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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पहला अध्याय ] १६ आरम्भ करने वाला और देवताओं का आरम्भ करने वाला हो जाता है । अमावस्या में हवि देकर या पूर्णमासी में हवि देकर इस हवि* और इस बर्हि में ( अर्थात् उनके द्वारा ) उसकी दीक्षा हो जाय । यह एक दीक्षा हुई । होता को चाहिये कि सत्रह† सामिधेनियों का पाठ करे । *अमावस्या के यज्ञ को हवि और पूर्णिमा के यज्ञ को बर्हि कहते हैं । †सामिधेनी १७ इस प्रकार हैं । १५ सामिधेनी और २ धाय्य । यह १५ वस्तुतः ११ ही हैं; पहला और पिछला मंत्र तीन तीन बार पढ़ा जाने से १५ हो जाती हैं :— (१) प्र वो वाजा अभिद्यवो हविष्मन्तो घृताच्या । देवाँञ् जिगाति सुम्नयुः ( ऋ० ३।२७।१) । (२) तथा (३) इसी की पुनरावृत्ति । (४) अग्नआयाहि वीतये गृणानो हव्य दातये । निहोता सत्सि बर्हिषि । ( साम० १।१ या ऋ० ६।१६।१० ) (५) तं त्वा समिद्भिर्अङ्गिरो घृतेन वर्धयामसि। बृहच्छोचा यविष्ठ्य । ( ऋ० ६।१६।११ ) । (६) स नः पृथु श्रवाय्यमच्छा देव विवाससि । बृहदग्ने सुवीर्यम् । ( ऋ० ६।१६।१२ ) । (७) ईडेन्यो नमस्यस्तिरस्तमांसि दर्शतः । समग्निरिध्यतेवृषा । ( ऋ० ३।२७।१३ ) । (८) वृषो अग्निः समिध्यतेऽश्वो न देववाहनः । तं हविष्मन्त ईडते । ( ऋ० ३ २७।१४ ) । (६) वृषणं त्वा वयं वृषन् वृषणः समिधीमहि । अग्ने दीद्यतं बृहत् । ( ऋ० ३।२७।१५ ) ।

[ प्रथम पञ्चिका २० क्योंकि प्रजापति सत्रह हैं। बारह महीने और पांच ऋतुयें । (१०) अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्। अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्। ( ऋ० १।१२।१ ) । (११) समिध्यमानो अध्वरेऽग्निः पावक ईड्यः । शोचिष्केशस्तमीमहे । ( ऋ० ३।२७।४ ) । (१२) समिद्धो अग्न आहुत देवान् यक्षि स्वध्वर । त्वं हि हव्यवाडसि । ( ऋ० ५।२८।५ ) । (१३) आ जुहोता दुवस्यताऽग्निं प्रयत्यध्वरे । वृणीध्वं हव्यवाहनम् । ( ऋ० ५।२८।६ ) । (१४) तथा (१५) इसी की पुनरावृत्ति । सामिधेनी ( सम् + इन्ध करणे ल्युट् ) । अग्नि प्रज्वलित करते समय पढ़े जाने वाले मन्त्रों का नाम सामिधेनी है । ( शत० ब्रा० १।३।५।१ ) । सामिधेनियों के बीच में जो मन्त्र पढ़े जाते हैं वे 'धाय्य' कहलाते हैं। यह दो धाय्य ११वीं और १२ वीं सामिधेनियों के बीच में पढ़े जायंगे । ११वीं ऋचा समिध्यमाना है ( ऋ० ३।२७।४ ) और १२वीं ऋचा 'समिद्धवती' है ( ऋ० ५।२८।५ ) । इन दो के बीच में दो धाय्य आने से संख्या १७ है ही। यह दो "धाय्य" मन्त्र यह हैं :— "पृथुपाजा अमर्त्यो घृत निर्णिङ् स्वाहुतः । अग्निर्यज्ञस्य हव्यवाट् । ( ऋ० ३।२७।५ ) । तं सबाधो यतस्रुच इत्था धिया यज्ञवन्तः । आचक्रुरग्निमूतये ।" ( ऋ० ३।२७।६ ) । अर्थात् मन्त्रों के उच्चारण के विचार से धाय्यों की संख्या बारहवीं और तेरहवीं होगी । सायण ने इनको दसवां और ग्यारहवां बताया है क्योंकि पहली सामिधेनी ही दूसरी और तीसरी बार दुहराई जाती है । पुनरावृत्ति को अलग न गिनें तो १० वीं ११ वीं हो जाती है ।

