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ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

चौथा अध्याय ] ३४१ (१, २) अन्नादा चान्न पत्नी च । (अन्न खाने वाली और अन्न की पत्नी) । अन्न खाने वाली अग्नि है और अन्न पत्नी आदित्य । (३, ४) भद्रा च कल्याणी च । 'भद्र' सोम है और 'कल्याणी' पशु हैं । (५, ६) अनिलया चापभयाच । (घर रहित और भय रहित) । घर रहित वायु है क्योंकि किसी एक जगह नहीं ठहरती । और भय रहित मृत्यु है क्यों सब उससे डरते हैं । (७, ८) अनाप्ता चा अनाप्या च । (प्राप्त न की हुई और प्राप्त न की जाने वाली) अनाप्ता पृथिवी है और अनाप्या द्यौ । (९, १०) अनाधुष्याचाप्रतिधुष्याच । (न जीते जाने वाली और न रुकने वाली) । न जीते जाने वाली अग्नि है और न रुकने वाला सूर्य । (११, १२) अपूर्वाचाभ्रातृव्या च (जिसका कोई कारण नहीं और जो नाश नहीं हो सकता) । जिसका कोई कारण नहीं वह मन है । और जो नष्ट न हो सके वह संवत्सर है । यह बारह प्रजापति के तनु या शरीर हैं । प्रजापति पूरा है । दसवें दिन पूरे प्रजापति को प्राप्त होते हैं । अब 'ब्रह्मोद्यम्' को पढ़ते हैं :- “अग्निर्गृहपतिरिति हैक आहुः सोस्य लोकस्य गृहपतिर्वायुर्गृहपति- रिति हैक आहुः सोन्तरिक्षलोकस्य गृहपतिरसौ वै गृहपतिर्यो सौ तपत्येष पतिऋतवोण्हाः । येषां वै गृहपतिं देवं विद्वान् गृहपतिर्भवति राध्नोति स गृहपतीराध्नु वंति ते यजमानाः । येषां वा अपहतपाप्मानं देवं विद्वान् गृहपतिर्भवत्यप स गृहपतिः पाप्मानं हते ऽ पतेयजमानाः पाप्मानं घ्नतेऽध्वर्यो ऽरात्स्मारात्स्म” । “अग्नि गृहपति है, ऐसा कुछ लोग कहते हैं क्योंकि अग्नि इस लोक का गृहपति है । कुछ लोग कहते हैं कि वायु गृहपति है'

३४२ [ पाँचवीं पञ्चिका क्योंकि वह अंतरिक्ष का गृहपति है । यह जो सूर्य्य है वह गृहपति है क्योंकि यह तपता है । ऋतु गृह हैं । जो जानता है कि ऋतुओं का गृहपति कौन है वह सफल होता है । ऐसे यज- मान सफल होते हैं । जो उस देव को जानता है जो पाप की बुराइयों को दूर करता है (अर्थात् सूर्य्य) वह गृहपति होता है । ये यजमान पाप की बुराई को दूर कर देते हैं । हे अध्वर्यु, हम सफल हो गये, हम सफल हो गये ।” ( ४ ) ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पंचिका का चौथा अध्याय समाप्त हुआ ।

पांचवाँ अध्याय २६—(अग्निहोत्री अध्वर्यु से) शाम को कहता है:— “आहवनीय अग्नि में से ले।” जो कुछ दिन में अच्छा काम किया उसको पूर्व की ओर ले जाकर भयरहित स्थान में रख देता है। सबेरे कहता है, “आहवनीय अग्नि में से ले।” जो कुछ रात में अच्छा काम करता है उसको पूर्व में ले जाकर निर्भय स्थान में रख देता है। आहवनीय यज्ञ है। आहवनीय स्वर्ग लोक है। जो इस रहस्य को समझता है वह यज्ञ रूपी स्वर्ग लोक को स्वर्ग में स्थापित कर देता है। जो सब देवों वाले, सोलह कला वाले, पशुओं में प्रतिष्ठित यज्ञ को जानता है वह सब देवों वाले, सोलह कला वाले और पशुओं में प्रतिष्ठित यज्ञ के द्वारा सफल होता है। जो गाय में है वह रुद्र का है। जो बछड़े में है वह वायु का है। जो दुहा जाने को है वह अश्विनों का, जो दुहा जा चुका वह सोम का है। जो आग पर पकाने रक्खा वह वरुण का है। जो उबलता है वह पूषा का है। जो टपक रहा है वह ( ३४३ )

