भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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३०६ [ पाँचवीं पञ्चिका अन्त का रूप, पिछले पद में देवता का निरूपण, परलोक का उल्लेख । सातवें दिन की और विशेषतायें यह हैं:-- सात पदों का परुच्छेप, नराशंस, नाभानेदिष्ठ, रैवत, अति- च्छन्द, और भूतकालिक क्रिया । जो तीसरे दिन का रूप है वही छठे दिन का है । "अयं जायत मनुषो धरीमणि" ( ऋ० १।१२८ ) आज्य शस्त्र का सूक्त है। इसका ऋषि परुच्छेप है, छन्द सात पदों का अतिच्छन्द है। यह छठे दिन का रूप है। प्र-उग शस्त्र ये हैं। इन सब का परुच्छेप ऋषि है और सात पदों वाला अतिच्छन्द है :-- स्तीर्णं बर्हिरुप नो याहि वीतये सहस्रेण नियुता नियुत्वते शतिनी- भिर्नियुत्वते । तुभ्यं हि पूर्वपीतये देवा देवाय येमिरे । प्र ते सुतासो मधुमन्तो अस्थिरन्मदाय क्रत्वे अस्थिरन् ॥ तुभ्यायं सोमः परिपूतो अद्रिभिः स्पार्हा वसानः परि कोशमर्षति शुक्रा वसानो अर्षति । तवायं भाग आयुषु सोमो देवेषु हूयते । वह वायो नियुतो याह्यस्मयुर्जुषाणो याह्यस्मयुः ॥ आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वरं सहस्रिणीभिरुप याहि वीतये वायो हव्यानि वीतये । तवायं भाग ऋत्वियः सरश्मिः सूर्ये सचा । अध्वर्युभिर्भरमाणा अयंसत वायो शुक्रा अयंसत ॥ ( ऋ० १।१३५।१-३ ) आ वां रथो नियुत्वान्वक्षदवसेऽभि प्रयांसि सुधितानि वीतये । वायो हव्यानि वीतये । पिबतं मध्वो अन्धसः पूर्वपेयं हि वां हितम् । वायवा चन्द्रेण राधसा गतमिन्द्रश्च राधसा गतम् ॥ आ वां धियो ववृत्युरध्वरां उपेममिन्दुं ममृजन्त वाजिन माशुमत्त्यं न वाजिनम् । तेषां पिबतमस्मयू आ नो गन्तमिहोत्या । इन्द्रवायू सुता- नामद्रिभिर्युवं मदाय वाजदा युवम् ॥