पहला अध्याय ] २१ हेमन्त और शिशिर एक में सम्मिलित हैं। इतना संवत्सर हुआ। वर्ष ही प्रजापति है। जो इस रहस्य को जानता है वह प्रजापति- सम्बन्धी इन ऋचाओं द्वारा समृद्धि को प्राप्त होता है। (१) २—यज्ञ देवों के पास से भाग गया। उसको इष्टियों द्वारा उन्होंने तलाश करना चाहा। इष्टियों का इष्टित्व इस लिये है कि उन्होंने इनके द्वारा (यज्ञ को) तलाश करने की इच्छा की। ('इष्टि' 'इष्' धातु से बना है, जिसका अर्थ है इच्छा करना—ले०)। उन्होंने उस (यज्ञ) को पा लिया। जो इस रहस्य को समझता है वह यज्ञ को पाकर समृद्धि को प्राप्त कर लेता है। वास्तव में 'आहूति' (दीर्घ ऊ की मात्रा) को 'आहुति' (ह्रस्व उ की मात्रा) कहते हैं क्योंकि इनके द्वारा यजमान देवतों को बुलाता है। यही 'आहु- तियों' का 'आहुतित्व' है। यह ऊतियां हैं। क्योंकि इन्हीं के द्वारा देवता यजमान के बुलाने पर आते हैं। ये जो 'ऊतियां' हैं वे मार्ग या पथ हैं जो यजमान के स्वर्ग तक पहुँचने के लिये होती हैं। ('आहुति' का अर्थ है, होम में अर्पण किया हुआ। 'आहूति' का अर्थ है बुलाया हुआ। इन दोनों शब्दों के अर्थों की समानता दिखाई गई हैं अर्थात् हवन में आहुति देना मानों देवों को बुलाना है—ले०)। प्रश्न यह है कि जब आहुति देने वाला दूसरा (अध्वर्यु) होता है तो अनुवाक्य और याज्य मंत्रों के पढ़ने वाले का नाम 'होता' क्यों है ? (उत्तर) क्योंकि वह देवताओं को यथा स्थान यह कह कर बुलाता है "अमुक को बुलाओ। अमुक को बुलाओ"। यही 'होता' का 'होतापन' है। जो इस रहस्य को समझता है उसे 'होता' कहते हैं। (२) ३—ऋत्विज लोग जिसको दीक्षा देते हैं उसको मानो फिर गर्भ में बुलाते हैं (नया जन्म देने के लिये)। उस पर जल छिड़कते

२२ [ प्रथम पञ्चिका हैं। जल वीर्य है। मानो वह उसको दीक्षा देकर वीर्यवान् (सरेतस) बनाते हैं। नवनीत अर्थात् घी की नवनी को उस पर मलते हैं। देवों के लिये जो घी होता है उसे "आज्य" कहते हैं। ॐ जो मनुष्यों के लिये होता है उसे "घृत" । जो पितरों के लिये होता है उसे "आयुत" और जो गर्भस्थ जीवों के लिये उसे "नवनीत"। 'नवनी' मलने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार वह उसी के भागधेय के द्वारा उसको समृद्ध बनाता है। अब आंखों में अंजन दिलाते हैं। क्योंकि जो अंजन है उससे आँखों का प्रकाश बढ़ता है। इस प्रकार उसको प्रकाश देकर दीक्षित करते हैं। दूर्भो के इक्कीस मुट्ठों से उसे शोधते हैं। इस प्रकार उसको शुद्ध और पवित्र करके दीक्षित करते हैं। अब वह उसे उस स्थान पर ले जाते हैं जो दीक्षित-पुरुष के लिये नियत होता है। यह दीक्षित पुरुष की योनि है। दीक्षा के स्थान में ले जाकर मानो वह उसे उसकी ही योनि में ले जाते हैं। इसलिये वह वहाँ योनि के सदृश सुरक्षित स्थान में ठहरता है और फिर चलता है। इसीलिये गर्भ योनियों में सुरक्षित रक्खे जाते हैं और वहाँ से उत्पन्न होते हैं। इसलिये दीक्षा-स्थान के बाहर अन्य स्थान पर दीक्षित पुरुष के ऊपर सूर्य्य उदय और अस्त न हो, और न वे लोग उससे वार्तालाप करें। ॐ घी के चार प्रकार बताये :—आज्य, घृत, आयुत, नवनीत :— सर्पिर्विलीनमाज्यं स्याद् घनीभूतं घृतं विदुः । ईषद्विलीनमायुतम् । पिघला घी 'आज्य' है। जमा हुआ 'घृत' है। आधा पिघला आयुत् है। मक्खन 'नवनीत', नवनी या लौनी कहलाता है। इसी से और तीन बनाये जाते हैं। नवनीतस्यपाकजन्यास्तिस्रोऽवस्थाः-पक्वम्, ईषत्पक्वम्, निःशेषपक्वम् च । द्रव्यान्तरप्रक्षेपेण सुरभिनिःशेष पक्वम् ॥

पहला अध्याय ] २३ वे उसको वस्त्र से ढकते हैं। यह जो वस्त्र है वह दीक्षित पुरुष का उल्ब है (उल्ब उस झिल्ली को कहते हैं जिसमें बच्चा उत्पन्न होता है—ले०)। इस प्रकार वह उसे उल्ब से ढकते हैं। उसके ऊपर से कृष्णाजिन या काले मृग का चर्म लपेटते हैं। उल्ब के ऊपर जरायु होता है। इस प्रकार वह उसको जरायु से ढकते हैं। वह मुट्ठी बांधे होता है। क्योंकि मुट्ठी बांधे ही बच्चा गर्भ में होता है, मुट्ठी बांधे ही उत्पन्न होता है। यह जो वह मुट्ठी बांधता है, मानो अपने दोनों हाथों में यज्ञ और देवतों को ले लेता है। इसके लिये कहा जाता है कि जो पुरुष पहले दीक्षा ले लेता है उसकी मुट्ठी में यज्ञ होता है और मुट्ठी में देवता होते हैं, इसलिये उसको 'संसव'※ दोष नहीं लगता। और न उसको वह हानि उठानी पड़ती है जो उस पुरुष को जो पीछे से दीक्षा लेता है। अब वह मृग-चर्म को उतार कर स्नान करता है। इस प्रकार ही बच्चे जरायु के बाहर निकल कर उत्पन्न होते हैं। वह वस्त्र को लपेटे-लपेटे ही नहाता है। क्योंकि बच्चा 'उल्ब' के साथ ही तो उत्पन्न होता है। (३) ४—जो 'अनीजान' है अर्थात् जिसने अभी यज्ञ नहीं किया उसके लिये होता दो अनुवाक्य बोलता है। आज्य भाग अर्थात् घी के पहले भाग के लिये "त्वमग्ने सप्रथा असि"† (ऋ० ※ यदि दो या अधिक पुरुष एक ही समय में निकट स्थान में सोम यज्ञ करते हों तो गड़बड़ हो जाती है; उसे 'संसव' दोष कहते हैं। यदि कोई पुरुष दीक्षित हो जाय तो उसे 'संसव' दोष नहीं लगता। यह सायण की राय है। † त्वमग्ने सप्रथा असि जुष्टो होता वरेण्यः। त्वया यज्ञं वि तन्वते ॥ ( ऋ० ५।१३।४ )

