ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)
Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation
महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा
स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४०६ [छठी पञ्चिका प्रत्येवगृभायत । (अथर्व० २०।१३५।१०) "यह जो देवों ने दी है। यह तुम्हारे लिये प्रकाशदायक हो। तुम्हारे लिये यह प्रति दिन हो। इसको ग्रहण करने के लिये राज़ी हूजिये"। इस देवनीथ को पद पद पर ठहर कर पढ़ता है जैसे निविद् पढ़ा जाता है। इसके अन्त के पद पर 'ओ३म्' कहते हैं जैसे निविद् के साथ। अब वह भूतेच्छद मन्त्रों (अथर्व० २०।१३५।११-१३) को पढ़ता है। इन भूतेच्छद मन्त्रों द्वारा देवों ने युद्ध और माया (चालाकी) से असुरों को हरा दिया। उन्होंने इन भूतेच्छदों से असुरों की शक्ति को मंद कर दिया और उनको परास्त कर दिया। इसी प्रकार यजमान भूतेच्छद मन्त्रों से शत्रुओं की शक्ति को मंद करके उनको परास्त कर देते हैं। उनको आधा मन्त्र करके पढ़ते हैं, प्रतिष्ठा के लिये। अब आहनस्या मन्त्रों को पढ़ता है। आहनस्य अर्थात् उपस्थ इन्द्रिय से वीर्य निकलता है और वीर्य से सन्तान होती है। इस प्रकार यजमान के लिये संतान को धारण कराता है। यह दस मन्त्र हैं। दश अक्षर का विराट् छन्द है। विराट् अन्न है। अन्न से वीर्य सींचा जाता है। वीर्य से संतान होती है। इस प्रकार वह संतान को धारण कराता है। उनको न्यूङ्ख की रीति से पढ़ता है। क्योंकि न्यूङ्ख अन्न है। अन्न से वीर्य होता है। वीर्य से सन्तान होती है। इस प्रकार यजमान को सन्तान युक्त करता है। दधिक्रावन मन्त्र को पढ़ता है :- दधिक्राव्णो अकारिषम् (अथर्व० २०।१३७।३) दधिक्रा देवों को पवित्र करने वाला है। क्योंकि उसने सबसे उत्तम वीर्य वाले शब्द कहे (अथर्व० २०।१३६।१-१०)