ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय १६—'अ' और 'प्र' सातवें दिन के रूप हैं। सातवाँ दिन पहले के समान है। युक्त, रथ, आशु, पिब, पहले पाद में देवता का निर्वचन, इस लोक का उल्लेख, जात, अनिरुक्त और भविष्य कालिक क्रिया यह जो पहले दिन के रूप हैं वही सातवें दिन के रूप हैं। आज्य सूक्त यह है :— समुद्रादूर्भिर्मधुमाँ उदारत (ऋ० ४।५८।१) यहाँ कुछ अनिरुक्त है। यह सातवें दिन का रूप है। समुद्र वाणी है। क्योंकि न वाणी क्षीण होती है न समुद्र। इस लिये यह सातवें दिन का आज्य है। यज्ञ से ही यज्ञ तानते हैं। और वाणी को प्राप्त करते हैं। संतति अर्थात् सिलसिले के लिये। जो इस रहस्य को समझ कर यज्ञ करते हैं उनका त्र्यह छिन्न भिन्न नहीं होता। छठे दिन स्तोम समाप्त हो जाते हैं और छन्द समाप्त हो जाते हैं। जैसे दर्शपूर्णमास—इष्टि में आज्य पर घृत डाल कर उसे ताजा करते हैं, उसी प्रकार सातवें दिन के आज्य शस्त्र से स्तोम ( ३१५ )