२४ [ प्रथमं पञ्चिका ५।१३।४) मंत्र और दूसरे भाग के लिये "सोम यास्तेमयो भुवः" (ऋ० १।९१।९) मंत्र । मानों इस प्रकार "त्वया यज्ञं वितन्वते" पढ़ कर वह उस (यज्ञ न किये हुये) को यज्ञ देता है । जो "ईजान" है अर्थात् जिसने पहले यज्ञ किया है उसके लिये होता दूसरे दो मंत्र जपता है (१) "अग्निः प्रत्नेन मन्मना" (ऋ० ८।४४।१२) और (२) "सोमगीर्भिर्ष्ट्वावयम्" (ऋ० १।९१।११) । मंत्र में "प्रत्नम्" शब्द जो पड़ा है उससे पुरातन कर्म की ओर संकेत है । परन्तु यह दोनों जप छोड़े भी जा सकते हैं । इनके स्थान में वृत्र को मारने विषयक यह दो मंत्र बोलने चाहिये:—(१) अग्निर्वृत्राणि जंघनत् (ऋ० ६।१६।३४); (२) त्वं सोमासि सत्पतिः (ऋ० १।९१।५) । चूंकि जिसके पास यज्ञ आता है वह वृत्र को मार देता है, इसलिये वृत्र के मारने सम्बन्धी दो ऋचाओं को बोलना चाहिये । अग्नि और विष्णु के हविष् का याज्य है "अग्निर्मुखं प्रथमो सोम यास्ते मयोभुव ऊतयः सन्ति दाशुषे । ताभिर्नोऽविताभव ॥ ( ऋ० १।६१।६ ) अग्निः प्रत्नेन मन्मना शुम्भानस्तन्वं स्वाम् । कविर्विप्रेण वावृधे ॥ ( ऋ० ८।४४।१२ ) सोम गीर्भिष्ट्वा वयं वर्धमानो वचोविदः । सुमृडीको न आ विश ॥ ( ऋ० १।९१।११ ) अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद् द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥ ( ऋ० ६।१६।३४ ) त्वं सोमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा । त्वं भद्रो असि क्रतुः ॥ ( ऋ १।६१।५ )

पहला अध्याय ] २५ देवतानाम्” और अनुवाक्य है “अग्निश्चविष्णो तप उत्तमं महः❀ ।” यह अग्नि और विष्णु के मंत्र रूप-समृद्ध हैं अर्थात् जैसा कृत्य हो उसी के अनुसार है। जो कृत्य के अनुसार होता है उससे यज्ञ की सफलता होती है। अर्थात् ऐसे मंत्रों से जिनमें उस क्रिया का विधान है जो होने वाली है। देवतों में अग्नि और विष्णु दीक्षापाल अर्थात् दीक्षा की रक्षा करने वाले हैं। वे दोनों दीक्षा पर स्वामित्व रखते हैं। जब अग्नि और विष्णु के लिये हवि दी जाती है तो जो दोनों दीक्षा पर शासन करते हैं वे प्रसन्न हो जाते हैं। और दीक्षा को प्रदान कर देते हैं। अर्थात् जो दीक्षा देने वाले हैं वह दीक्षा देते हैं। ये दोनों मंत्र त्रिष्टुभ् छन्द में हैं जिससे (यजमान को) इन्द्र का पद प्राप्त हो जाय। (४) ५—जिसको तेज और ब्रह्मवर्चस् की कामना हो वह स्विष्ट- कृत संयाज्य में गायत्री छन्द के दो मंत्र बोले। गायत्री तेज और ब्रह्मवर्चस वाली है। जो इस रहस्य को समझ कर गायत्री छन्द वाले दो मंत्रों को बोलता है वह तेजस्वी और ब्रह्मवर्चसी हो जाता है। जो दीर्घायु चाहे वह “उष्णिक्” छन्द के दो मंत्र बोले। क्योंकि उष्णिक् आयु वाला है। जो इस रहस्य को समझ कर इन दो उष्णिक् छन्दों वाले मंत्रों को पढ़ता है वह पूर्ण आयु वाला हो जाता है। ❀ यह दो मन्त्र, जो ऋग्वेद में नहीं पाये जाते श्रौत सूत्र ( आश्व- लायन ) में इस प्रकार हैं :— ( पूर्व० ४.२ ) अग्निर्मुखं प्रथमो देवतानां संगतानामुत्तमो विष्णुरासीत् । यजमानाय परिगृह्य देवान् दीक्षयेदंहविरागच्छतं नः ॥१॥ अग्निश्च विष्णो तप उत्तमं महो दीक्षापालाय वन तंहि शक्रा । विश्वैर्देवैर्यज्ञियैः संविदानौ दीक्षामस्मै यजमानाय धत्तम् ॥२॥

