ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 379, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय ] ३६५ यदि इस प्रकार समझकर 'ब्राह्मणाच्छंसी' हर रोज़ इन्द्र का आह्वान करता है तो कोई अन्य इन्द्र को ले नहीं जा सकता । 'यत् सोम आसुते नर' ( ऋ० ७।६४।१० ) यह अच्छावाक् का मंत्र है । इसमें "इंद्राग्नी अजोहवुः" ( इन्द्राग्नी को उन्होंने बुलाया ) ऐसा पद आया है । इस प्रकार इन्द्राग्नी को उन्होंने हर रोज़ बुलाया । जब अच्छावाक् रोज़ इसको बुलाता है तो कोई और इन्द्राग्नी को ले नहीं जा सकता । यह ऋचायें नावें हैं जो स्वर्गलोक के किनारे तक पहुँचा देती हैं। इन से यजमान इन लोकों को तरके स्वर्ग लोक को पहुँच जाते हैं । (३) ७—अब इन के अन्त के मंत्र कहते हैं :— ते स्याम देव वरुण...( ऋ० ७।६६।६ ) यह मैत्रावरुण का परिधानीय या अन्त का मंत्र है। इसमें एक पद आया है "इषं स्वश्चधीमहि", ( हम अन्न और प्रकाश धारण करें ) । इससे वे दोनों लोकों को प्राप्त करते हैं । अन्न से यह लोक और प्रकाश ( स्वः ) से दूसरा लोक । “व्यंतरिक्षमतिरद्” ( ऋ० ८।१४।७-६ ) यह तीन ऋचायें विवृत हैं । इन से ब्राह्मणाच्छंसी स्वर्ग के द्वार खोल देता है । “अत्यंतरिक्षमतिरन्मदे सोमस्य रोचना । इंद्रो यदभिनद्वलम्” (ऋ० ८।१४।७ ) ( इंद्र ने सोम के मद में सूराख को खोल दिया और प्रकाश आने दिया ) इससे दीक्षित लोगों का जोश प्रकट होता है। इसीलिये इस ऋचा को बलवती ( बलवाली । इस मंत्र में 'वल' शब्द है 'बल' नहीं ) कहते हैं ।