ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३६० [ छठी पञ्चिका अब प्रश्न है कि जब अन्य ऋत्विज् सब कृत्य वेदी के भीतर करते हैं और सुब्रह्मण्या वेदी के बाहर । तो उसका किया हुआ वेदी के भीतर किया हुआ कैसे समझा जाता है ? इसका उत्तर यह है कि वेदी में एक उत्कर ( outlet, बाहर फेंकने का मार्ग ) होता है, उसमें होकर ( अनावश्यक चीजें ) बाहर फेंकी जाती हैं। उस उत्कर में खड़े होकर जो आह्वान किया जाता है वह ( वेदी के भीतर किया हुआ ही समझा जाता है )। इस पर शंका है कि उत्कर में खड़े होकर सुब्रह्मण्या क्यों पढ़ी जाती है। ( इस पर एक गाथा है ) :— ऋषियों ने एक सत्र किया था। उनमें जो सबसे बूढ़ा था उस से वे बोले, “सुब्रह्मण्या को बुला । हम में से तू देवतों के निकटतम होकर बुलायेगा ( बूढ़ा होने से तू देवों के निकट है ) इस लिये सब से बूढ़े को सुब्रह्मण्या बनाते हैं। इस प्रकार वह सब वेदी को प्रसन्न करता है। इस पर पूछते हैं कि उसको दक्षिणा में बैल क्यों दिया जाता है ? बैल नर होता है और सुब्रह्मण्या स्त्री होती है।' इस प्रकार मिथुन हो जाता है। मिथुन से संतान उत्पन्न करने के लिये । अग्नीध्र पात्नीवत ग्रह के लिये याज्य मंत्र धीरे धीरे पढ़ता है। पात्नीवत वीर्य ( रेत ) है। और वीर्य सिंचन धीरे धीरे होता है। वह अनुवषट्कार नहीं करता । अनुवषट्कार विराम ( संस्था ) है। वह अनुवषट्कार इसलिये नहीं करता कि वीर्य- सिंचन में विराम न हो। वही वीर्य उत्पत्ति करता है जिसके सिंचन में विराम न हो। नेष्टा के पास बैठकर खाता है। नेष्टा पत्नियों का भाजन होता है। अग्नि पत्नियों में सन्तानोत्पत्ति के लिये वीर्य डालता है। जो इस रहस्य को समझता है वह अग्नि के द्वारा अपनी