२६ [ प्रथम पञ्चिका जो स्वर्ग की कामना वाला हो वह अनुष्टुभ् छन्द वाले दो मंत्रों को पढ़े । दो अनुष्टुभों में ६४ अक्षर होते हैं । इन तीनों लोकों में एक के ऊपर दूसरा इस प्रकार २१ स्थान होते हैं । इक्कीस-इक्कीस पगों में वह इन लोकों को तर लेता है और चौंसठवें अक्षर से स्वर्ग में प्रतिष्ठित हो जाता है । जो इस रहस्य को समझ कर दो अनुष्टुभों को पढ़ता है उसको स्वर्ग में प्रतिष्ठा मिलती है । जिसको श्री और यश की कामना हो वह 'बृहती' छन्द वाले दो मंत्रों को पढ़े । छन्दों में बृहती छन्द श्री और यश वाला है । जो इस रहस्य को समझ कर बृहती छन्द वाले दो मंत्रों को पढ़ता है वह अपने में श्री और यश को धारण करता है । जिसको यज्ञ की कामना हो वह पंक्ति छन्द वाले दो मंत्र पढ़े । यज्ञ पंक्ति वाला (या पाँच अंगों वाला) है । जो इस रहस्य को समझ कर पंक्ति छन्द वाले मंत्र पढ़ता है उसको यज्ञ नमस्कार करता है । जो पराक्रम की कामना करे वह त्रिष्टुभ् छन्द वाले दो मंत्रों को पढ़े । त्रिष्टुभ् ओज या इन्द्रिय सम्बन्धी पराक्रम है । जो इस रहस्य को समझ कर त्रिष्टुभ् छन्द के दो मंत्रों को पढ़ता है वह ओजस्वी और इन्द्र सम्बन्धी पराक्रम वाला होता है । जिसको पशु की कामना हो वह 'जगती' छन्द वाले दो मंत्रों को पढ़े । पशु जगती वाले हैं । जो इस रहस्य को समझ कर जगती छन्द वाले दो मंत्रों को पढ़ता है, वह पशु वाला होता है । जो भोजन की कामना करे वह 'विराट्' छन्द वाले दो मंत्रों को बोले । विराट् अन्न हैं । इसलिये जिसके पास अन्न बहुत होता है वही संसार में अधिक विराजता है (प्रकाशित होता है) । यही

पहली अध्याय ] २७ विराट्त्व है। जो इस भेद को समझता है वह अपने लोगों में चमकता है और श्रेष्ठ माना जाता है। (५) ६—विराट् छन्द में पाँच शक्तियाँ होती हैं। चूंकि इसमें तीन पद होते हैं इस लिये यह उष्णिक् और गायत्री (के समान) है। चूंकि इसके पदों में ग्यारह अक्षर होते हैं इस लिये त्रिष्टुभ् के समान है। चूंकि इसमें तेतीस अक्षर होते हैं इसलिये अनुष्टुभ् के समान है। एक या दो अक्षर की कमी से छन्द तब्दील नहीं होता (यह इसलिये कहा, कि "प्रेद्धो अग्ने" और 'इमो अग्ने' वाले दो विराट् छन्दों में से पहले में केवल २९ अक्षर हैं और दूसरे में ३२)। पाँचवीं शक्ति विराट् है। जो इस भेद को समझ कर (स्विष्टकृत में) दो विराट् छन्दों वाले मंत्रों को पढ़ता है वह सब छन्दों की शक्ति को ले लेता है, प्राप्त कर लेता है। सब छन्दों की सायुज्यता सरूपता और सलो- कता को प्राप्त कर लेता है। अन्न का खाने वाला और अन्नपति होता है, प्रजा और अन्न को पा लेता है। इसलिये विराट् छन्दों वाले दो मंत्रों को अवश्य पढ़ना चाहिये—(१) प्रेद्धो अग्ने ꕤ (ऋ० ७।१।३); (२) इमो अग्ने (७।१।१८)। दीक्षा ऋत है। दीक्षा सत्य है। इसलिये दीक्षित को सत्य ही बोलना चाहिये। इस पर प्रश्न होता है कि कौन मनुष्य निरन्तर सत्य बोल सकता है। सत्य से युक्त देव है। झूठ से युक्त मनुष्य। विचक्षणवती वाणी को बोले। चक्षु ही विचक्षण है क्योंकि इसी से देखते हैं। मनुष्यों में जो आँख है, वह सत्य में निर्धारित ꕤ प्रेद्धो अग्ने दीदिहि पुरोनोऽजस्रया सूर्म्या यविष्ठ। त्वां शश्वन्त उपयन्ति वाजाः॥ (ऋ० ७।१।३) इमो अग्ने वीततमानि हव्याऽजस्रो वक्षि देवतातिमच्छ। प्रति न ईं सुरभीणि व्यन्तु॥ (ऋ० ७।१।१८)

२८ [ प्रथम पञ्चिका है। इसीलिये जब कोई मनुष्य कुछ कहता है तो लोग कहते हैं “क्या तूने देखा है ?” यदि वह कहता है “मैंने देखा है” तो वे उस पर श्रद्धा करते हैं। यदि मनुष्य स्वयं किसी चीज को देख सकता है तो दूसरों पर श्रद्धा नहीं करता, चाहे कई हों। इसलिये विचक्षणवती वाणी को बोले। तब उसकी वाणी सचमुच ही सत्य वाली हो जाती है। (६) ऐतरेय ब्राह्मण की पहली पञ्चिका का पहला अध्याय समाप्त

