती भी । पशु मिथुन हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये 'महद्वत्' सूक्त पढ़े जाते हैं। महद् अन्तरिक्ष है। अन्तरिक्ष की प्राप्ति के लिये यह सूक्त पढ़े जाते हैं। पाँच पाँच सूक्त पढ़े जाते हैं, पाँच पदों की पंक्ति होती है। यज्ञ पाँच भाग वाला है। पशु भी पाँच भाग वाले होते हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये । पाँच पाँच कर दस होते हैं। यह दसवाली विराट् है। अन्न विराट् है। पशु अन्न हैं। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये । विश्वो देवस्य नेतुः ( ऋ० ५।५०।१ ) तत्संवितुर्वरेण्यम् आविश्चदेव सत्पतिम् । (ऋ० ५।८२।७ ) यह वैश्वदेव शस्त्र के प्रतिपद् और अनुचर हैं। यह बृहत छन्द में हैं और आठवें दिन के रूप हैं। सविता के निविद् यह हैं— हिरण्यपाणिमूतये (ऋ० १।२२।५-७ )
तीसरा अध्याय ] ३२७ इसमें 'ऊर्ध्व' आया है। यह आठवें दिन का रूप है। द्यावापृथिवी के निविद् यह हैं :— मही द्यौः पृथिवी चन ( ऋ० १।२२।१३-१५ ) इसमें 'महद्' है। यह आठवें दिन का रूप है। ऋभुओं का निविद् यह है :— युवाना पितरा पुनः ( ऋ० १।२०।४-८ ) इसमें 'पुनः' है। यह आठवें दिन का रूप है। 'इमा नु कं भुवना सीषधाम' में ( १०।१५७ ) दो पद वाले मंत्र हैं। अब यह पढ़े जाते हैं। मनुष्य दो पाया है। पशु चौपाया। पशु छन्दोम हैं। पशुओं की वृद्धि के लिये। इस सूक्त का पाठ करके होता यजमान को चौपाये पशुओं में स्थापित करता है। विश्वेदेवों का निविद् सूक्त यह हैं :— देवानामिदवो महद्......( ऋ० ८।८३।१ ) इसमें महद् शब्द है। यह आठवें दिन का रूप है। यह गायत्री छन्द में हैं। इस त्र्यह के तीसरे सवन का वाहक गायत्री छन्द है। अग्नि मारुत शस्त्र का प्रतिपद् यह है :— ऋतावान वैश्वानरं ( आश्व० श्रौत सूत्र ८।१० ) इसमें 'वैश्वानरं महान्' में महद् शब्द आया है। यह आठवें दिन का रूप है। मरुतों का निविद् सूक्त यह है :— क्रीडं वः शर्धो मारुतम्। ( ऋ० १।३७ ) इसमें 'वावृध' शब्द आया है। 'वृधन' आठवें दिन का रूप है। जातवेद मंत्र वही है :—जातवेदसे सुनवाम... जातवेद का निविद् सूक्त यह है :—
६२८ [ पाँचवीं पञ्चिका “अग्ने मृडमहाँ असि” ( ऋ० ४६ ) इसमें 'महद्' आया है । यह आठवें दिन का रूप है । यह सब गायत्री छन्द में हैं, इस त्र्यह के तीसरे सवन का वाहक छन्द गायत्री है । ( ४ ) ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पञ्चिका का तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ।