भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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पाँचवाँ अध्याय ] ४०५ "अहानेतरसं न वि चेतनानि" (अथर्व० २०।१३५।७) "जब उन्होंने सूर्य को ले लिया तो दिन न रहे", क्योंकि दिन तो सूर्य से ही बनते हैं । "यज्ञानेतरसं पुरोगवामः" (अथर्व० २०।१३५।७) "जब सूर्य्य चला गया तो लोग बिना नेता के रह गये । क्योंकि दक्षिणा यज्ञ की नेता है । जैसे बिना अगुआ बैल के गाड़ी में गड़बड़ हो जाती है इसी प्रकार बिना दक्षिणा के यज्ञ में गड़बड़ हो जाती है । इसलिये कहते हैं कि दक्षिणा अवश्य हो, चाहे थोड़ी ही क्यों न हो । उत श्वेतं आशुपत्वा । (अथर्व० २०।१३५।८) "यह घोड़ा सफेद और जल्दी चलने वाला है" । उतो पद्भिर्यविष्ठः । (अथर्व० २०।१३५।८) "और पैरों का बहुत तेज है" । उतेमाशु मानं पिपर्ति (अथर्व० २०।१३५।८) "वह शीघ्र काम को पूरा करता है" । "आदित्या रुद्रा वसवस्तवेनु" (अथर्व वे० २०।१३५।६) "आदित्य, रुद्र और वसु इसकी स्तुति करते हैं' । इदं राधः प्रतिगृह्णीह्यङ्गिरः ।* (अथर्व० २०।१३५।६) "हे अंगिरा लोगो, इस दक्षिणा को ग्रहण करो" । उन्होंने उसको लेने की इच्छा की । इदं राधो बृहत्पृथु । (अथर्व० २०।१३५।६) यह दक्षिणा बहुत बड़ी और विस्तृत है । देवा ददत्वासुरं । तद्वो अस्तु सुचेतनम् । युष्माँ अस्तु दिवे दिवे । *कहीं कहीं किञ्चित् पाठभेद है ।