अध्याय में किया गया। यह तो केवल तैय्यारी थी। जब यज्ञ आरंभ

दूसरा अध्याय

प्रायणीय-इष्टि

७—जो प्रायणीय इष्टि करते हैं वह इसके द्वारा स्वर्गलोक को जाते हैं (प्रयंति) । इसीलिये इस इष्टि को प्रायणीय कहते हैं । प्रायणीय प्राण है और उदयनीय उदान है। होता समान होता है। प्राण और उदान समान होते हैं। प्राणों के बनाने और प्राणों के जानने के लिये ( प्रायणीय और उदयनीय दोनों इष्टियों की आवश्यकता है।—ले०)† यज्ञ देवों के पास से भाग गया। वे देव कुछ कृत्य न कर सके। और न जान सके (कि वह यज्ञ कहाँ चला गया—ले०)। उन्होंने अदिति से कहा, “तेरे द्वारा हम इस यज्ञ को जानें”। उसने † 'प्रायणीय' का अर्थ है 'आरंभ की'। 'उदयनीय' का अर्थ है 'अन्त की'। यज्ञ में सब से पहले 'दीक्षणीय इष्टि' का उल्लेख पिछले अध्याय में किया गया। यह तो केवल तैय्यारी थी। जब यज्ञ आरंभ हुआ तो आरंभ की इष्टि हुई प्रायणीय और अन्त की उदयनीय। दोनों मिलकर ही यज्ञ को पूरा करती हैं। ( २६ )

३० [ प्रथम पञ्चिका कहा, "अच्छा, परन्तु मैं एक वर मागूँगी"। उसने कहा, "माँग" उसने यही वर माँगा, "यज्ञ मुझसे आरम्भ हो और मुझसे समाप्त हो।" उन्होंने ने कहा, "अच्छा"। इसलिये अदिति का चरु आरम्भ में होता है और समाप्ति भी अदिति के चरु से ही होती है क्योंकि यही वर उसने माँगा था। अब उसने यह वर माँगा. "मेरे ही द्वारा पूर्व दिशा को तुम जानो, अग्नि के द्वारा दक्षिण दिशा को तुम जानो, अग्नि के द्वारा दक्षिण दिशा को, सोम के द्वारा पश्चिम, सविता के द्वारा उत्तर दिशा को"। अब (होता) पथ्या के अनुवाक्य और याज्य मंत्रों❄ को बोलता है। चूँकि पथ्या का अनुसरण करता है इसलिये यह (सूर्य्य) पूर्व से उदय होता और पश्चिम में अस्त होता है। अब अग्नि के अनुवाक्य और याज्य मंत्रों को बोलता† है। इसीलिये ओषधियाँ दक्षिण में पहले पकती हैं। क्योंकि ओषधियां अग्नि से सम्बन्ध रखती हैं। ❄ पथ्या के अनुवाक्य और याज्य मंत्र यह हैं :- १ स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्यप्सु वृजने खर्वति। स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन॥ २ स्वस्ति रिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा रेक्ण स्वस्त्यभि या वाममेति। सा नो अमा सो अरणे नि पातु स्वावेशा भवतु देव गोपा॥ (ऋ० १०।६३।१५,१६) † अग्नि के अनुवाक्य और याज्य मंत्र यह हैं :- १ अग्ने नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्। युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम। (ऋ० १।१८९।१) २ आ देवानामापि पन्थामगन्म यच्छक्नवाम तदनु प्रवोढुम्। अग्निर्विद्वान्स यजातसेदु होता सो अध्वरान्त्स ऋतून् कल्पयाति॥ (ऋ० १०।२।३)

दूसरा अध्याय ] ३१ अब वह सोम के लिये अनुवाक्य* और याज्य मंत्रों को बोलता है। इसी लिये बहुत सी नदियाँ पश्चिम की ओर बहती है। जल सोम के हैं। सविता के लिये अनुवाक्य† और याज्य मंत्रों को बोलता है । इसीलिये वायु अधिकतर उत्तर और पश्चिम की दिशाय्र से बहता है । वह सविता की प्रेरणा से ही चलता है। वह अदिति के लिये‡ अनुवाक्य और याज्य मंत्रों को

  • सोम के अनुवाक्य और याज्य मंत्र यह हैं:— १ त्वं सोम प्रचिकितो मनीषा त्वं रजिष्ठमनु नेषि पन्थाम् । तव प्रणीती पितरो न इन्दों देवेषु रत्नमभजन्त धीराः ॥ ( ऋ० १।६१।१ ) २ या ते धामानि दिवि या पृथिव्यां या पर्वतेष्वोषधीष्वप्सु । तेभिर्नो विश्वैः सुमना अहेलन् राजन्त्सोम प्रति हव्या गृभाय ॥ ( ऋ० १।६१।४ ) † सविता के अनुवाक्य और याज्य मंत्र यह हैं:— १ आ विश्वदेवं सत्पतिं सूक्तैरद्या वृणीमहे । सत्य सवं सवितारम् ॥ ( ऋ० ५।८२।७ ) २ य इमा विश्वा जातान्याश्रावयति श्लोकेन । प्र च सुवाति सविता ॥ ( ऋ० ५।८२।६ ) ‡ अदिति के अनुवाक्य और याज्य मंत्र हैं:— १ सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् । दैवीं नावं स्वरित्रामनागसमस्रवन्तीमा रुहेमा स्वस्तये । ( ऋ १०।६३।१० ) २ महीम् षु मातरं सुव्रतानामृतस्य पत्नीमवसे हवा महे । तुविक्षत्रामजरन्तीमुरूचीं सुशर्माणमदितिं सुप्रणीतिम् ॥ ( अथर्ववेद ७।६।२ )

