भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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३५२ [ पाँचवीं पञ्चिका दूसरी से। या चमड़े या किसी चीज़ के टुकड़ों को। यह व्याहृतियां सब के लिये प्रायश्चित्त हैं। इन व्याहृतियों से ही प्रायश्चित्त करना चाहिये। ( ७ ) ३३--इस पर महावाद ( बड़े लोग ) पूछते हैं :—“जब ऋग्वेद से होता का काम किया जाता है, यजुर्वेद से अध्वर्यु का और सामवेद से उद्गाता का, और इस प्रकार त्रयीविद्या पूर्ण हो जाती है तो ब्रह्मा का काम किससे किया जाता है ?” इसका उत्तर यह है, 'त्रयी विद्या से ही'। यह जो बहता है ( पवन ) वह यज्ञ है। इसके दो मार्ग हैं एक वाणी दूसरा मन। वाणी और मन से यज्ञ किया जाता है। यह वाणी हुई। यह मन हुआ। वाणी से त्रयी विद्या द्वारा ऋत्विज लोग एक पक्ष को करते हैं। परन्तु ब्रह्मा केवल मन से काम करता है। कुछ ब्राह्मण प्रातरनुवाक की तैयारी पर स्तोम भागों को जपकर बैठ जाते हैं और बातचीत करते हैं। एक ब्राह्मण ने ब्रह्मा को प्रातरनुवाक के बाद बोलते देखकर कहा था कि इसने यज्ञ का आधा भाग लुप्त कर दिया। जैसे एक पैर से चलने वाला मनुष्य या एक पहिये से चलने वाला रथ गिर पड़ता है उसी प्रकार यज्ञ भ्रष्ट हो जाता है और उसके साथ यजमान भी भ्रष्ट हो जाता है ( यदि ब्रह्मा बोलता है क्योंकि उसे मौन रहना चाहिये )। इसलिये ब्रह्मा को प्रातरनुवाक के आदेश देने के बाद बोलना नहीं चाहिये। जब तक उपांशु और अन्तर्याम से आहुतियां न दी जायं। पवमान स्तोत्र के आदेश के बाद भी जब तक अन्त की ऋचा न बोली जाय ( मौन रहना चाहिये )। जब स्तोत्र और शस्त्र पढ़े जाते हों तब वषट्कार तक मौन रहे। जैसे दोनों पैरों से चलने वाला आदमी और दोनों पहियों से चलने वाला रथ गिरता