ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३१४ [ पाँचवीं पञ्चिका के लिये यह सब किया जाय तो यजमान चलने के योग्य हो जाता है । अग्निमारुतशस्त्र का प्रतिपद् यह है :— अहश्च कृष्णमहरर्जुनं च वि वर्तेते रजसी वेद्याभिः । वैश्वानरो जायमानो न राजाऽवातिरज् ज्योतिषाग्निस्तमांसि ॥ ( ऋ० ६।६।१ ) 'अहः' 'अहः' यह पुनरावृत्ति और निवृत्ति है, यह छठे दिन का रूप है । 'मध्वो वो नाम मारुतं यजत्रा' यह मरुत सूक्त है । यह बहुवचन है । बहुवचन 'अन्त' वाला है । यह छठे दिन का रूप है । जातवेदस मंत्र वही है “जातवेदसे सुनवाम” ( १।९९।१ ) जातवेदस का निविद् सूक्त “स प्रत्नथा सहसा जायमानः” ( १।९६।१ ) है । यह समानोदर्क है, यह छठे दिन का रूप है । इस सूक्त के हर मंत्र में 'धारयन्' आता है । इस प्रकार ऋत्विज् यज्ञ को दोनों सिरों पर बाँधता है जैसे रस्सी को दोनों सिरों पर बाँधते हैं, ( आग्रन्थन और निर्ग्रन्थन ) सादी गाँठ और लपेट की गाँठ । यह जैसे किसी चीज को दो खूटियाँ गाड़ कर तान देते हैं, यह यज्ञ की निर्विघ्नता के लिये किया जाता है । जो इस रहस्य को समझते हैं उनका यह् निर्विघ्न समाप्त हो जाता है । ( १० ) ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ।