ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपाँचवाँ अध्याय ] ३५३ नहीं। इसी प्रकार इस तरह यज्ञ करने से यज्ञ भ्रष्ट न होगा और न यजमान ही उसके साथ भ्रष्ट होगा। (८) ३४-इस पर प्रश्न उठाते हैं कि जब अध्वर्यु को दक्षिणा दी जाती है तो यजमान समझता है कि इसने मेरे बजाय मेरे ग्रहों को थामा। परिक्रमा की। आहुतियां दीं। इसी प्रकार जब उद्गाता को दक्षिणा दी जाती है तो यजमान समझता है कि इसने मेरे लिये गायन किया। जब होता को दक्षिणा दी जाती है तो यजमान समझता है कि इसने मेरे लिए अनुवाक्, याज्य और शस्त्र पढ़े। लेकिन ब्रह्मा ने क्या किया कि उसे दक्षिणा मिले। क्या यजमान समझता है कि इसे बिना किसी श्रम के ही दक्षिणा मिले। इसका उत्तर यह है कि यज्ञ की चिकित्सा के लिये। ब्रह्मा यज्ञ का चिकित्सक है। ब्रह्मा ब्रह्म के द्वारा यज्ञ करता है। ब्रह्म छन्दों का रस है। वह यज्ञ का आधा काम करता है, और आधा अन्य ऋत्विज् करते हैं। ब्रह्म ऋत्विजों का अध्यक्ष होता है। इसलिये यदि ऋक् में, यजुः में या साम में बे जाने या आपत्काल में भूल हो जाय तो ब्रह्मा से ही निवेदन करते हैं। इसलिये यदि ऋक् में भूल हो तो ब्रह्मा 'भूः' कहकर गार्हपत्य में आहुति दे। यदि यजुः में भूल हो तो 'भुवः' कहकर अग्नीध्रीय या अन्वाहार्यपचन अग्नि में आहुति दे। यदि साम में भूल हो तो 'स्वः' कहकर आहव- नीय अग्नि में। यदि अज्ञानवश या आपत्काल में भूल हो तो 'भूर्भुवः स्वः' कहकर आहवनीय में आहुति दे। स्तोत्र पढ़ने का आदेश मिलने पर प्रस्तोता कहता है :- "ब्रह्मन् स्तोष्यामः प्रशास्तः" 'हे हमारे नेता ब्रह्मा, हम स्तोत्र पढ़ेंगे'। इस पर ब्रह्मा प्रातःसवन में कहता है :- 'भूः ! इंद्रवंतः स्तुध्वम्" २३