३२ [ प्रथम पञ्चिका दोहराता है जो उत्तम अर्थात् ऊपर का लोक है। इसीलिये यह (द्यौ) इस (पृथ्वी) को वर्षा से सींचता है। और सुखाता है। वह पांच देवतों के लिये अनुवाक्य और याज्य मंत्रों को बोलता है। यज्ञ पांच-भाग वाला है। सब दिशाओं की कल्पना (सिद्ध) हो जाती है और यज्ञ की भी कल्पना हो जाती है। उन पुरुषों के लिये भी कल्पना हो जाती है जिनके पास इस रहस्य को जानने वाला 'होता' होता है । (१) ८—जो तेज और ब्रह्मवर्चस् की कामना करे वह पूर्व की ओर जाकर प्रयाज आहुतियों को देवे । पूर्व दिशा तेज ब्रह्मवर्चस् है। जो इस रहस्य को समझ कर पूर्व दिशा की ओर जाकर (प्रयाज आहुतियां) देता है वह तेजस्वी और ब्रह्मवर्चस्वी होता है। जो अन्न आदि की इच्छा करे वह दक्षिण की ओर जाकर के प्रयाज आहुतियां दें । अग्नि अन्न का खाने वाला और अन्न- पति है। जो इस रहस्य को समझ कर दक्षिण की ओर जा करके आहुति देता है वह अन्न का खाने वाला और अन्न-पति हो जाता है और प्रजा और अन्न आदि से युक्त होता है। जो पशुओं की कामना करे वह पश्चिम की ओर जा करके प्रयाज आहुतियों को दे। ये जो जल हैं वह पशु हैं। जो इस रहस्य को समझ कर पश्चिम की ओर जा करके (प्रयाज आहुतियां) देता है वह पशु वाला होता है। जो सोमपान की कामना करे वह उत्तर की ओर जाकर प्रयाज आहुतियाँ दे। उत्तर दिशा सोम है। जो इस भेद को समझ कर उत्तर की ओर जाकर प्रयाज आहुतियां देता है वह सोम पान को प्राप्त हो जाता है। ऊपर की दिशा स्वर्ग वाली है। (जो ऊपर की दिशा में जाकर प्रयाज आहुतियां देता है) वह सब दिशाओं को प्राप्त हो जाता है। यह सब लोक एक दूसरे से सम्बद्ध हैं। जो इस रहस्य को समझता है उसके लिये यह सब लोक श्री के लिये चमकते हैं। पथ्या के याज्य मंत्रों को

दूसरा अध्याय ] ३३ दोहराता है। पथ्या के याज्य मंत्रों को दुहरा कर वह वाणी को यज्ञ के पहले रखता है। अग्नि प्राण है और सोम अपान। सविता प्रेरणा के लिये है और अदिति स्थापना के लिये। जब पथ्या के लिये याज्य मंत्र बोलता है तब वह यज्ञ को पथ अर्थात् मार्ग पर डाल देता है। अग्नि और सोम दो आँखें हैं। सविता प्रेरणा के लिये है और अदिति स्थापना के लिये। देवों ने यज्ञ को आँख से ही जाना। जो अप्रज्ञेय अर्थात् न जानी हुई चीज़ है उसे आँख से ही जानते हैं। जो अटकने पर आँख के निरन्तर प्रयोग के द्वारा जान लेता है वह जान लेता है। देवों ने जो यज्ञ को जाना वह इसी पृथ्वी पर जाना। इसी पृथ्वी पर यज्ञ की चीजें इकट्ठी कीं। इसी पृथ्वी पर यज्ञ ताना जाता है। इसी पर यज्ञ किया जाता है। इसी पृथ्वी पर यज्ञ की चीजें इकट्ठी की जाती हैं। यह पृथिवी ही अदिति है। अन्तिम याज्य मंत्र इसी अदिति के लिये है। यह अन्तिम याज्य मंत्र यज्ञ को जानने के लिये और पीछे से स्वर्ग को देखने के लिये बोला जाता है। (२) ९—कहा जाता है कि देवों की “साधारण जनता” ❀ होनी चाहिये। क्योंकि जब देवों की जनता होगी तो मनुष्य की भी होगी। जब सब जनता मिल गई तो यज्ञ तैयार हो गया। जिस जनता में इस रहस्य का समझने वाला 'होता' होता है उसके ❀ विश इत्ययं शब्दः प्रजामात्रवाची, वैश्यजाति विशेष वाची वा; सन्ति हि देवेष्वपि जाति विशेषाः ।—सायण हमारी सम्मति में विट् या मरुत् का अर्थ प्रजामात्र, या साधारण जनता (common people) है। यहाँ वैश्य जाति से तात्पर्य नहीं है। तात्पर्य यह है कि साधारण जनता का सहयोग यज्ञ के लिये आव- श्यक है। 'जनता' शब्द मूल में आया भी है (यज्ञोऽपि तस्यै जनतायै कल्पते यत्रैवं विद्वान् होता भवति )। ३

