भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

४१६ [ सातवीं पञ्चिका रूप में पृथिवी पर मनुष्यों के पास आवे । वहाँ से मुझे धन मिले । अब वह नीचे का विष्णु और वरुण का मंत्र पढ़े :-- ययोरोजसा स्कभिता रजांसि ( अथर्व० ७।२५।१ ) क्योंकि यज्ञ में जो बुराई है उसकी विष्णु रक्षा करता है और जो भलाई है उसकी वरुण । उन दोनों की शान्ति के लिये । यही प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि जब हवि को तैयार करके अध्वर्यु आहव- नीय अग्नि में पूर्व की ओर ले जाता है तो उस समय यदि हवि गिर जाय या उबल कर निकल जाय तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? यदि वह अपना मुँह पीछे को करेगा तो यज- मान को स्वर्ग से विमुख कर देगा । इससे कोई दूसरा ही उसके लिये उस गिरी हुई हवि को इकट्ठा करके यथा क्रम आहुतियाँ दे देवे । यही उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि यदि स्रुक् टूट जाय तो क्या प्रायश्चित्त है ? दूसरा स्रुक् ले और उससे आहुति दे । तब टूटे हुये स्रुक् को आहवनीय अग्नि में छोड़ दे, हस्ता आगे को और प्याली पीछे को । यह उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि अगर आहवनीय की अग्नि ही जलती हो, गार्हपत्य की बुझ गई हो तो क्या प्रायश्चित्त है ? अगर आहव- नीय के पूर्व भाग को गार्हपत्य के लिये ले आवे तो अपनी प्रतिष्ठा खो देगा । यदि पश्चिमी भाग ले आवे तो असुरों के समान यज्ञ करेगा । यदि फिर अग्नि उत्पन्न करे तो यजमान के लिये शत्रु बनावेगा । यदि बुझावे तो यजमान के प्राण चलें जायँ । इसलिये सम्पूर्ण आहवनीय अग्नि को लेकर उस में गार्हपत्य की राख मिला कर गार्हपत्य अग्नि में रख देवे । फिर पूर्व भाग को आहवनीय में रख देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है । (४)

अनुवाक्य यह है :-

दूसरा अध्याय ] ४१७ ६-अब प्रश्न है कि यदि किसी अग्निहोत्री की अग्नि में से अग्नि ले लें तो उसका क्या प्रायश्चित्त है ? अगर पास दूसरी अग्नि दिखाई पड़े तो उस अग्नि को पहले की जगह पर रख दे। यदि न दिखाई पड़े तो 'अग्नि अग्निवत्' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश देवे। इसके लिये याज्य मंत्र यह है :- अग्निना अग्निः समिध्यते (ऋ० १।१२।६) अनुवाक्य यह है :- त्वं ह्यग्ने अग्निना...(ऋ० ८।४३।१४) या बिना याज्य और अनुवाक के केवल "अग्नये अग्नवते स्वाहा" कहकर घी की आहुति आहवनीय अग्नि में दे दे। यही इसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि अगर किसी की आहवनीय और गार्हपत्य अग्नियां मिल जायँ तो क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्निनीति' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश दे। उसका याज्य यह है :- अग्न आ याहि वीतये...(ऋ० ६।१६।१०) अनुवाक्य यह है :- यो अग्निं देववीतये...(ऋ० १।१२।६) या केवल 'अग्नये वीतये स्वाहा' से आहवनीय में आहुति दे दे। अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री की तीनों अग्नियां आपस में मिल जायँ तो इसका क्या प्रायश्चित्त है। वह अग्नि विविचि के लिये आठ कपालों का पुरोडाश देवे। उसका याज्य यह है :- स्वर्णा वस्तोरुषसामरोचि...(ऋ० ७।१०।२) अनुवाक्य यह है :- त्वामग्ने मानुषी रीङते विशः...(ऋ० ५।८।३) २७

