ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 418, कुल 592 में से
संदर्भ में पढ़ें४०४ [ छठी पञ्चिका का होता बनने से इनकार करे तो केवल दो कारणों से, एक यह कि वह किसी अन्य यज्ञ में संलग्न हो, दूसरे यह कि वह यज्ञ के अयोग्य हो। (८) ३५—इसलिये अंगिरसों ने आदित्यों को यज्ञ में मदद दी। आदित्यों ने अगिरसों को दक्षिणा से पूर्ण पृथिवी दी। परन्तु जब उन्होंने यह पृथिवी ली तो उसने इनको तपा डाला। इसलिये उन्होंने उसे फेंक दिया। वह सिंहनी होकर मुँह खोलकर आदमियों को खाने दौड़ी। पृथिवी की इस जलती हुई दशा से ऊँचे नीचे गार पड़ गये, पहले यह समतल थी। इसी लिये कहते हैं कि अस्वीकृत की हुई दक्षिणा को न लेवे। उसे सोचना चाहिये कि जिस दक्षिणा को अग्नि ने वेध दिया वह मुझे क्यों न वेधेगी? यदि दक्षिणा ले भी तो उसे शत्रु को दे देवे। वह हार जायगा क्योंकि यह उसको जला देती है। यह सूर्य सफेद घोड़ा बन कर काठी और लगाम से युक्त होकर अन्य आदित्यों के पास आया। उन्होंने कहा, “इसको आपको (अंगिरसों को) दे देवें।” इस लिये देवनीथ मन्त्र (जो देवों से ले जाया गया) पढ़े जाते हैं। “हे जरितः (स्तुति करने वाले), आदित्य, लोग अंगिरा लोगों के पास दक्षिणा लाये। हे जरितः, वे इसके पास तक न गये”। (अथर्व० २०।१३५।६) अर्थात् पृथिवी के पास न गये। “हे जरितः वे उसके पास गये।” अर्थात् उस घोड़े के पास गये। “हे जरितः, उन्होंने इसको ग्रहण न किया”, अर्थात् पृथिवी को। “उन्होंने उसको ग्रहण किया, हे जरितः”। (अथर्व० २०।१३५।७) अर्थात् उस घोड़े को।