३४ [ प्रथम पञ्चिका लिये भी यह यज्ञ तैयार हो जाता है । ( नीचे का मन्त्र पढ़ने से देव जनता से युक्त हो जाते हैं ) स्वस्ति नः पथ्यासु धन्वसु स्वस्त्यप्सु वृजने स्वर्वति । स्वस्ति नः पुत्रकृथेषु योनिषु स्वस्ति राये मरुतो दधातन ॥ (ऋ० १०।६३।१५) मरुत देवों की जनता हैं । यज्ञ के आरम्भ में होता इस मंत्र को पढ़ कर उन (मरुतों) को तैयार कर देता है । कहते हैं कि होता (याज्य और अनुवाक्य मन्त्रों में) सब छन्दों के मंत्र बोले । देव सब छन्दों द्वारा यज्ञ करके स्वर्गलोक को प्राप्त हुये । इसी प्रकार यजमान भी सब छन्दों द्वारा यज्ञ करके स्वर्गलोक को प्राप्त कर लेता है । “स्वस्ति नः पथ्यासु” और “स्वस्ति रिद्धि प्रपथे श्रेष्ठा” (ऋ० १०।६३।१५, १६) यह दो मंत्र जो “पथ्यायाः स्वस्तेः” अर्थात् मार्ग के कल्याण के लिये हैं, त्रिष्टुभ् छन्द में हैं । “अग्ने नय सुपथाराये अस्मान्” (ऋ० १।१८९।१) और “आ देवाना- मपि पन्थामगन्म” (ऋ० १०।२।३) जो अग्नि के लिये हैं यह दोनों भी त्रिष्टुभ् छन्दों में हैं । “त्वं सोम प्रचिकितो मनीषा” (ऋ० १।९१।१) और “याते धामानि दिवि या पृथिव्यां” (ऋ० १।९१।४) यह दोनों सोम के मंत्र भी त्रिष्टुभ् में हैं । “आ विश्वदेवं सत्पतिं” (ऋ० ५।८२।७) और “य इमा विश्वा जातानि” (ऋ० ५।८२।९) यह दोनों सविता के मन्त्र गायत्री छन्द में हैं । “सुत्रामाणं पृथिवीं द्यामनेहसं” (ऋ० १०।६३।१०) और “महीम् षु मातरं सुव्रतानाम्” (अथर्व० ७।६।२) यह दोनों अदिति के मंत्र जगती छन्द में हैं । यह त्रिष्टुभ्, गायत्री और जगती मुख्य छन्द हैं । अन्य छन्द इनके अनुयायी हैं । यही यज्ञ में विशेषतः काम आते हैं । इसलिये जो इस रहस्य को समझ कर इन छन्दों में अनु-

दूसरा अध्याय ] ३५ वाक्य और याज्य पढ़ता है वह मानो सब छन्दों द्वारा यज्ञ कर लेता है । (३) १०—( प्रायणीय इष्टि के ) इन सब अनुवाक्य और याज्य मन्त्रों में 'प्र', 'नी', 'पथि', 'स्वस्ति' शब्द आते हैं। देवों ने इन्हीं से यज्ञ करके स्वर्ग लोक की प्राप्ति की । इसी प्रकार यजमान भी इन्हीं मन्त्रों से यज्ञ करके स्वर्ग लोक को जाता है । इनमें एक पद है "स्वस्ति राये मरुतो दधातन" (ऋ० १०।६३।१५) अर्थात् "हे मरुतो, हमको कल्याण युक्त धन दो ।" मरुत देवों के वैश्य हैं और अन्तरिक्ष में रहते हैं। जो स्वर्ग को जाता है वह उनसे निवेदन करने जाता है, वह उसको रोक या मार भी सकते हैं। होता जो कहता है "स्वस्ति राये मरुतो दधातन" ( ऋ० १०।६३।१५ ), वह ऐसा कह कर मानों यजमान का देवों के वैश्य मरुतों के साथ परिचय कराता है । तब मरुत न तो उसको जो स्वर्ग को जाता है, रोकते हैं और न मारते हैं। जो इस रहस्य को जानता है वह उनके द्वारा स्वर्ग लोक तक अच्छा मार्ग पा लेता है । इस ( प्रायणीय इष्टि ) की स्विष्टकृत् आहुति के लिये जो दो संयाज्य मन्त्र हैं, वह विराट् छन्द में होने चाहिये । जिसमें तेतीस अक्षर होते हैं । यह दो मन्त्र यह हैं :— (१) सेदग्निरग्नींरत्यस्त्वन्यान्यत्र वाजी तनयो वंळुगशिः । सहस्र पाथा अक्षरा समेति । (ऋ० ७।१।१४) (२) सेदग्निर्यो वनुष्यतो निपाति समेद्धारमंहस उरुष्यात् । सुजातासः परि चरन्ति वीराः । (ऋ० ७।१।१५) देवों ने इन दो संयाज्यों को विराट् छन्द में पढ़ कर स्वर्ग की प्राप्ति की । इसी प्रकार जो यजमान इन दोनों संयाज्यों को विराट् छन्द में पढ़ता है वह स्वर्ग लोक की प्राप्ति कर लेता है । इनमें तेतीस अक्षर होते हैं । तेतीस ही देवते हैं, आठ वसु, ग्यारह रुद्र, बारह आदित्य, प्रजापति और वषट्कार । इस प्रकार