४१८ [सप्तम पञ्चिका या केवल 'अग्नये विविचये' से आहवनीय में घी की आहुति दे देवे। यही इसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि यदि किसी की अग्नियां दूसरे की अग्नियों में मिल जायें तो क्या प्रायश्चित्त है ? "क्षामवत् अग्नि" के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे, उसका याज्य मन्त्र यह है :— अक्रन्ददग्निः स्तनयन्निव द्यौः...(ऋ० १०।४५।४) अनुवाक्य यह है :— अधा यथा नः पितरः परासः...(ऋ० ४।२।१६) या केवल 'अग्नये क्षामवते स्वाहा' से आहवनीय में घी की आहुति दे देवे। यही इसका प्रायश्चित्त है। (५) ७—अब प्रश्न है कि यदि किसी की अग्नियां गाँव की अग्नि के साथ जल उठें तो क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि संवर्ग' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनाये, उसका याज्य यह है :— कुवित् सु नो गविष्टये...(ऋ० ८।७५।११) अनुवाक्य यह है :— मा नो अस्मिन्महाधने...(ऋ० ८।७५।१२ या केवल 'अग्नये संवर्गाय स्वाहा' से आहवनीय अग्नि में घी की आहुति देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि यदि किसी की अग्नियां दिव्य अग्नि से मिल जायें तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि अप्सुमत्' के लिये आठ कपाल का पुरोडाश बनावे। याज्य मंत्र यह है— अप्स्वग्ने सधिष्टव...(ऋ० ८।४३।६) अनुवाक्य यह है :— मयो दधे मेधिरःपूतदक्षो...(ऋ० ३।१।३)

दूसरा अध्याय ] ४१९ या केवल 'अग्नये अप्सुमते स्वाहा' से आहवनीय अग्नि में घी की आहुति दे दे। यही उसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि जब अग्निहोत्री की अग्नियाँ लाश की अग्नि से मिल जायें तो क्या प्रायश्चित्त है ? 'अग्नि शुचि' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनाये ! उसका याज्य मंत्र यह है :- अग्निः शुचिव्रततमः... ( ऋ० ८।४४।२१ ) अनुवाक्य यह है :- उदग्ने शुचयस्तव... ( ऋ० ८।४४।१७ ) या केवल 'अग्नये शुचये स्वाहा' से आहवनीय में घी की आहुति दे देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि जिसकी अग्नियाँ अरण्य की अग्नि से मिल जावें उसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह अरणियों से उस को पकड़ ले। और यदि संभव न हो तो आहवनीय या गार्हपत्य से एक जलती लकड़ी ले, और बचा रक्खे। यदि यह भी संभव न हो तो 'अग्नि संवर्ग' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनाये और ऊपर दिये याज्य और अनुवाक्यों का प्रयोग करे। या 'अग्नये संवर्गाय स्वाहा' से घी की एक आहुति दे देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है। (६) ८-अब प्रश्न यह है कि यदि उपवास के दिन अग्निहोत्री हवि पर आँसू बहा दे तो क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि व्रत- भृत्' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे। उसका याज्य यह है :- त्वमग्ने व्रतभृच्छुचि... ( आश्व० ३।११ ) अनुवाक्य यह है :- व्रतानि विभ्रद् व्रतपा अदब्ध... ( आश्व० ३।११ )

४२० [ सप्तम पञ्चिका या 'अग्नये व्रतभृते स्वाहा' से आहवनीय में घी की एक आहुति दे दे । यही उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री उपवास के दिन व्रत के विरुद्ध कोई कार्य्य करे तो उसका प्रायश्चित्त क्या है ? वह 'अग्नि व्रतपति' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनाये । उसका याज्य मंत्र यह है :— त्वमग्ने व्रतपा असि...( ऋ० ८।११।१ ) अनुवाक्य यह है :— यद्बो वयं प्रमिनाम व्रतानि...( ऋ० १०।२।४ ) या केवल 'अग्नये व्रतपतये स्वाहा' से आहवनीय में घी की आहुति दे देवे । यही उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न यह है कि यदि अग्निहोत्री अमावस्या या पूर्ण- मासी का यज्ञ छोड़ जावे तो इसका क्या प्रायश्चित्त है । वह 'अग्नि पथिकृत' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे । इसका याज्य मंत्र यह है :— वेत्था हि वेधो अध्वनः ( ऋ० ६।१६।३ ) अनुवाक्य यह है :— आ देवानामपि पंथा अगन्म...( ऋ० १०।२।३ ) या केवल 'अग्नये पथिकृते स्वाहा' से आहवनीय में घी की एक आहुति देवे । यही उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि यदि किसी अग्निहोत्री की तीनों अग्नियां बुझ जावें तो उसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि तपस्वत् जनद्वत् पावकवत्' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे । उसकी याज्य आहुति यह है :— आयाहि तपसा जनेषु ( आश्व० ३।११ ) अनुवाक्य यह है :— आ नो याहि तपसा जनेषु ( आश्व० ३।११ )

• दूसरा अध्याय ] ४२१ या 'अग्नये तपस्वते जनद्वते पावकवते स्वाहा' से आहवनीय में घी की एक आहुति देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है। (७) ९—अब प्रश्न है कि यदि कोई अग्निहोत्री आग्रायण इष्टि में आहुति दिये बिना नया अन्न खाले तो उसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह "अग्नि वैश्वानर" के लिये दस कपालों का पुरोडाश बनावे। उसका याज्य यह है :— वैश्वानरो अजीजनत् पृष्टो दिविऴ अनुवाक्य यह है :— पृष्टो अग्निः पृथिव्याम् (ऋ० १।९८।२ ) या 'अग्नये वैश्वानराय स्वाहा' से आह्वनीय में घी की एक आहुति दे देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि यदि पुरोडाश का कपाल टूट जाय तो क्या प्रायश्चित्त है ? वह अश्विनों के लिये दो कपालों में पुरो- डाश बनावे। याज्य यह है :— आश्विना वर्तिरस्मदा...( ऋ०. १।९२।१६ ) अनुवाक्य यह है :— आ गोमतानासत्यारथेन...( ऋ० ७।७२।१ ) या 'अश्विभ्यां स्वाहा' से आहवनीय में घी की आहुति दे देवे। यही उसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री का पवित्रा (कुश) खो जाय तो उसका क्या प्रायश्चित्त है। वह "अग्नि पवित्रवत्" के लिये आठ कपालों का पुरोडाश दे। याज्य मंत्र यह है :— पवित्रं ते विततं ब्रह्मणस्पते...( ऋ० ९।८३।१ ) अनुवाक्य यह है :— ऴ यह मन्त्र कहाँ का है, पता नहीं ।

४२२ [ सातवीं पञ्चिका तपोष्पवित्रं विततं दिवस्पदे...( ऋ० ९।८३।१ ) या “अग्नये पवित्रवते स्वाहा” से आहवनीय में घी की एक आहुति देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री का सोना ( हिरण्य ) खो जाय तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह ‘अग्नि हिरण्यवत्’ के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे । उसका याज्य मंत्र यह है : - हिरण्यकेशो रजसो विसारे...( ऋ० १।७६।१ ) अनुवाक्य यह है :— आ ते सुपर्णा अमिनन्त एवैः...( ऋ० १।७६।२ ) या ‘अग्नये हिरण्यवते स्वाहा’ से आहवनीय में घी की एक आहुति देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री प्रातःकाल स्नान किये बिना अग्निहोत्र करे तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह अग्नि वरुण के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे । याज्य मंत्र यह है :— त्वं नो अग्ने वरुणस्य विद्वान्...( ऋ० ४।१।४ ) अनुवाक्य यह है :— स त्वं नो अग्नेऽवमो भवोती...( ऋ० ४.१।५ ) या ‘अग्नये वरुणाय स्वाहा” से आहवनीय अग्नि में एक आहुति दे । यही इस का प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री सूतका स्त्री का पकाया अन्न खा ले तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? ‘अग्नि तन्तुमत्’ के लिये आठ कपालों का पुरोडाश दे । उसका याज्य मंत्र यह है :—

दूसरा अध्याय ] ४२३ तं तुं तन्वन् रजसो...( ऋ० १०।५३।६ ) उसका अनुवाक्य यह है :— अन्नानद्दो नद्यतनोत सोमा...( ऋ० १०।५३।७ ) या "अग्नये तन्तुमते स्वाहा" से ही आह्वनीय में घी की आहुति दे दे । इसका यही प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न यह है कि यदि कोई अग्निहोत्री अपने जीवन- काल में किसी को सुने कि वह उसे मरा बताता है तो इसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि सुरभिमत्' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश देवे । उसका याज्य मंत्र है :— अग्निर्होतान्यसीदत्...( ऋ० ५।१।६ ) और अनुवाक्य यह है :— ऊर्ध्वामकृद्देववीतिं नो अद्य ( ऋ० १०।५३।३ ) या 'अग्नये सुरभिमते स्वाहा' से आहवनीय अग्नि में आहुति देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि यदि किसी अग्निहोत्री की स्त्री या गाय जुड़वाँ बच्चे दे तो इसका क्या प्रायश्चित्त है । वह 'अग्नि मरुत्वत्' के लिये तेरह कपालों का पुरोडाश बनावे । उसका याज्य मंत्र यह है :— मरुतो यस्य हि क्षये...( ऋ० १।८६।१ ) और अनुवाक्य यह है :— अरा इवेदचरमा अहेव...( ऋ० ५।५८।५ ) या केवल 'अग्नये मरुत्वते स्वाहा' से आहवनीय में घी की आहुति देवे । यही इसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि अपत्नीक ( जिसकी स्त्री मर गई हो ) अग्निहोत्री आहुतियाँ दे या न दे । उसे देना चाहिये । अगर न देगा तो 'अनद्धा' कहलायेगा । अनद्धा कौन है ? जो न देवों

