ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४ [ प्रथमं पञ्चिका ५।१३।४) मंत्र और दूसरे भाग के लिये "सोम यास्तेमयो भुवः" (ऋ० १।९१।९) मंत्र । मानों इस प्रकार "त्वया यज्ञं वितन्वते" पढ़ कर वह उस (यज्ञ न किये हुये) को यज्ञ देता है । जो "ईजान" है अर्थात् जिसने पहले यज्ञ किया है उसके लिये होता दूसरे दो मंत्र जपता है (१) "अग्निः प्रत्नेन मन्मना" (ऋ० ८।४४।१२) और (२) "सोमगीर्भिर्ष्ट्वावयम्" (ऋ० १।९१।११) । मंत्र में "प्रत्नम्" शब्द जो पड़ा है उससे पुरातन कर्म की ओर संकेत है । परन्तु यह दोनों जप छोड़े भी जा सकते हैं । इनके स्थान में वृत्र को मारने विषयक यह दो मंत्र बोलने चाहिये:—(१) अग्निर्वृत्राणि जंघनत् (ऋ० ६।१६।३४); (२) त्वं सोमासि सत्पतिः (ऋ० १।९१।५) । चूंकि जिसके पास यज्ञ आता है वह वृत्र को मार देता है, इसलिये वृत्र के मारने सम्बन्धी दो ऋचाओं को बोलना चाहिये । अग्नि और विष्णु के हविष् का याज्य है "अग्निर्मुखं प्रथमो सोम यास्ते मयोभुव ऊतयः सन्ति दाशुषे । ताभिर्नोऽविताभव ॥ ( ऋ० १।६१।६ ) अग्निः प्रत्नेन मन्मना शुम्भानस्तन्वं स्वाम् । कविर्विप्रेण वावृधे ॥ ( ऋ० ८।४४।१२ ) सोम गीर्भिष्ट्वा वयं वर्धमानो वचोविदः । सुमृडीको न आ विश ॥ ( ऋ० १।९१।११ ) अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद् द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥ ( ऋ० ६।१६।३४ ) त्वं सोमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा । त्वं भद्रो असि क्रतुः ॥ ( ऋ १।६१।५ )