३४४ [पाँचवीं पञ्चिका मरुतों का। जिस पर फेन उठता है वह विश्वेदेवों का है। मलाई मित्र की है। जो गिर पड़े वह द्यावापृथिवी का है। जो उबल पड़े वह सविता का, जो ले लिया गया वह विष्णु का। जो वेदी पर रक्खा जाता है वह बृहस्पति का है। पहली आहुति अग्नि की। पिछली प्रजापति की। जो आहुति हो चुकी वह इंद्र की। इस प्रकार यह सब देवों का, सोलह कला वाला और पशुओं में प्रतिष्ठित अग्निहोत्र है। जो इस सब देवों वाले, सोलह कला वाले, पशुओं में प्रतिष्ठित अग्निहोत्र को जानता है वह सफल होता है। (१) २७-अगर एक अग्निहोत्री की गाय जो बछड़ा के साथ है दूध दुहने के समय बैठ जाय तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? तब यह मंत्र पढ़े :- "यस्माद्भीषा निषीदसि ततो नो अभयं कृधि। पशून्नः सर्वान् गोपाय नमो रुद्राय मीढुषे ।" "जिससे डर कर तू बैठती है उससे हम को अभय करो। हमारे सब पशुओं की रक्षा कर। दानी रुद्र के लिये नमस्कार हो।" इस मंत्र को पढ़कर उठावे :- 'उदस्थाद् देव्यदितिरायुर्यज्ञपतावधात् । इंद्राय कृण्वती भागं मित्राय वरुणाय च।" "देवी अदिति उठी। और यजमान को दीर्घ जीवन दिया। इन्द्र, मित्र और वरुण को भाग देती हुई।" या उसके थन और मुख पर जलपात्र रखकर उसको ब्राह्मण को दे देवे। यह दूसरा प्रायश्चित्त है। अगर किसी अग्निहोत्री की गाय जो बछड़े से युक्त है दुहते में चिल्ला पड़े तो क्या प्रायश्चित्त है ? यदि भूख से चिल्ला पड़े और यजमान को प्रकट करे कि उसको क्या जरूरत है तो

पांचवाँ अध्याय ] ३४५ अधिक भोजन दे देवे । शान्ति के लिये । अन्न शान्ति है । और यह मंत्र बोले :— सूयवसाद् भगवती हि भूया अथो वयं भगवन्तः स्याम । अद्धि तृणमघ्न्ये विश्वदानीं पिब शुद्धमुदकमाचरन्ती ॥ ( ऋ० १।१६४।४० ) “बैठ और भगवती हो जिससे हम भी भगवन्त होवें । हे गौ, हर ऋतु में तृण खा । हमारे पास आती हुई शुद्ध जल पी ।” यह प्रायश्चित्त है । जिस अग्निहोत्री की बछड़े से युक्त गाय हिल जाय उसका क्या प्रायश्चित्त है ? यदि हिलकर दूध फैला दे तो उसे छूकर यह मंत्र जपे :— यद्य दुग्धं पृथिवीमसृपद्यदोषधीरत्यसृपद् यदापः । पयो गृहेषु पयो अघ्न्यायां पयोवत्सेषु पयो अस्तु तन् मयि ॥ “जो दूध आज जमीन पर फैल गया या ओषधि में मिल गया या जल में मिल गया वह दूध घरों में, वह गायों में, वह बछड़ों में, वह मुझ में हो ।” अब जो दूध बच रहे वह अगर काफ़ी हो तो उसकी आहुति दे दे । और अगर सब फैल गया हो तो दूसरी गाय मँगा कर दुहे और तब उसकी आहुति दें । श्रद्धा से हवन करना चाहिये । यह प्रायश्चित्त है । जो इस रहस्य को समझकर अग्नि- होत्र करता है उसको सब सामग्री मिल जाती है और उसे सभी चीज़ों की प्राप्ति हो जाती है । (२) २८—आदित्य इसका यूप है । पृथिवी वेदी है । ओषधि बर्हि हैं । वनस्पति ईं धन हैं । जल प्रोक्षणी है । दिशायें परिधि हैं, अगर अग्निहोत्री की कोई चीज़ खो जाय या वह मर जाय, या उसका कुछ नष्ट हो जाय तो यह सब उसको परलोक में

