ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 382, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ेंतीसरा अध्याय १—आत्वा वहंतु हरय......( ऋ० १।१६।१ ) इस सूक्त को मैत्रावरुण प्रातः सवन में पढ़ता है । जब सोम के प्यालों को उठाते हैं । इस सूक्त के मंत्रों में वृषन्, पीत, सुत, मद, शब्द आते हैं । इसलिये इनमें रूपसमृद्धता है । यह इन्द्र के मंत्र हैं । यज्ञ इन्द्र का है । गायत्री पढ़ता है । प्रातः सवन गायत्री का है । प्रातः सवन में नौ मंत्र ( "न्यून" दस से एक कम ) पढ़े जाते हैं । वीर्य भी 'न्यून' अर्थात् तंग अवकाश में सींचा जाता है । मध्य दिन में दस मंत्र पढ़ता है । क्योंकि जो वीर्य 'न्यून' स्थान में सींचा गया था वह स्त्री के मध्य भाग में पहुँच कर बड़ा हो जाता है । तीसरे सवन में नौ ( "न्यून", दस से एक कम ) मंत्र पढ़ता है । क्योंकि 'न्यून' अर्थात् तंग जगह से ही बच्चे पैदा होते हैं । जब पूरे २ सूक्त पढ़े जायँ तो यजमान को यज्ञ की योनि से गर्भ रूप में उत्पन्न करता है । कुछ लोग सात सात मंत्र पढ़ते हैं । सात प्रातःसवन में, सात मध्यसवन में और सात तीसरे सवन में । जितने पुरोनु- ( ३६८ )