ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 377, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] ३६३ प्रातः सवन में असुर राक्षसों को भगा देते हैं। इसलिये ब्राह्मणा- च्छंसी प्रातः सवन में इन्द्र-शस्त्र पढ़ता है। बीच से हार कर असुरों ने यज्ञ के उत्तरी भाग पर आक्रमण किया। देवों ने सजग होकर इन्द्र और अग्नि को उत्तर भाग में नियत किया। उन्होंने इन्द्राग्नि की सहायता से प्रातः सवन में उत्तर की ओर से असुरों को भगा दिया। इसी प्रकार यज- मान भी इन्द्राग्नि की मदद से उत्तर की ओर से प्रातः सवन में राक्षसों को भगा देते हैं। इसलिये अच्छावाक् इन्द्राग्नि शस्त्र को प्रातः सवन में पढ़ता है। चूँकि इन्द्राग्नि के द्वारा ही देवों ने प्रातः सवन में उत्तर की ओर से असुरों को भगाया। असुर उत्तर की ओर हार कर एक लाइन में पूर्व की ओर आ डटे। देवों ने सजग होकर अग्नि को प्रातः सवन में पूर्व की ओर नियत कर दिया। उन्होंने अग्नि की सहायता से प्रातः सवन में पूर्व की ओर से असुरों को निकाल दिया। इसी प्रकार यजमान भी प्रातः सवन में पूर्व की ओर से अग्नि की मदद से असुरों को भगा देता है। इसलिये प्रातः सवन अग्नि का होता है। जो इस रहस्य को समझता है उसका पाप छूट जाता है। ये असुर पूर्व से हार कर पश्चिम की ओर यज्ञ पर आक्र- मण करने लगे। देव जग उठे और स्वयं विश्वेदेवों को पश्चिम की ओर तीसरे संवन में नियत किया। और विश्वेदेवों की मदद से उन्होंने पश्चिम की ओर से तीसरे सवन में असुरों को भगा दिया। यजमान भी विश्वेदेवों की मदद से तीसरे सवन में पश्चिम की ओर से असुरों को निकाल देते हैं। इसलिये तीसरे सवन विश्वेदेवों का है। जो इस रहस्य को समझता है उसका पाप छूट जाता है।