२४६ [ पाँचवीं पञ्चिका बर्हि पर रक्खा मिलेगा । जो इस रहस्य को समझकर अग्निहोत्र करता है उसे यह सब कुछ मिल जाता है । देव और मनुष्य दोनों को और सब को ( एक के प्रति दूसरे को ) दक्षिणा में देता है । जो कुछ शाम को आहुति दी जाती है । उससे देवों के लिये मनुष्यों तथा और सब चीज़ की दक्षिणा देता है । ये जो मनुष्य बिना रक्षा के सोते हैं वे मानों देवताओं के लिये दक्षिणा हैं। जो कुछ प्रातःकाल हवन किया जाता है वह मानों मनुष्यों के लिये देवताओं की तथा अन्य चीज़ों की दक्षिणा देता है । देवता ( मन की बात ) जान जाते हैं और कहते हैं कि “मैं करूँगा”, “मैं जाऊँगा ।” जो लोक सब कुछ देवताओं को देकर प्राप्त होता है वही लोक उसको मिलता है जो इस रहस्य को समझ कर अग्निहोत्र करता है । शाम की आहुति देकर अश्विन-शस्त्र का आरम्भ करता है । ‘वाक्’ ‘वाक्’ कह कर वाणी का प्रतिगार ( response ) करता है । जो इस रहस्य को समझ कर अग्निहोत्र करता है उसके अग्नि रात को अश्विन-शस्त्र का पाठ करता है । प्रातःकाल आदित्य के लिये आहुति देकर महाव्रत करता है । ‘अन्न’ ‘अन्न’ कह कर वह ‘प्राण’ का प्रतिगार करता है । जो इस रहस्य को समझ कर अग्निहोत्र करता है, उसके लिये आदित्य दिन में महाव्रत के शस्त्र का पाठ करता है । अग्निहोत्री वर्ष में ७२० आहुतियाँ शाम को देता है और ७२० सबेरे । इतनी ही ‘गवां अयन’ में ईंटें होती हैं । जो इस रहस्य को समझ कर अग्नि होत्र करता है वह अग्नि चिति द्वारा साल भर तक यज्ञ करता है । (३) २९—‘जातूकर्ण’ के पुत्र ‘वतवत’ के पुत्र ‘वृषशुष्म’ ने कहा,

पाँचवाँ अध्याय ] ३४७ “हम देवतों से कहेंगे कि जो अग्निहोत्र दोनों दिन ( उभयेद्यु ) किया जाता है वह तीसरे दिन ( अन्येद्यु ) किया जाय ।” गन्धर्वगृहीता नामी कुमारी ने कहा, “हम पितरों से कहेंगे कि जो अग्निहोत्र दोनों दिन किया जाता है वह तीसरे दिन किया जाय ।” जो अग्निहोत्र तीसरे दिन किया जाता है वह शाम को सूर्यास्त के बाद और सबेरे को सूर्योदय स पहले किया जाता है। और जो अग्निहोत्र दोनों दिन किया जाता है वह सूर्यास्त से पहले और सूर्योदय के बाद । इसलिये अग्नि-होत्र सूर्य-उदय के बाद करना चाहिये । जो सूर्य-उदय से पहले अग्निहोत्र करता है वह चौबीस वर्ष में गायत्री लोक को प्राप्त हो जाता है। और सूर्योदय के बाद करने वाला बारहवर्ष में। जो सूर्योदय से पहले दो साल अग्निहोत्र करता है वह सूर्योदय के बाद एक साल अग्निहोत्र करने के बराबर है। जो इस रहस्य को समझ कर सूर्योदय पर अग्निहोत्र करता है वह एक साल में ही इतना समाप्त कर लेता है। इसलिये सूर्योदय पर अग्नि-होत्र करना चाहिये । जो शाम को सूर्यास्त के बाद और प्रातःकाल सूर्योदय के बाद अग्निहोत्र करता है वह अहोरात्र ( दिन रात ) के तेज में हवन करता है। रात्रि अग्नि से तेज लेती है और दिन सूर्य से । जो इस रहस्य को समझ कर सूर्योदय पर अग्नि- होत्र करता है उसका हवन अहोरात्र ( रात दिन ) के तेज में होता है। इसलिये सूर्योदय पर हवन करना चाहिये । (४) ५०—यह जो दिन रात हैं वे साल के दो चक्र हैं। उन्हीं दोनों चक्रों (पहियों) के द्वारा संवत्सर चलता है। जो सूर्योदय से पहले अग्निहोत्र करता है वह ऐसा है जैसे मानों एक चक्र से चलता हो। परन्तु जो सूर्योदय के बाद हवन करता है

