ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०४ [ पाँचवीं पञ्चिका ९—छठा दिन देवक्षेत्र है। जो छठे दिन में प्रवेश करते हैं वह देव क्षेत्र में प्रवेश करते हैं। देव एक दूसरे के घर में नहीं रहा करते ! कहावत है कि एक ऋतु दूसरी ऋतु के घर में नहीं रहती । इसलिये ऋत्विज लोग अपना अपना ऋतुयाज करते हैं। दूसरे से नहीं कराते । इस प्रकार ऋत्विज लोग सभी ऋतुओं के कृत्य करते हैं। किसी को छोड़ते नहीं। सब के कल्याण के लिये। कहा जाता है कि ऋतुओं के कृत्य के लिए न कोई आज्ञा चाहिये, न वषट्कार। आज्ञा वाणी से होती है और वाणी छठे दिन थक जाती है। यदि वह आज्ञा देंगे और वषट्कार करेंगे तो थकी हुई वाणी बोझ के नीचे दब जायगी। और वाणी गड़बड़ हो जायगी । और अगर ऋत्विज आज्ञा न दें और वषट्कार न करें तो यज्ञ की सीमा से पतित हो जाते हैं। यज्ञ भंग हो जाता है और यज्ञ, प्राण, प्रजापति और पशु नहीं रहते और वे टेढ़े चलने लगते हैं। इसलिये आज्ञा और याज्य मंत्र से पहले एक ऋचा बोलनी चाहिये। इसी प्रकार न तो वाणी थकेगी, न बोझ से दबेगी, न उसमें गड़बड़ होगी । न यज्ञ भंग होगा, न वे यज्ञ, प्राण, प्रजापति या पशुओं से च्युत होंगे और न टेढ़े चल सकेंगे। (४) १०—पहले दो सत्रों में प्रत्येक प्रस्थित याज्य से पहले परुच्छेप ऋषि वाली एक एक ऋचा को रखते हैं। इस छन्द का नाम रोहित है। इसके द्वारा इन्द्र सात स्वर्गों को चढ़ गया