भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 327

दूसरा अध्याय ] ३१३ वाला उतरा और मेरे पास आकर कहने लगा कि यह मेरा है। मैं इसे यहाँ छोड़ गया था। यह कह कर उसने ले लिया"। उसके पिता ने कहा, "बेटा, यह उसी का है। लेकिन वह तुमको दे देगा"। वह उसके पास गया और कहा, "मेरे पिता ने कहा है कि यह तुम्हारा ही है"। उसने कहा, "मैं तुमको देता हूँ क्योंकि तुमने सच बोला"। इस लिये विद्वान् को सच ही बोलना चाहिये। यह नाभा- नेदिष्ठ का सहस्र वाला मंत्र है। जो इस रहस्य को समझता है उसके ऊपर 'सहस्र' की वर्षा होती है। और वह छठे दिन के द्वारा स्वर्ग के दर्शन रता है। (९) १५—अब (वैश्वदेव शस्त्रके) सहचर सूक्त पढ़ता है, जैसे नाभानेदिष्ठ, बालखिल्य, वृषाकपि, एवया मरुत। यदि इनमें से कोई छूट जाय तो यजमान को क्षति होगी। यदि नाभानेदिष्ठ छूट जाय तो यजमान को वीर्य की क्षति होगी। बालखिल्य छूट जाय तो प्राणों की। वृषाकपि छूट जाय तो आत्मा की। एवयामरुत छूट जाय तो प्रतिष्ठा की। अर्थात् मनुष्यों और देवों में जो उसकी प्रतिष्ठा है वह जाती रहे! नाभानेदिष्ठ से वह यजमान में वीर्य धारण कराता है। बालखिल्य से आकृति धारण कराता है। कक्षीवान् के पुत्र सुकीर्ति ने इस सूक्त के द्वारा गर्भ को बच्चा उत्पन्न करने योग्य बनाया। इसके पहले मंत्र में (ऋ० १०।१३१।१) आया है "उरौ यथा तव शर्मन् मदेम" (हे इन्द्र, हम तेरे उदार शरण में सुख पावें)। इस लिये गर्भ चाहें बड़ा हो और योनि छोटी हो तब भी वह उसे हानि नहीं पहुँचाता। अगर ब्रह्म सुकीर्ति सूक्त द्वारा योनि को सुरक्षित रखता है, तो यजमान एवयामरुत सूक्त (ऋ० ५।८७) द्वारा गतिवान हो जाता है। यदि यजमान