३६ [ प्रथम पञ्चिका मन्त्र के तेतीस अक्षरों में होता देवों को यज्ञ के अग्र भाग में ही यज्ञ में शरीक कर लेता है। क्योंकि एक एक अक्षर एक एक देव के लिये पात्र है ( dish ) है जिससे वे प्रसन्न और तृप्त हो जाते हैं। (४) ११—कुछ लोग कहते हैं कि प्रायणीय इष्टि में प्रयाज पढ़ने चाहिये और अनुयाज नहीं पढ़ने चाहिये। क्योंकि प्रायणीय इष्टि के अनुयाज हीन हैं अर्थात् उनमें देर लगती है। परन्तु यह पक्ष आदर के योग्य नहीं है। प्रयाज और अनुयाज दोनों ही होने चाहिये। प्रयाज प्राण हैं और अनुयाज प्रजा हैं। यदि प्रयाजों को छोड़ देगा तो यजमान के प्राणों को छोड़ देगा। और यदि अनुयाजों को छोड़ देगा, तो यजमान की सन्तान को छोड़ देगा। इसलिये (प्रायणीय इष्टि में) प्रयाज और अनुयाज दोनों ही होने चाहिये। पत्नियों* के संयाज्यों को न बोले। न संस्थित यजुओं को। इतना यज्ञ पूरा हो गया। यज्ञ की संतति (जारी रखने) के लिये प्रायणीय इष्टि का शेष भाग उदयनी इष्टि के भाग में मिलाने के लिये रख लेना चाहिये। (जिससे दोनों इष्टियां मिल कर एक हो जायं)। यज्ञ बीच में न टूटे इसके लिये एक और उपाय है अर्थात् जिस थाली में प्रायणीय इष्टि का पुरोडाश तैयार किया, उसी थाली में उदयनीय-इष्टि का पुरोडाश तैयार करे। इस प्रकार, यज्ञ बीच में टूटता नहीं। उसका सिलसिला कायम रहता है। कुछ लोगों का कहना है कि इससे लोग परलोक में सफल हो जाते हैं, इस लोक में नहीं। जब यह 'प्रायणीयम्', 'प्रायणीयम्'

  • राका सिनीवाली (पूर्णिमा के) और कुहू और अनुमति (अमावस्या के) देवपत्नियों के लिये जो मंत्र पढ़े जाते हैं, वह पत्नी- संयाज्य कहलाते हैं।

दूसरा अध्याय ] ३७ कह कर पुरोडाश को निकालते और आहुति देते हैं तो यजमान उस लोक को चले जाते हैं (प्रयन्ति)। परन्तु इन लोगों का यह कथन अविद्यावश है। प्रायणीय और उदयनीय इष्टियों के याज्य और अनुवाक्य मन्त्रों में इस प्रकार उलट फेर होना चाहिये कि प्रायणीय इष्टि का अनुवाक्य उदयनीय इष्टि का याज्य मन्त्र हो जाता है और प्रायणीय इष्टि का याज्य मन्त्र उदयनीय इष्टि का अनुवाक्य हो जाता है। होता इस उलट फेर को इसलिये करता है कि दोनों लोकों में समृद्धि प्राप्त हो, दोनों लोकों में प्रतिष्ठा प्राप्त हो। जो इस रहस्य को समझता है वह दोनों की समृद्धि और दोनों लोकों की प्रतिष्ठा पा लेता है। अदिति के लिये जो चरु प्रायणीय इष्टि में और जो उदयनीय इष्टि में दिया जाता है, वह यज्ञ के धारण करने के लिये, यज्ञ के बांधने के लिये अर्थात् इसलिये दिया जाता है कि यज्ञ हाथ से निकलने न पावे। किसी ने कहा है कि यह ऐसे ही है जैसे किसी रस्सी के दोनों सिरे बांधने से वह रस्सी हाथ से छूटने नहीं पाती। इसी प्रकार प्रायणीय और उदयनीय इष्टियों में अग्नि को चरु देकर होता यज्ञ के दोनों शिरों को बांध देता है। 'पथ्या स्वस्ति' के साथ ही उदयनीय इष्टियों में समाप्त कर देते हैं। इस प्रकार यजमान स्वस्ति के साथ यहां आरम्भ करते हैं और स्वस्ति के साथ वहां (परलोक में) समाप्त कर देते हैं। (५) ऐतरेय ब्राह्मण की पहली पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त

तीसरा अध्याय सोम-क्रय, अग्नि-मथन, आतिथ्य-इष्टि १२—देवों ने राजा सोम को पूर्व दिशा में खरीदा था। इस लिये यह पूर्व दिशा में ही खरीदा जाता है। उन्होंने तेरहवें महीने से सोम खरीदा था, इसलिये तेरहवां महीना निन्दनीय है। सोम का बेचना निन्दनीय है। इसलिये सोम का बेचने वाला पापी है। जब उसको मोल लेकर मनुष्यों के पास लाये तो उसकी शक्तियां तथा इन्द्रियां सब दिशाओं में फैल गईं। उन्होंने उनको एक ऋचा के द्वारा इकट्ठा करने की चेष्टा की। परन्तु वह न कर सके। तब उन्होंने दो, तीन, चार, पांच, छः और सात मन्त्रों से यत्न किया। परन्तु वह उनको इकट्ठा न कर सके। तब आठ मन्त्रों से सफल हुये और उनको प्राप्त किया। अष्ट (आठ) को अष्ट इसलिये कहते हैं कि इससे अश्नुते अर्थात् प्राप्ति होती है। ('अष्ट' अश् धातु से बनता है जिसका अर्थ है प्राप्त करना)। जो इस रहस्य को समझता है वह जो चाहता है उसी को पा लेता है। इसीलिये इन कर्मों में आठ आठ मन्त्र होते हैं जिससे सोम की इन्द्रियां और शक्तियां इकट्ठी हो सकें। (१) ( ३८ )