३४८ [ पाँचवीं पञ्चिका वह मानों दोनों पहियों से चलता है और निर्दिष्ट स्थान पर जल्दी पहुँचता है । इस सम्बन्ध में एक यज्ञगाथा कही जाती है :— “यह जो कुछ है और होगा वह बृहत् साम और रथन्तर साम से युक्त है । और उसी से स्थित है । धीर पुरुष अग्नि का आधान कर के दिन में अलग हवन करे और रात में अलग ।” रात रथन्तरी है और दिन बृहत् । अग्नि रथन्तरी और सूर्य्य बृहत् । जो इस रहस्य को समझ कर सूर्योदय के पश्चात् हवन करता है उसको यह दोनों देवते तेजोयुक्त स्वर्गलोक ( ब्रह्मस्य विष्टपं ) को पहुँचा देते हैं । इसलिये सूर्य्यो- दय पर हवन करना चाहिये । एक और गाथा गाई जाती है :— “जो सूर्य्योदय से पहले अग्निहोत्र करते हैं वे उस आदमी के बराबर हैं जो एक घोड़े से काम चलाता है और दूसरे को नहीं खरीदता ।” जब यह देवता ( सूर्य्य ) फैलता है तो सब उसके पीछे चलते हैं । जो इस रहस्य को समझता है उसके पीछे यह देवता चलता है । और सब उस देवते के पीछे चलते हैं । जो इस प्रकार हवन करता है उसका यह ( सूर्य्य ) एकमात्र अतिथि होता है । इस पर एक गाथा है :— “जिसने कमलों को चुराया या जिसने शाम को अतिथि का स्वागत नहीं किया वह इस पाप से निष्पाप को पापी बना देगा और पापी से पाप का निराकरण कर देगा” ( अर्थात् उसके कार्य्य उलट पलट हो जायेंगे ) । यह आदित्य ही एकमात्र अतिथि है । यह हवन करने वाले के साथ रहता है । जो इस देवता को बिना आहुति दिये

'पांचवाँ अध्याय ] ३४९ हुये समझता है कि मैंने अग्निहोत्र कर लिया और जो इस देवता को आहुति से वंचित कर देता है, उसको यह देवता भी इस लोक और परलोक दोनों से निकाल देता है। इसलिए जो समझे कि इतना ही अग्निहोत्र काफी है, उसे इस देवता को भी आहुति देनी चाहिये। इसलिये कहते हैं कि शाम के अतिथि को लौटाना न चाहिये । एक बार नगरी के रहने वाले एक विद्वान् जानश्रुतेय ने मनतन्तु की सन्तान एकादशाक्ष से कहा था, "हम सन्तान से पहचानते हैं कि किसी ने समझ कर यज्ञ किया या बेसमझे।" एकादशाक्ष के इतने लड़के थे कि सारा राज्य भर जाय । जो सूर्योदय के पश्चात् हवन करता है उसके भी इतनी ही सन्तान होती है। (५) ३१—उदय होकर सूर्य्य अपनी रश्मियों को आहवनीय में मिला देता है। इसलिये जो सूर्योदय से पहले अग्निहोत्र करता है, वह उस कुमारी के समान है जो अभी उत्पन्न न हुये बच्चे को दूध पिलावे या गाय न उत्पन्न हुये बछड़े को थन दे। लेकिन जो सूर्योदय के बाद अग्निहोत्र करता है वह उस कुमारी के समान है जो उत्पन्न हुये बच्चे को दूध पिलाती है। या उस गाय के समान है जो उत्पन्न हुये बछड़े को थन देती है। इस प्रकार सूर्य्य के लिये जो अग्निहोत्र किया जाता है उसके बदले सूर्य्य अग्निहोत्री को इस लोक और परलोक दोनों में खाना देता है। सूर्योदय से पहले अग्निहोत्र करना ऐसा है जैसा उस आदमी या हाथी के सामने खाना फेंकना जो अपना कर नहीं बढ़ा रहा। लेकिन सूर्योदय के पश्चात् अग्नि- होत्र करना ऐसा है जैसे उस आदमी या हाथी के सामने खाना रखना जो अपने करों (हाथ या सूंड) को फैला रहा

