भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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३८० [ छठी पञ्चिका विचरता है ) । इस प्रकार यज्ञ के सब दिनों में इन्द्र के विचरने से समानता या सिलसिला हो जाता है । ( १ ) १८—इन संपात सूक्तों का सबसे पहला ऋषि ( दृष्टा ) विश्वामित्र हुआ । विश्वामित्र के देखे हुये उन मंत्रों को वाम- देव ने फैलाया ( असृजत ) । यह सूक्त यह हैं :-- एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्......( ऋ० ४।१६ ) यन्न इन्द्रो जुजुषेयच्च वष्टि......( ऋ० ४ । २२ ) कथा महामवृधत् कस्य होतुः ( ऋ० ४।२३ ) उसने झट उनका पीछा किया ( समपतत् ) और अपने शिष्यों को पढ़ाया । इसलिये उनका संपात सूक्त नाम पड़ गया । ( समपतत् का अर्थ है मंत्रों को देखकर शिष्यों को पढ़ाना ) । विश्वामित्र ने इन संपात सूक्तों को देखा और कहा कि मेरे देखे हुये मंत्रों को वामदेव ने फैला दिया । मैं इन सूक्तों के प्रतिमान के लिये ऐसे ही अन्य सूक्त बना दूँ । इसलिये उसने यह सूक्त प्रतिमान रूप बना दिये :— सद्यो ह जातो वृषभः ( ऋ० ३।४८ ) इन्द्रः पूर्भिदातिरत् ( ऋ० ३।३४ ) इमामु षु प्रभृतिम् ( ऋ० ३।३६ ) इच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखायः ( ऋ० ३।३० ) शासद् वह्नि र्दुहितुः ( ऋ० ३।३१ ) अभितष्टेव दीधया मनीषा ( ऋ० ३।३८ ) दूसरे संपात सूक्त यह हैं :— भरद्वाज का सूक्त—य एक इद्धव्यः ( ऋ० ६।२२ ) वशिष्ठ के दो सूक्त अर्थात् यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम ( ऋ० ७।१९ ) उदु ब्रह्माण्यैरत......( ऋ० ७।२३ ) नोधा का सूक्त :—