ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ] १६ आरम्भ करने वाला और देवताओं का आरम्भ करने वाला हो जाता है । अमावस्या में हवि देकर या पूर्णमासी में हवि देकर इस हवि* और इस बर्हि में ( अर्थात् उनके द्वारा ) उसकी दीक्षा हो जाय । यह एक दीक्षा हुई । होता को चाहिये कि सत्रह† सामिधेनियों का पाठ करे । *अमावस्या के यज्ञ को हवि और पूर्णिमा के यज्ञ को बर्हि कहते हैं । †सामिधेनी १७ इस प्रकार हैं । १५ सामिधेनी और २ धाय्य । यह १५ वस्तुतः ११ ही हैं; पहला और पिछला मंत्र तीन तीन बार पढ़ा जाने से १५ हो जाती हैं :— (१) प्र वो वाजा अभिद्यवो हविष्मन्तो घृताच्या । देवाँञ् जिगाति सुम्नयुः ( ऋ० ३।२७।१) । (२) तथा (३) इसी की पुनरावृत्ति । (४) अग्नआयाहि वीतये गृणानो हव्य दातये । निहोता सत्सि बर्हिषि । ( साम० १।१ या ऋ० ६।१६।१० ) (५) तं त्वा समिद्भिर्अङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य । ( ऋ० ६।१६।११ ) । (६) स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि । बृहदग्ने सुवीर्यम् । ( ऋ० ६।१६।१२ ) । (७) ईडेन्यो नमस्यस्तिरस्तमांसि दर्शतः । समग्निरिध्यतेवृषा । ( ऋ० ३।२७।१३ ) । (८) वृषो अग्निः समिध्यतेऽश्वो न देववाहनः । तं हविष्मन्त ईडते । ( ऋ० ३ २७।१४ ) । (६) वृषणं त्वा वयं वृषन् वृषणः समिधीमहि । अग्ने दीद्यतं बृहत् । ( ऋ० ३।२७।१५ ) ।