भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पृष्ठ 383

तीसरा अध्याय ] ३६९ वाक्य हों उतने ही याज्य हों। सात होता सामने मुख करके याज्य पढ़ते और वषट् करते हैं। वे कहते हैं कि वे सात मंत्र इन सात याज्यों के पुरोनुवाक्य हैं। लेकिन होता ऐसा न करे, क्योंकि इससे यजमान का वीर्य लुप्त हो जाता है और यजमान भी। यजमान सूक्त है। मैत्रावरुण नौ मंत्रों से यजमान को इस लोक से अन्तरिक्ष को ले जाता है और दसवें मंत्र से अन्तरिक्ष से भी ऊपर। क्योंकि अन्तरिक्ष लोक ज्येष्ठ है। उस लोक से नौ मंत्रों द्वारा स्वर्गलोक को ले जाता है। जो सात ही मंत्र पढ़ते हैं वे यजमान को स्वर्ग लोक में ले जाना नहीं चाहते। इसलिये पूरे पूरे सूक्त पढ़ने चाहियें। (१) १०—इस पर प्रश्न करते हैं। जब यज्ञ इन्द्र का ही है तो केवल होता और ब्राह्मणाच्छंसी ही प्रातःसवन में प्रस्थित सोम के लिये ऐसे याज्य क्यों पढ़ते हैं जिनमें प्रत्यक्ष रूप से इन्द्र का वर्णन हो। होता का याज्य है :— इदं ते सौम्यं मधु (ऋ० ८।६५।८ ) और ब्राह्मणाच्छंसी का :— इन्द्र त्वा वृषभं वयम् (ऋ० ३।४०।१ ) जो इतर ऋत्विज् नाना देवतों के लिये पढ़ते हैं वह इन्द्र के मंत्र कैसे हो जाते हैं ? (प्रश्न का आशय यह है कि 'इन्द्र' अन्य याज्यों में क्यों नहीं ? केवल दो याज्यों में ही क्यों है ? इसका उत्तर देते हैं ) । मैत्रावरुण का याज्य है :— मित्रं वयं हवामहे (ऋ० १।२३।४ ) परन्तु इसी में एक पद है "वरुणं सोम पीतये"। जहाँ किसी पद में 'पीत' शब्द आता है वहाँ इन्द्र की ओर संकेत होता है क्योंकि इस पद से इन्द्र को प्रसन्न करते हैं। २४