भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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चौथा अध्याय ] ३८१ अस्मा इदु प्रतवसे तुराय... ऋ० १।६१ ) यह लोग ( मैत्रावरुण, ब्राह्मणाच्छंसी और अच्छावाक ) षडह के प्रातःसवन में स्तोत्रियों के पढ़ने के बाद मध्य सवन में अहीन सूक्तों को पढ़ते हैं । यह सूक्त यह हैं :— आसत्यो यातुमथवाँ ऋजीषी...( ऋ० ४।१६ ) क्योंकि मित्रावरुण सत्य वाला है । ब्राह्मणाच्छंसी पढ़ता है :— अस्मा इदु प्र तवसे तुराय...( ऋ० १।६१ ) इस सूक्त में "इन्द्राय ब्रह्मणा राततम" शब्द आये हैं । और "इंद्र ब्रह्माणि गोतमासो अक्रन्..." इसमें 'ब्रह्म' शब्द आया है । अच्छावाक यह सूक्त पढ़ता है :— शासद् वह्निर्जन यंत वह्निम् । इसमें "वह्नि" ( नेता ) शब्द आया है । इस पर प्रश्न होता है :—कि अच्छावाक "वह्नि" वाले इस सूक्त को दोनों प्रकार के दिनों में क्यों पढ़ता है । 'परांचि' दिनों में भी और 'अभ्यावर्त्ति' दिनों में भी । ( एक सत्र में दो प्रकार के दिन होते हैं । एक तो अकेले दिन जिनको 'परांचि' कहते हैं । दूसरे 'षडह' आदि जो बारबार आते हैं । इनको 'अभ्यावर्त्ति' कहते हैं) । इसका उत्तर यह है कि वह वृ च ऋत्विज वीर्यवान होता है । यह सूक्त 'वह्नि' वाला है । 'वह्नि' वह है जो अगुआ हो ( वहति ) । 'वह्नि' उस घोड़े को भी कहते हैं जो धुरे को खींचता है जिसमें वह जुता होता है । इसलिये अच्छावाक इन सूक्तों को दोनों प्रकार के दिनों में पढ़ता है अर्थात् 'परांचि' दिनों में भी और 'अभ्यावर्त्ति' दिनों में भी ।