३५० [ पाँचवीं पञ्चिका हो। जो इस रहस्य को समझ कर सूर्य्योदय के पश्चात् अग्नि- होत्र करता है वह सूर्य्य के करों से अपने अग्निहोत्र को उठाता है और स्वर्ग लोक में रख देता है। इसलिये सूर्य्योदय पर अग्नि-होत्र करना चाहिये। उदय होने पर सूर्य्य सब चीज़ों को प्राण देता है। इस लिये उसको प्राण कहते हैं। जो इस रहस्य को समझ कर सूर्य्योदय के पश्चात् अग्निहोत्र करता है उसकी आहुतियाँ इसी प्राण (सूर्य्य) में स्थित रहती हैं। इसलिये सूर्य्योदय के पश्चात् अग्निहोत्र करना चाहिये। जो सायंकाल को सूर्यास्त पर और प्रातःकाल सूर्य्योदय पर अग्निहोत्र करता है वह सत्य बोलता है। सायंकाल की आहुति यह है :- भूर्भुवः स्वरो३मग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः। प्रातःकाल की आहुति यह है :- भूर्भुवः स्वरो सूर्य्योज्योतिर्ज्योतिः सूर्य्यः ॥ सच्चा आदमी सूर्य्योदय पर अग्निहोत्र करके सच्ची आहुति देता है। इसलिये सूर्य्योदय पर अग्निहोत्र करना चाहिये। इसके विषय में यह गाथा कही जाती है। "जो सूर्य्योदय से पहले अग्निहोत्र करते हैं वह झूठ बोलते हैं क्योंकि जो दिन की बात है वह दिन में नहीं करते। वह सूर्य्य की ज्योति का पाठ करते हैं और उनके पास उस समय ज्योति नहीं होती।" (६) ३२-प्रजापति ने चाहा कि मैं सन्तान उत्पन्न करूँ और बहुत हो जाऊँ। उसने तप तपा। उसने तप करके इन लोकों को उत्पन्न किया। पृथिवी को, अन्तरिक्ष को, द्यौ को। उन लोकों को गर्म किया। उन तपे हुओं से तीन ज्योतियां उत्पन्न हुईं। पृथिवी से अग्नि, अन्तरिक्ष से वायु और द्यौ से सूर्य्य। उन तीनों ज्योतियों को तपा और उनसे तीन वेद उत्पन्न हुये।

पाँचवाँ अध्याय ] ३५१ अग्नि से ऋग्वेद, वायु से यजुर्वेद, आदित्य से सामवेद । उसने इन वेदों को तपा । इनसे तीन शुक्र उत्पन्न हुये । ऋग्वेद से भूः , यजुर्वेद से भुवः, सामवेद से स्वः । उसने इन तीन शुक्रों को तपा । उनसे तीन वर्ण उत्पन्न हुये अकार, उकार और मंकार । उसने तीनों को जोड़ दिया । इससे ओ३म् हुआ । इसलिये ओम् ओम् कहता है । ओ३म् स्वर्गलोक है । और ओ३म् वह है जो तपता है (अर्थात् सूर्य्य) । प्रजापति ने यज्ञ ताना । यज्ञ को लिया और यज्ञ किया । उसने ऋग्वेद से होता का काम किया । यजुः से अध्वर्यु का और साम से उद्गाता का । इन तीन विद्याओं में जो शुक्र (वीर्य्य) था उससे ब्रह्मत्व को उत्पन्न किया । उस प्रजापति ने यज्ञ देवों को दिया । उन देवों ने यज्ञ को ताना, यज्ञ को लिया और यज्ञ को किया । ऋग्वेद से होता का काम किया, यजुर्वेद से अध्वर्यु का और सामवेद से उद्गाता का । इन तीन विद्याओं के शुक्र से ब्रह्मत्व को उत्पन्न किया । देवों ने प्रजापति से पूछा कि अगर हमसे ऋग्वेद में कोई चूक हो जाय या यजुर्वेद में या साम में, भूल से या आपत् काल में तो क्या प्रायश्चित्त है । प्रजापति ने देवों से कहा, “अगर ऋग्वेद में कोई भूल हो जाय तो ‘भूः’ से गार्हपत्य अग्नि में आहुति दो । अगर यजुः में भूल हो जाय तो ‘भुवः’ से अग्नीध्रीय अग्नि में या अन्वाहार्यपचन अर्थात् दक्षिणाग्नि में आहुति दो । अगर साम में भूल हो जाय तो ‘स्वः’ से आह्व- नीय में । यदि बेजाने या आपत्ति के कारण भूल हो जाय तो आहवनीय अग्नि में भूर्भुवः स्वः तीनों से । यह तीन व्याहृतियों द्वारा यज्ञ की बिखरी हुई चीज़ों को ऐसे जोड़ते हैं जैसे एक चीज को दूसरी से । एक टुकड़े को दूसरे से । एक कड़ी को

