ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 373, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहला अध्याय ] ३५९ के सवन में ही ग्रावस्तुत किया जाता है तो दूसरे दो सवनों में ग्रावस्तुति कैसे होती है । इसका उत्तर यह है कि प्रातः सवन का सम्बन्ध गायत्री से है । इस लिये प्रातः सवन में गायत्री से स्तुति की जाती है । तीसरे सवन का संबन्ध जगती से है इसलिये तीसरे सवन में जगती से स्तुति की जाती है । इस प्रकार जो इस रहस्य को समझ कर मध्यदिन के सवन में ग्रावस्तुति करता है वह प्रातः और सायं सवनों को भी स्तुति- संपन्न कर देता है । इस पर प्रश्न करते हैं कि जब अध्वर्यु अन्य ऋत्विजों को सब अन्य कामों के लिये आदेश करता है तो ग्रावस्तुति में बिना आदेश के ही क्यों पाठ होता है ? इसका उत्तर यह है कि ग्रावः स्तोत्रीय का संबंध मन से है । मन को आदेश नहीं दिया जाता । इस लिये बिना आदेश के ही ग्रावःस्तुति की जाती है ।(२) ३—वाक् ही सुब्रह्मण्या है । सोम राजा उसका बेटा है । सोम राजा को खरीद के समय सुब्रह्मण्या को बुलाते हैं जैसे किसी गाय को बुलावें । इसी बेटे के द्वारा यजमान के लिये सब कामनायें दुही जाती हैं । जो इस रहस्य को समझता है वाणी उसकी सभी कामनाओं को पूरा कर देती है । इस पर प्रश्न करते हैं कि सुब्रह्मण्या का सुब्रह्मण्यात्व क्या है ? इसका उत्तर है कि वाक् ही सुब्रह्मण्या है । वाक् ही ब्रह्म है । वाक् सुब्रह्म है । इस पर शका है कि सुब्रह्मण्या ऋत्विज् पुरुष है । उसको स्त्री कहकर क्यों पुकारते हैं ? इसका उत्तर यह है कि वाक् ही सुब्रह्मण्या है । इसी से ।