ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 355, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौथा अध्याय ] ३४१ (१, २) अन्नादा चान्न पत्नी च । (अन्न खाने वाली और अन्न की पत्नी) । अन्न खाने वाली अग्नि है और अन्न पत्नी आदित्य । (३, ४) भद्रा च कल्याणी च । 'भद्र' सोम है और 'कल्याणी' पशु हैं । (५, ६) अनिलया चापभयाच । (घर रहित और भय रहित) । घर रहित वायु है क्योंकि किसी एक जगह नहीं ठहरती । और भय रहित मृत्यु है क्यों सब उससे डरते हैं । (७, ८) अनाप्ता चा अनाप्या च । (प्राप्त न की हुई और प्राप्त न की जाने वाली) अनाप्ता पृथिवी है और अनाप्या द्यौ । (९, १०) अनाधुष्याचाप्रतिधुष्याच । (न जीते जाने वाली और न रुकने वाली) । न जीते जाने वाली अग्नि है और न रुकने वाला सूर्य । (११, १२) अपूर्वाचाभ्रातृव्या च (जिसका कोई कारण नहीं और जो नाश नहीं हो सकता) । जिसका कोई कारण नहीं वह मन है । और जो नष्ट न हो सके वह संवत्सर है । यह बारह प्रजापति के तनु या शरीर हैं । प्रजापति पूरा है । दसवें दिन पूरे प्रजापति को प्राप्त होते हैं । अब 'ब्रह्मोद्यम्' को पढ़ते हैं :- “अग्निर्गृहपतिरिति हैक आहुः सोस्य लोकस्य गृहपतिर्वायुर्गृहपति- रिति हैक आहुः सोन्तरिक्षलोकस्य गृहपतिरसौ वै गृहपतिर्यो सौ तपत्येष पतिऋतवोण्हाः । येषां वै गृहपतिं देवं विद्वान् गृहपतिर्भवति राध्नोति स गृहपतीराध्नु वंति ते यजमानाः । येषां वा अपहतपाप्मानं देवं विद्वान् गृहपतिर्भवत्यप स गृहपतिः पाप्मानं हते ऽ पतेयजमानाः पाप्मानं घ्नतेऽध्वर्यो ऽरात्स्मारात्स्म” । “अग्नि गृहपति है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं क्योंकि अग्नि इस लोक का गृहपति है । कुछ लोग कहते हैं कि वायु गृहपति है'