३५२ [ पाँचवीं पञ्चिका दूसरी से। या चमड़े या किसी चीज़ के टुकड़ों को। यह व्याहृतियां सब के लिये प्रायश्चित्त हैं। इन व्याहृतियों से ही प्रायश्चित्त करना चाहिये। ( ७ ) ३३--इस पर महावाद ( बड़े लोग ) पूछते हैं :—“जब ऋग्वेद से होता का काम किया जाता है, यजुर्वेद से अध्वर्यु का और सामवेद से उद्गाता का, और इस प्रकार त्रयीविद्या पूर्ण हो जाती है तो ब्रह्मा का काम किससे किया जाता है ?” इसका उत्तर यह है, 'त्रयी विद्या से ही'। यह जो बहता है ( पवन ) वह यज्ञ है। इसके दो मार्ग हैं एक वाणी दूसरा मन। वाणी और मन से यज्ञ किया जाता है। यह वाणी हुई। यह मन हुआ। वाणी से त्रयी विद्या द्वारा ऋत्विज लोग एक पक्ष को करते हैं। परन्तु ब्रह्मा केवल मन से काम करता है। कुछ ब्राह्मण प्रातरनुवाक की तैयारी पर स्तोम भागों को जपकर बैठ जाते हैं और बातचीत करते हैं। एक ब्राह्मण ने ब्रह्मा को प्रातरनुवाक के बाद बोलते देखकर कहा था कि इसने यज्ञ का आधा भाग लुप्त कर दिया। जैसे एक पैर से चलने वाला मनुष्य या एक पहिये से चलने वाला रथ गिर पड़ता है उसी प्रकार यज्ञ भ्रष्ट हो जाता है और उसके साथ यजमान भी भ्रष्ट हो जाता है ( यदि ब्रह्मा बोलता है क्योंकि उसे मौन रहना चाहिये )। इसलिये ब्रह्मा को प्रातरनुवाक के आदेश देने के बाद बोलना नहीं चाहिये। जब तक उपांशु और अन्तर्याम से आहुतियां न दी जायं। पवमान स्तोत्र के आदेश के बाद भी जब तक अन्त की ऋचा न बोली जाय ( मौन रहना चाहिये )। जब स्तोत्र और शस्त्र पढ़े जाते हों तब वषट्कार तक मौन रहे। जैसे दोनों पैरों से चलने वाला आदमी और दोनों पहियों से चलने वाला रथ गिरता

पाँचवाँ अध्याय ] ३५३ नहीं। इसी प्रकार इस तरह यज्ञ करने से यज्ञ भ्रष्ट न होगा और न यजमान ही उसके साथ भ्रष्ट होगा। (८) ३४-इस पर प्रश्न उठाते हैं कि जब अध्वर्यु को दक्षिणा दी जाती है तो यजमान समझता है कि इसने मेरे बजाय मेरे ग्रहों को थामा। परिक्रमा की। आहुतियां दीं। इसी प्रकार जब उद्गाता को दक्षिणा दी जाती है तो यजमान समझता है कि इसने मेरे लिये गायन किया। जब होता को दक्षिणा दी जाती है तो यजमान समझता है कि इसने मेरे लिए अनुवाक्, याज्य और शस्त्र पढ़े। लेकिन ब्रह्मा ने क्या किया कि उसे दक्षिणा मिले। क्या यजमान समझता है कि इसे बिना किसी श्रम के ही दक्षिणा मिले। इसका उत्तर यह है कि यज्ञ की चिकित्सा के लिये। ब्रह्मा यज्ञ का चिकित्सक है। ब्रह्मा ब्रह्म के द्वारा यज्ञ करता है। ब्रह्म छन्दों का रस है। वह यज्ञ का आधा काम करता है, और आधा अन्य ऋत्विज् करते हैं। ब्रह्म ऋत्विजों का अध्यक्ष होता है। इसलिये यदि ऋक् में, यजुः में या साम में बे जाने या आपत्काल में भूल हो जाय तो ब्रह्मा से ही निवेदन करते हैं। इसलिये यदि ऋक् में भूल हो तो ब्रह्मा 'भूः' कहकर गार्हपत्य में आहुति दे। यदि यजुः में भूल हो तो 'भुवः' कहकर अग्नीध्रीय या अन्वाहार्यपचन अग्नि में आहुति दे। यदि साम में भूल हो तो 'स्वः' कहकर आहव- नीय अग्नि में। यदि अज्ञानवश या आपत्काल में भूल हो तो 'भूर्भुवः स्वः' कहकर आहवनीय में आहुति दे। स्तोत्र पढ़ने का आदेश मिलने पर प्रस्तोता कहता है :- "ब्रह्मन् स्तोष्यामः प्रशास्तः" 'हे हमारे नेता ब्रह्मा, हम स्तोत्र पढ़ेंगे'। इस पर ब्रह्मा प्रातःसवन में कहता है :- 'भूः ! इंद्रवंतः स्तुध्वम्" २३

