भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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दूसरा अध्याय ] ३६७ को और एकाहिकों को, अग्निष्टोम को और संवत्सर को दोनों को थामे हुये चलता है । तीसरे सवन में होत्रकों के परिधानीय मंत्र “एकाहिक” ही होते हैं । “एकाहः” प्रतिष्ठा हैं, इस प्रकार अन्त को यज्ञ को प्रतिष्ठावान् करता है । प्रातः सवन में याज्य मंत्रों को लगातार ( अनवानं ) पढ़े । एक या दो स्तोम अधिक न पढ़े । यह ऐसा ही है जैसे किसी भूखे प्यासे को झट खाना पानी दे देवे । यह सोचकर कि मैं देवों को जल्दी से भोजन दे दूँ गा वह इस लोक में प्रतिष्ठित हो जाता है । पिछले दो सवनों में अपरिमित मंत्र पढ़े । स्वर्ग लोक अपरिमित है । स्वर्गलोक की प्राप्ति के लिये । जो मंत्र होत्रकों ने पहले दिन पढ़े उन्हीं को यदि चाहे तो पढ़े । या जिनको होता ने पढ़ा उन्हीं को होत्रक पढ़े । होता प्राण है । होत्र का अंग हैं । एक ही प्राण का अंगों में संचार है । इसलिये चाहे तो होता वही मंत्र पढ़े जो होत्रकों ने पहले दिन पढ़े थे । या जो होता ने पढ़े उनको होत्रक पढ़े । तृतीय सवनों में होत्रक जो परिधानीय मंत्र पढ़ते हैं उन्हीं सूक्त के अन्तिम मंत्रों से होता समाप्त करता है । होता आत्मा है । होत्रक अंग हैं । अंगों के अन्त समान होते हैं । इसीलिये तीसरे सवन में होत्रकों के परिधानीय मंत्र समान ही होते हैं ॥५॥ ऐतरेय ब्राह्मण की छठी पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ ।