भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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४१६ [ सातवीं पञ्चिका रूप में पृथिवी पर मनुष्यों के पास आवे । वहाँ से मुझे धन मिले । अब वह नीचे का विष्णु और वरुण का मंत्र पढ़े :-- ययोरोजसा स्कभिता रजांसि ( अथर्व० ७।२५।१ ) क्योंकि यज्ञ में जो बुराई है उसकी विष्णु रक्षा करता है और जो भलाई है उसकी वरुण । उन दोनों की शान्ति के लिये । यही प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि जब हवि को तैयार करके अध्वर्यु आहव- नीय अग्नि में पूर्व की ओर ले जाता है तो उस समय यदि हवि गिर जाय या उबल कर निकल जाय तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? यदि वह अपना मुँह पीछे को करेगा तो यज- मान को स्वर्ग से विमुख कर देगा । इससे कोई दूसरा ही उसके लिये उस गिरी हुई हवि को इकट्ठा करके यथा क्रम आहुतियाँ दे देवे । यही उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि यदि स्रुक् टूट जाय तो क्या प्रायश्चित्त है ? दूसरा स्रुक् ले और उससे आहुति दे । तब टूटे हुये स्रुक् को आहवनीय अग्नि में छोड़ दे, हस्ता आगे को और प्याली पीछे को । यह उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि अगर आहवनीय की अग्नि ही जलती हो, गार्हपत्य की बुझ गई हो तो क्या प्रायश्चित्त है ? अगर आहव- नीय के पूर्व भाग को गार्हपत्य के लिये ले आवे तो अपनी प्रतिष्ठा खो देगा । यदि पश्चिमी भाग ले आवे तो असुरों के समान यज्ञ करेगा । यदि फिर अग्नि उत्पन्न करे तो यजमान के लिये शत्रु बनावेगा । यदि बुझावे तो यजमान के प्राण चलें जायँ । इसलिये सम्पूर्ण आहवनीय अग्नि को लेकर उस में गार्हपत्य की राख मिला कर गार्हपत्य अग्नि में रख देवे । फिर पूर्व भाग को आहवनीय में रख देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है । (४)