३५४ [ पाँचवीं पञ्चिका ( भूः । इन्द्र वाले होकर स्तुति करो । ) दोपहर के सवन में कहे :— “भुवः । इन्द्रवंतः स्तुध्वम्” तीसरे सवन में कहे :— “स्वः । इन्द्रवंतः स्तुध्वम्” ऊक्थ्य या अतिरात्र में कहे :— “भूर्भुवः स्वः । इन्द्रवंतः स्तुध्वम्” अगर ब्रह्मा कहे, “इन्द्रवंतः स्तुध्वम्”, इसका अर्थ है कि इन्द्र का यज्ञ है। इंद्र यज्ञ का देवता है। 'इन्द्रवन्त' कह कर ब्रह्मा उद्गीथ को इन्द्रवाला करता है। अर्थात् “इन्द्र से मत अलग हो । इन्द्रवाले होकर स्तुति करो”। वह ऐसा कहता है। (९) ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवीं पञ्चिका का पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ। ऐतरेय ब्राह्मण की पाँचवी पञ्चिका समाप्त हुई।

छठी पञ्चिका

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पहला अध्याय १—देवता गण सर्वचरु में सत्र करने बैठे । वे पाप के फल को दूर न कर सके । उनसे कद्रु का पुत्र, सर्प ऋषि, मंत्रों का कर्त्ता अर्बुद बोला, "होता से की जाने वाली एक क्रिया तुम से छूट गई । उसे मैं कर दूँ । तब तुम पाप के फल से छूट जाओगे ।" उन्होंने कहा, "अच्छा" । हर मध्य दिन के सवन में वह आया । उनके पास बैठा और पत्थरों पर सोम को निचोड़ा । उसी के अनुकरण में मध्यदिन के सवन में पत्थरों पर सोम निचोड़ते हैं, जिस मार्ग से वह आता था उसे "अर्बुदोदा सर्पणी" कहते हैं । सोम राजा ने उन देवों को मद-युक्त कर दिया । उन्होंने कहा, "विषवाला साँप हमारे राजा की ओर देखता है । उसकी आँखों से पट्टी बाँध दें," इसी के अनुकरण में अब भी पट्टी बाँध कर पत्थरों पर सोम निचोड़ते हैं । सोम राजा ने उनको मद-युक्त कर दिया । उन्होंने कहा, "यह पत्थर पर सोम निचोड़ने के समय अपने ही मंत्र पढ़ता ( ३५७ )

३५८ [ छठी पञ्चिका है। हम दूसरी ऋचायें इसमें जोड़ दें।" बस उन्होंने उसके मंत्रों में अन्य ऋचायें जोड़ दीं। अब राजा सोम उनको मद- युक्त न कर सका। उसके मंत्र में और ऋचायें शान्ति के लिये मिलाने से वह पाप के फल को निवृत्त कर सके। उन्हीं के अनुकरण में साँप अपने पापों को निवृत्त कर सके। और पुरानी केंचुल को छोड़कर नई ले सके। जो इस रहस्य को समझता है वह पाप को निवृत्त करता है। (१) २-प्रश्न है कि कितनी ऋचाओं से पत्थर पर सोम निचोड़े। सौ से। पुरुष शतायुः, शतवीर्य और शत-इन्द्रिय होता है। ऐसा करने से पुरुष शतायु, शतवीर्य और शत-इंद्रिय होता है। कुछ कहते हैं कि तेतीस ऋचायें बोले। क्योंकि तैंतीस देवताओं का पाप निवृत्त किया। देव तैंतीस हैं। कुछ कहते हैं कि अपरिमित ऋचायें बोले। क्योंकि प्रजापति अपरिमित है और पत्थर पर सोम निचोड़ने का कृत्य प्रजापति का है। इससे सब कामनायें पूरी हो जाती हैं। जो ऐसा करता है वह सब इच्छाओं को पूरी करता है। इसलिये अपरिमित मंत्र बोलना चाहिये। अब प्रश्न यह है कि कैसे मंत्र बोले ? अक्षर अक्षर या चार चार अक्षर या पद पद, या आधे आधे मंत्र या मंत्र मंत्र। मंत्र मंत्र तो पढ़े नहीं जाते। न पद पद पढ़े जाते हैं। यदि अक्षर अक्षर करके या चार चार अक्षर करके पढ़ें तो छन्द लुप्त हो जाते हैं। क्योंकि बहुत से अक्षर छूट जाते हैं। इस लिये आधे आधे मंत्र कह कर पढ़े। प्रतिष्ठा के लिये मनुष्य दोपाया है और पशु चौपाया। इस प्रकार वह चौपायों में यजमान को स्थापित करता है। इसलिये आधे आधे मंत्र करके पढ़ना चाहिये। इस पर शंका उठाते हैं कि जब मध्यदिन