४२४ [ सातवीं पञ्चिका को आहुति दे, न पितरों को, न मनुष्यों को। इसलिये अपत्नीक भी अग्निहोत्र करे। इस विषय में एक गाथा कही जाती है :— “यजेत् सौत्रामण्यामपत्नीकोऽप्यसोमपः। माता पितृभ्यामनृणार्थं द्वि यज ।” “अपत्नीक असोमप भी सौत्रामणि में यज्ञ करे। माता पिता का ऋण चुकाने के लिये यज्ञ करे।” इस श्रुति के वचन से सोम यज्ञ भी करे। (८) १०—प्रश्न है कि अपत्नीक वाक् (मंत्रों से) अग्निहोत्र कैसे करे ? पत्नी के मर जाने से अग्निहोत्र का अधिकार नष्ट हो जाता है। फिर वह कैसे अग्निहोत्र करे ? एक मनुष्य के इस लोक में और उस लोक में भी पुत्र, पौत्र और नाती होते हैं। यह लोक ही स्वर्ग लोक है (अर्थात् इस लोक के यज्ञ से स्वर्ग होता है)। वह सन्तान से कहे, ‘इस स्वर्ग से मैं उस स्वर्ग को पहुँचा’। अगर (दूसरी) पत्नी की इच्छा न हो तो उसके लिये उसकी संतान यज्ञ को कायम रखती हैं। अपत्नीक अग्निहोत्र कैसे करे ? श्रद्धा पत्नी है। सत्य यजमान है। श्रद्धा और सत्य का बड़ा अच्छा जोड़ा है। श्रद्धा और सत्य के जोड़े से स्वर्गलोकों को प्राप्त करता है। (९) ११—अब प्रश्न होता है कि यदि दर्शपूर्णमास यज्ञों के उपवास के दिन (एक दिन पहले) कोई व्रत न करे तो देव हवि को नहीं खाते। इस लिये उपवास के दिन देव व्रत करें तो देव हवि को खायेंगे। पूर्णमासी के पहले भाग में उपवास करे यह पैंग्य की राय है। पिछले भाग में, यह कौषीतकि की। पूर्णमासी के पहले भाग को अनुमति कहते हैं। पिछले को राका। अमावस्या के पहले भाग को सिनीवाली, पिछले को

दूसरा अध्याय ] ४२५ कुहू । चाँद अस्त होकर फिर उदय हो इस बीच को तिथि कहते हैं । 'पूर्णमासी के पहले भाग में उपवास करे' इस बात को न मान कर अमावस्या के पिछले भाग में जब चाँद निकले तब यज्ञ करता है । उस दिन सोम को खरीदता है । इसलिये पिछले-पिछले भाग में ही उपवास करे । पिछले भाग सोम के हैं । सोम को देवता मानकर यज्ञ करता है । यह जो चन्द्रमा है वह देव सोम है । इसलिये पिछले भाग में उपवास करे । (१०) १२—अब प्रश्न है कि सूर्य के उदय या अस्त से पहले यदि अग्नि को ( गार्हपत्य से आहवनीय तक ) न ला सकें या लावे और हवन करने से पूर्व अग्नि बुझ जाय तो इसका क्या प्रायश्चित्त है । सायंकाल को ( सूर्यास्त के पश्चात् ) स्वर्ण को सामने रखकर अग्नि को ले आवे । ज्योति शुक्र है । स्वर्ण ज्योति है । सूर्य शुक्र है । मानो उसी शुक्र ज्योति को देखता हुआ अग्नि निकालता है । प्रातःकाल ( सूर्योदय के पीछे ) नीचे चाँदी रखकर अग्नि निकाल ले । क्योंकि चाँदी रात का रूप है । आहवनीय को ( गार्हपत्य से ) उस समय तक निकाल लेना चाहिये जब तक अंधेरा न हो जाय । यह जो अंधेरा या छाया है वह मृत्यु है । इस ( चाँदी की ) ज्योति से वह मृत्यु रूपी अन्धकार या छाया को तरता है । यही उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि जिसकी आहवनीय या गार्हपत्य अग्नियों पर होकर गाड़ी या रथ या घोड़ा गुज़र जाय उसका क्या प्रायश्चित्त है ? कुछ की राय है कि इसकी परवाह न करे क्योंकि यह तो उसकी आत्मा में ही रक्खी हुई होती हैं । यदि परवाह करे तो गार्हपत्य से आहवनीय तक लगातार पानी की धार इस मंत्र को बोलकर डाले :— तंतुं तन्वन् रजसो भानुमन्विहि... (ऋ० १०।५३।६)

