भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 592 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 378

३६४ [ छठी पञ्चिका इस प्रकार देवों ने समस्त यज्ञ से असुरों को अगा दिया । इस प्रकार देव असुरों के अधिपति हो गये। जो इस रहस्य को समझता है वह स्वयं ही शत्रुओं पर विजय पा जाता है और पाप से छूट जाता है। इस प्रकार यज्ञ करके देवों ने असुरों को हरा दिया और पापों से छूट कर स्वर्ग को प्राप्त हुये। जो इस रहस्य को समझता है वह इस प्रकार यज्ञ को तान कर अपने शत्रु को हरा देता है, पाप से छूट जाता है और स्वर्ग को प्राप्त होता है। (१) ५-प्रातः सवन में (अगले दिन के) स्तोत्रिय को (पिछले दिन के) अनुरूप करते हैं। इस प्रकार एक दिन को दूसरे दिन का अनुरूप करते हैं। पहले दिन के कृत्य के अनुकूल पिछले दिन के कृत्य को आरंभ करते हैं। मध्य दिन में ऐसा नहीं करते। (मध्यदिन के) पृष्ठ श्री हैं। (मध्यदिन के पृष्ठों का) उसके लिये वह स्थान नहीं है (जो प्रातः सवन का है) कि स्तोत्रिय उनको पहले दिन का अनुरूप करे। इसी प्रकार तीसरे सवन में भी एक स्तोत्रिय को दूसरे का अनुरूप नहीं करते। (२) ६-अब आरंभ करते हैं :- ऋजुनीती नो वरुणो……( ऋ० १।६०।१ ) से मित्रा वरुण शस्त्र का आरंभ होता है। इसके दूसरे पद में आया है “मित्रो नयतु विद्वान्” (विद्वान् मित्र हमारा नेता हो)। मैत्रावरुण होत्रकों का प्रणेतृ है। इसलिये यही ऋचा प्रणेतृ है। इन्द्रं वो विश्वतस्परि……(ऋ० १।७।१० ) इससे 'ब्राह्मणाच्छंसि' का आरंभ होता है। इसमें आया है “हवामहे जनेभ्यः” (हम इन्द्र को लोगों के लिये बुलाते हैं)। इस प्रकार वे इन्द्र को हर रोज बुलाते हैं।