ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ] २५ देवतानाम्” और अनुवाक्य है “अग्निश्चविष्णो तप उत्तमं महः❀ ।” यह अग्नि और विष्णु के मंत्र रूप-समृद्ध हैं अर्थात् जैसा कृत्य हो उसी के अनुसार है। जो कृत्य के अनुसार होता है उससे यज्ञ की सफलता होती है। अर्थात् ऐसे मंत्रों से जिनमें उस क्रिया का विधान है जो होने वाली है। देवतों में अग्नि और विष्णु दीक्षापाल अर्थात् दीक्षा की रक्षा करने वाले हैं। वे दोनों दीक्षा पर स्वामित्व रखते हैं। जब अग्नि और विष्णु के लिये हवि दी जाती है तो जो दोनों दीक्षा पर शासन करते हैं वे प्रसन्न हो जाते हैं। और दीक्षा को प्रदान कर देते हैं। अर्थात् जो दीक्षा देने वाले हैं वह दीक्षा देते हैं। ये दोनों मंत्र त्रिष्टुभ् छन्द में हैं जिससे (यजमान को) इन्द्र का पद प्राप्त हो जाय। (४) ५—जिसको तेज और ब्रह्मवर्चस् की कामना हो वह स्विष्ट- कृत संयाज्य में गायत्री छन्द के दो मंत्र बोले। गायत्री तेज और ब्रह्मवर्चस वाली है। जो इस रहस्य को समझ कर गायत्री छन्द वाले दो मंत्रों को बोलता है वह तेजस्वी और ब्रह्मवर्चसी हो जाता है। जो दीर्घायु चाहे वह “उष्णिक्” छन्द के दो मंत्र बोले। क्योंकि उष्णिक् आयु वाला है। जो इस रहस्य को समझ कर इन दो उष्णिक् छन्दों वाले मंत्रों को पढ़ता है वह पूर्ण आयु वाला हो जाता है। ❀ यह दो मन्त्र, जो ऋग्वेद में नहीं पाये जाते श्रौत सूत्र ( आश्व- लायन ) में इस प्रकार हैं :— ( पूर्व० ४.२ ) अग्निर्मुखं प्रथमो देवतानां संगतानामुत्तमो विष्णुरासीत् । यजमानाय परिगृह्य देवान् दीक्षयेदंहविरागच्छतं नः ॥१॥ अग्निश्च विष्णो तप उत्तमं महो दीक्षापालाय वन तंहि शक्रा । विश्वैर्देवैर्यज्ञियैः संविदानौ दीक्षामस्मै यजमानाय धत्तम् ॥२॥