ब्राह्मण में लिखा है जिसको लोग उद्धृत किया करते हैं।

४२६ [ सातवीं पञ्चिका यही इसका प्रायश्चित्त है। अब प्रश्न है कि अग्नियों पर समिधा रखते समय अग्नि- होत्री अन्वाहार्यपचन ( दक्षिणाग्नि ) को भी प्रज्वलित करे या न करे ? इस पर कुछ की राय है कि अवश्य करे । वह आत्मा प्राणों को रखता है जो अग्नियों को प्रज्वलित करता है, इनमें से दक्षिणाग्नि बहुत अच्छी तरह अन्न को देती हैं। इसलिये 'अग्नये अन्नादाय अन्नपतये स्वाहा' से उसमें एक आहुति देवे । जो इस रहस्य को समझता है वह अन्न खाने वाला और अन्नपति हो जाता है और संतान और अन्न से युक्त हो जाता है। अग्निहोत्र की इच्छा करने वाला गार्हपत्य और आहवनीय के बीच में चले । इस प्रकार उसको चलते देखकर अग्नियाँ समझती हैं कि यह हमारे में होम करेगा । जो इस प्रकार चलता है, दोनों अग्नियां उसके पाप को दूर कर देती हैं। जिसका पाप दूर हो जाता है वह स्वर्ग लोक को जाता है। ऐसा उस ब्राह्मण में लिखा है जिसको लोग उद्धृत किया करते हैं।* अब प्रश्न होता है कि जो परदेश में है वह अग्निहोत्री अपनी अग्नियों के पास कैसे समझा जाय । क्या अनुपस्थित को उपस्थित समझा जाय या वह प्रतिदिन वापिस आवे ? कुछ की राय है कि चुपचाप ( मन में अपने को उपस्थित समझ ले )। चुपचाप ही तो श्रेय की इच्छा किया करते हैं। कुछ की राय है कि वह रोज उनके पास जावे । क्योंकि जो अनुपस्थित होता है उसकी अग्नियां यजमान को अश्रद्धा से देखती हैं और भयभीत होती हैं कि कहीं यह हमको तितर-बितर न करदे । *यह कोई और ब्राह्मण ग्रन्थ प्रतीत होता है ।

पाँचवाँ अध्याय ] ४२७ इसलिये प्रति दिन उपस्थित होवे। अगर उपस्थित न हो सके तो कहे :— अभयं वो अभयं मे । “आप के लिये अभय हो। मेरे लिये अभय हो।” इस प्रकार उसके लिये भय नहीं रहता। (११) ऐतरेय ब्राह्मण की सातवीं पञ्चिका का दूसरा अध्याय समाप्त हुआ।

अध्याय ३

अध्याय ३ १३—इक्ष्वाकु वंश के वेधस राजा का पुत्र राजा हरिश्चन्द्र निस्सन्तान था। उसकी सौ पत्नियां थीं। परन्तु उसके कोई पुत्र न हुआ। उसके घर में पर्वत और नारद दो ऋषि रहते थे। उसने नारद से पूछा :— “सभी पुत्र की इच्छा करते हैं, ज्ञानी हों या अज्ञानी। हे नारद, बताओ पुत्र से क्या लाभ होता है?” नारद ने इस एक श्लोक का दस श्लोकों में उत्तर दिया :— (१) अगर पिता जीते हुये, पुत्र का मुख देख ले तो उस का ऋण छूट जाता है और वह अमर हो जाता है। (२) प्राणियों के लिये जितने पृथिवी में भोग हैं, जितने अग्नि में और जितने जलों में, उनसे भी अधिक पिता के लिये पुत्र में। ( ४२८ )