पहला अध्याय ] ३५९ के सवन में ही ग्रावस्तुत किया जाता है तो दूसरे दो सवनों में ग्रावस्तुति कैसे होती है । इसका उत्तर यह है कि प्रातः सवन का सम्बन्ध गायत्री से है । इस लिये प्रातः सवन में गायत्री से स्तुति की जाती है । तीसरे सवन का संबन्ध जगती से है इसलिये तीसरे सवन में जगती से स्तुति की जाती है । इस प्रकार जो इस रहस्य को समझ कर मध्यदिन के सवन में ग्रावस्तुति करता है वह प्रातः और सायं सवनों को भी स्तुति- संपन्न कर देता है । इस पर प्रश्न करते हैं कि जब अध्वर्यु अन्य ऋत्विजों को सब अन्य कामों के लिये आदेश करता है तो ग्रावस्तुति में बिना आदेश के ही क्यों पाठ होता है ? इसका उत्तर यह है कि ग्रावः स्तोत्रीय का संबंध मन से है । मन को आदेश नहीं दिया जाता । इस लिये बिना आदेश के ही ग्रावःस्तुति की जाती है ।(२) ३—वाक् ही सुब्रह्मण्या है । सोम राजा उसका बेटा है । सोम राजा को खरीद के समय सुब्रह्मण्या को बुलाते हैं जैसे किसी गाय को बुलावें । इसी बेटे के द्वारा यजमान के लिये सब कामनायें दुही जाती हैं । जो इस रहस्य को समझता है वाणी उसकी सभी कामनाओं को पूरा कर देती है । इस पर प्रश्न करते हैं कि सुब्रह्मण्या का सुब्रह्मण्यात्व क्या है ? इसका उत्तर है कि वाक् ही सुब्रह्मण्या है । वाक् ही ब्रह्म है । वाक् सुब्रह्म है । इस पर शका है कि सुब्रह्मण्या ऋत्विज् पुरुष है । उसको स्त्री कहकर क्यों पुकारते हैं ? इसका उत्तर यह है कि वाक् ही सुब्रह्मण्या है । इसी से ।

३६० [ छठी पञ्चिका अब प्रश्न है कि जब अन्य ऋत्विज् सब कृत्य वेदी के भीतर करते हैं और सुब्रह्मण्या वेदी के बाहर । तो उसका किया हुआ वेदी के भीतर किया हुआ कैसे समझा जाता है ? इसका उत्तर यह है कि वेदी में एक उत्कर ( outlet, बाहर फेंकने का मार्ग ) होता है, उसमें होकर ( अनावश्यक चीजें ) बाहर फेंकी जाती हैं। उस उत्कर में खड़े होकर जो आह्वान किया जाता है वह ( वेदी के भीतर किया हुआ ही समझा जाता है )। इस पर शंका है कि उत्कर में खड़े होकर सुब्रह्मण्या क्यों पढ़ी जाती है। ( इस पर एक गाथा है ) :— ऋषियों ने एक सत्र किया था। उनमें जो सबसे बूढ़ा था उस से वे बोले, “सुब्रह्मण्या को बुला । हम में से तू देवतों के निकटतम होकर बुलायेगा ( बूढ़ा होने से तू देवों के निकट है ) इस लिये सब से बूढ़े को सुब्रह्मण्या बनाते हैं। इस प्रकार वह सब वेदी को प्रसन्न करता है। इस पर पूछते हैं कि उसको दक्षिणा में बैल क्यों दिया जाता है ? बैल नर होता है और सुब्रह्मण्या स्त्री होती है।' इस प्रकार मिथुन हो जाता है। मिथुन से संतान उत्पन्न करने के लिये । अग्नीध्र पात्नीवत ग्रह के लिये याज्य मंत्र धीरे धीरे पढ़ता है। पात्नीवत वीर्य ( रेत ) है। और वीर्य सिंचन धीरे धीरे होता है। वह अनुवषट्कार नहीं करता । अनुवषट्कार विराम ( संस्था ) है। वह अनुवषट्कार इसलिये नहीं करता कि वीर्य- सिंचन में विराम न हो। वही वीर्य उत्पत्ति करता है जिसके सिंचन में विराम न हो। नेष्टा के पास बैठकर खाता है। नेष्टा पत्नियों का भाजन होता है। अग्नि पत्नियों में सन्तानोत्पत्ति के लिये वीर्य डालता है। जो इस रहस्य को समझता है वह अग्नि के द्वारा अपनी