ब्राह्मणो ! पुत्र की इच्छा करो ।

तीसरा अध्याय ४२९ ( ३ ) सदा पिता लोग पुत्र के द्वारा आपत्तियों को पार करते हैं । आत्मा आत्मा से उत्पन्न होता है । पुत्र एक अच्छी तारने वाली नौका है । ( ४ ) लोग ऐसा कहते हैं कि मल-युक्त रहने, बकरी का चमड़ा पहनने या दाढ़ी मूँछ रखने या तप करने से क्या लाभ ? ( अर्थात् अविवाहित रहने से कुछ लाभ नहीं )। हे ब्राह्मणो ! पुत्र की इच्छा करो । ( ५ ) अन्न प्राण देता है, कपड़ा रक्षा करता है, स्वर्ण रूप देता है । विवाह से पशु मिलते हैं, स्त्री सखा है । दुहिता कृपा का पात्र है । परन्तु पुत्र उस लोक में भी ज्योति है । ( ६ ) पति स्त्री में गर्भ के रूप में प्रविष्ट होता है । उसमें फिर नया जन्म लेकर दसवें मास में उत्पन्न होता है । ( ७ ) स्त्री तभी "जाया" होती है जब पुरुष उसमें पुत्र होकर जनमाता है । जो बीज उसमें रक्खा जाता है वह वृद्धि पाकर उपजता है । ( ८ ) देवों और ऋषियों ने पहले उसे तेज-युक्त कर दिया, फिर देवों ने मनुष्यों से कहा कि यह अब तुम्हारी जननी है अर्थात् तुम इसके द्वारा उत्पन्न हो । ( ९ ) जिसके पुत्र नहीं उसका लोक नहीं । इसको सब पशु जानते हैं । इसलिये वहाँ मा और बहिन के साथ भी पुत्र समागम करता है । (१०) जिनके पुत्र होते हैं वे शोक रहित होकर बड़े चौड़े चकले मार्ग पर चलते हैं । पशु और पक्षी भी इस बात को जानते हैं और वे अपनी माता तक से समागम करते हैं । (१)

४३० [ सातवीं पञ्चिका १४--फिर नारद ने उससे कहा, "राजा 'वरुण के पास जाओ और कहो कि मुझे पुत्र दो। मैं उस पुत्र से तुम्हारा यज्ञ करूँगा"। उसने कहा, 'अच्छा'। वह राजा वरुण के पास गया और कहने लगा, "मुझे पुत्र मिल जाय तो मैं तेरा यज्ञ करूँ"। उसने कहा, "अच्छा"। उसके रोहित नाम का पुत्र हुआ। वरुण ने कहा, "तेरे पुत्र हो गया, तू उससे मेरा यज्ञ कर"। उसने कहा, "जब पशु दस दिन का हो जाय तो तेरा यज्ञ करूँ"। उसने कहा, 'अच्छा'। जब वह दस दिन का हो गया तब वरुण ने उससे कहा, "अब तो यह दस दिन का हो गया। अब तू इससे मेरा यज्ञ कर"। हरिश्चन्द्र ने कहा, "जब पशु के दाँत हो जाते हैं तब वह यज्ञ के योग्य होता है। इसके दाँत निकल आने दे, तब मैं इससे तेरा यज्ञ करूँगा'। उसने कहा, "अच्छा"। उसके दाँत निकल आये। तब वरुण ने कहा, "अब इसके दाँत निकल आये। यज्ञ कर"। हरिश्चन्द्र ने कहा, "जब पशु के दाँत गिर पड़ते हैं तब वह यज्ञ के योग्य होता है। इसके दाँत गिर जाने दे तब मैं तेरा यज्ञ करूँगा"। उसने कहा, "अच्छा"। अब उसके दाँत गिर गये। तब वरुण ने कहा, "इसके दाँत तो गिर गये। अब यज्ञ कर"। हरिश्चन्द्र ने कहा, "जब पशु के दाँत दुबारा जमते हैं तब वह यज्ञ के योग्य होता है। इसके दाँत फिर जम आने दे, तब तेरा यज्ञ करूँगा"। उसने कहा, "अच्छा"। अब उसके दाँत फिर जम आये। वरुण ने कहा, "इसके दाँत तो फिर जम आये। तू मेरा यज्ञ कर"। हरिश्चन्द्र ने कहा, "जब क्षत्रिय शस्त्रधारी हो जाता है तब यज्ञ के योग्य होता है। इसको शस्त्रधारी हो जाने दे, तब इससे तेरा यज्ञ करूँगा"। उसने कहा, "अच्छा"। अब वह शस्त्रधारी हो गया। तब वरुण ने कहा, "अब यह शस्त्रधारी

तीसरा अध्याय ] ४३१ भी हो गया । अब तू इससे मेरा यज्ञ कर" । उसने कहा, "अच्छा", और पुत्र को बुलाया । और उससे कहा, "जिसने तुझको मुझे दिया उसके लिये मैं तुझे यज्ञ में दूंगा" । उसने इनकार किया और धनुष लेकर चला गया और साल भर तक जंगल में फिरता रहा । (२) १५-अब वरुण ने इक्ष्वाकु की संतान अर्थात् हरिश्चन्द्र को पकड़ लिया । और उसका पेट फूल गया । इस बात को रोहित ने सुना और जंगल से गांव में आया । वहाँ इन्द्र पुरुष के रूप में मिला और उससे बोला, "हे रोहित, हमने सुना है कि जो यात्रा नहीं करता उसको श्री नहीं मिलती । मनुष्यों में रहते-रहते अच्छा आदमी भी बुरा हो जाता है । इन्द्र उसीका सखा है जो विचरता रहता है । इसलिये तू विचरता ही रह" । रोहित ने सोचा कि ब्राह्मण ने मुझसे विचरने को कहा है । इसलिए वह दूसरे वर्ष बन में विचरता रहा । जब बन से आकर वह एक गाँव में घुसा, इन्द्र ने पुरुष के रूप में उससे मिलकर कहा, "जो विचरता है उसके पैर फूलयुक्त होते हैं । उसका आत्मा फल को उगाता और काटता है और भ्रमण के श्रम से उसके सब पाप छूट जाते हैं । इसलिये तू विचरता ही रह" । रोहित ने सोचा कि ब्राह्मण ने मुझे विचरने के लिये कहा है, इस लिये वह तीसरे साल भी वन में विचरता रहा । जब वह बन से आकर गाँव में घुसने लगा तो इन्द्र ने पुरुष के रूप में मिलकर उससे कहा, "बैठे हुये का भाग्य बैठता है, खड़े हुये का खड़ा होता है । जो पड़ा रहता है उसका भाग्य भी पड़ा रहता है । जो विचरता' है उसका भाग्य भी विचरता है । इसलिये तू विचरता रह" ।

४३२ [सातवीं पञ्चिका रोहित ने सोचा कि एक ब्राह्मण ने मुझसे विचरने के लिये कहा है इसलिये वह चौथे साल भी वन में विचरता रहा । जब वह वन से आकर गाँव में घुसने लगा तो इन्द्र ने पुरुष के रूप में उससे कहा, "कलि जमीन पर पड़ा रहता है, द्वापर ऊपर मंडलाता है । त्रेता खड़ा रहता है और सत् युग चलता रहता है । इस लिये विचरता रह" । रोहित ने सोचा कि ब्राह्मण ने मुझसे विचरने के लिये कहा है इस लिये वह पाँचवें वर्ष भी वन में फिरता रहा । जब वह जंगल से आकर गाँव में घुसने लगा तो इन्द्र ने पुरुष के रूप में उससे कहा, "जो विचरता है उसको मधु और उदुम्बर का मीठा फल मिलता है । सूर्य के सौन्दर्य को देख कि विचरता हुआ ऊवता नहीं । इसलिये विचरता रह" । रोहित ने सोचा कि एक ब्राह्मण ने मुझे विचरने के लिये कहा है। इसलिये वह छठे साल विचरता रहा । वह जंगल में सुयवस ऋषि के पुत्र अजीगर्त से, जो बिना भोजन के रह रहा था, मिला । उसके तीन लड़के थे शुनः पुच्छ, शुनः शेप और शुनोलांगूल । उसने उससे कहा, 'ऋषि, मैं तुमको सौ गायें दूंगा, तुम मुझे इन पुत्रों में से एक दे दो कि मैं यज्ञ में इसके द्वारा अपने को बचा सकूँ' । अजीगर्त ने ज्येष्ठ पुत्र को लेकर कहा "इसे मत लो", माता ने कनिष्ठ के लिये यही कहा । वे दोनों बीच के शुनः शेप के लिये राजी हो गये । वह सौ गायें देकर उसको लेकर वन से ग्राम में आया । और पिता से बोला, "मैं इसके द्वारा अपने को यज्ञ की बलि से बचाऊँगा," वह वरुण के पास आकर बोला, 'मैं इसके द्वारा तेरा यज्ञ करूँगा ।" वरुण ने कहा, "अच्छा, क्योंकि क्षत्रिय से ब्राह्मण और अच्छा ।" तब वरुण ने उसको राजसूय यज्ञ की विधि

तीसरा अध्याय ] ४३३ बताई। इसी प्रकार अभिषेचन के दिन उसने पशु के बदले पुरुष को बलि किया। (३) १६-इस यज्ञ में विश्वामित्र होता था, जमदग्नि अध्वर्यु, वसिष्ठ ब्रह्मा, अयास्य उद्गाता। आरम्भ करने पर कोई ऐसा आदमी न मिला जो उसको बाँधता। सुयवस के पुत्र अजीगर्त ने कहा, "मुझे सौ गायें और दो। मैं उसको बाँधूँगा"। उसको सौ गायें और दीं। और उसने बाँध दिया। आप्री मन्त्रों का पाठ हो गया और अग्नि की परिक्रमा भी हो गई। अब उसको बध करने वाला कोई न मिला। तब सुयवस के पुत्र अजीगर्त ने कहा, "मुझे सौ गायें और दो। मैं उसका बध कर दूँगा"। उसको सौ गायें और दी गईं और वह बध करने के लिये तलवार तेज करने लगा। शुनःशेप ने देखा कि यह मुझे ऐसे मार रहे हैं मानों मैं आदमी ही नहीं हूँ। मैं अब देवताओं के पास दौड़ूँ। वह देवताओं में सबसे पहले प्रजापति के पास गया। और यह ऋचा पढ़ी :- कस्य नूनं कतमस्यामृतानाम्......(ऋ० १।२४।१) इस प्रकार पूजा करते हुये उसको प्रजापति ने कहा, "अग्नि देवों में सब से निकट है। तू उसके पास जा"। अब वह इस मंत्र से अग्नि के पास गया:- अग्नेर्वयं प्रथमस्यामृतानाम्......(ऋ० १।२४।२) इस प्रकार पूजा करते हुये उससे अग्नि ने कहा, "प्राणियों का स्वामी सविता है उसके पास जाओ।" अब नीचे के तीन मन्त्रों से सविता के पास गया:- अभित्वा देव सवितः......(३) यश्चिद्धित इत्या......(४) भगभक्तस्य ते......(५) (ऋ० १।२४।३-५) २८

४३४ [ सातवीं पञ्चिका सविता ने कहा, “तू राजा वरुण के लिये बाँधा गया है। उसी के पास जा”। उसने इन ३१ मन्त्रों (ऋ० १।२४।६-१५; १।२५।१-२१) से वरुण से प्रार्थना की। वरुण ने उससे कहा, “देवों में अग्नि मुख है। और सबसे अधिक सहृदय है। उसी की स्तुति कर। तो हम तुझको छोड़ देंगे”। तब उसने अग्नि की २२ मन्त्रों से स्तुति की (ऋ०१।२६।१-१० तथा १।२७।१-१२)। अग्नि ने कहा, “विश्वेदेवों की स्तुति कर। तब हम तुझे छोड़ेंगे”। उसने विश्वेदेवों की नीचे के मंत्र से स्तुति की:— नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यः...(ऋ० १।२७।१३) विश्वेदेवों ने उससे कहा “देवों में इन्द्र सबसे अधिक ओज वाला, बल वाला, सहन वाला और पार लगाने वाला है। उसकी स्तुति कर तब हम तुझे छोड़ेंगे”। उसने इन मंत्रों से इन्द्र की स्तुति की :— यच्चिद्धि सत्य सोमपा......आदि (ऋग्वेद के पहले मंडल का २९वाँ सूक्त और ३०वें सूक्त के पहले १५ मंत्र ) इन्द्र ने प्रसन्न होकर उसको एक सोने का रथ दिया। उसने नीचे के मंत्र से इसे स्वीकार किया:— शश्वदिन्द्रः.........(ऋ० १।३०।१६) तब इन्द्र ने उससे कहा “अश्विनों की स्तुति कर। तब हम तुझे छोड़ेंगे”। उसने अगले तीन मंत्रों से अश्विनों की स्तुति की।

.तीसरा अध्याय ] ४३५ आश्विना वश्वा......(१७) समानयाजनो हि वां......(१८) न्यध्र्यस्य मूर्धनि......(१६) (ऋ० १।३०।१७-१९ । अश्विनों ने उससे कहा, "तू उषा की स्तुति कर। तब हम छोड़े गे"। उसने अगले तीन मंत्रों से उषा की स्तुति की। कस्त उषः कधप्रिये......(२०) वयं हिते अमन्मह्या......(२१) त्वं त्येभिरा गहि......(२२) (ऋ० १।३०।२०-२२) उसके एकाएक मंत्र पढ़ने पर उसके बंधन खुलते गये और ऐक्ष्वाक का पेट पटकता गया। जब वह अन्तिम मंत्र पढ़ चुका तो अन्तिम बंधन टूट गया और हरिश्चन्द्र स्वस्थ हो गया ।(४) १७—अब ऋत्विजों ने शुनःशेप से कहा, "अब तू हममें से ही है। आज के यज्ञ में भाग ले"। अब शुनःशेप ने “अंजः सव” अर्थात् सोमरस निकालने की विशेष विधि को निकाला। और नीचे की चार ऋचाओं द्वारा सोम रस निकालाः— यच्चिद्धि त्वं गृहेगृह उलूखलक युज्यसे । इह द्युमत्तमं वद जयतामिव दुन्दुभिः ॥५॥ उत्तस्मते वनस्पते......(६) आयजी वाजसातमा......(७) तानो अद्य वनस्पती......(८) (ऋ० १।२८।५-८) और नीचे के मंत्र से उसे द्रोणकलश में रक्खाः—