भारतकोश
ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

ऐतरेय ब्राह्मण (ऋग्वेद - हिन्दी अनुवाद सहित)

Rigvediya Aitareya Brahmana with Hindi Translation

महिदास ऐतरेय / पं. गंगाप्रसाद उपाध्याय द्वारा

स्रोत: हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished592 पृष्ठ

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४२० [ सप्तम पञ्चिका या 'अग्नये व्रतभृते स्वाहा' से आहवनीय में घी की एक आहुति दे दे । यही उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि यदि अग्निहोत्री उपवास के दिन व्रत के विरुद्ध कोई कार्य्य करे तो उसका प्रायश्चित्त क्या है ? वह 'अग्नि व्रतपति' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनाये । उसका याज्य मंत्र यह है :— त्वमग्ने व्रतपा असि...( ऋ० ८।११।१ ) अनुवाक्य यह है :— यद्बो वयं प्रमिनाम व्रतानि...( ऋ० १०।२।४ ) या केवल 'अग्नये व्रतपतये स्वाहा' से आहवनीय में घी की आहुति दे देवे । यही उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न यह है कि यदि अग्निहोत्री अमावस्या या पूर्ण- मासी का यज्ञ छोड़ जावे तो इसका क्या प्रायश्चित्त है । वह 'अग्नि पथिकृत' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे । इसका याज्य मंत्र यह है :— वेत्था हि वेधो अध्वनः ( ऋ० ६।१६।३ ) अनुवाक्य यह है :— आ देवानामपि पंथा अगन्म...( ऋ० १०।२।३ ) या केवल 'अग्नये पथिकृते स्वाहा' से आहवनीय में घी की एक आहुति देवे । यही उसका प्रायश्चित्त है । अब प्रश्न है कि यदि किसी अग्निहोत्री की तीनों अग्नियां बुझ जावें तो उसका क्या प्रायश्चित्त है ? वह 'अग्नि तपस्वत् जनद्वत् पावकवत्' के लिये आठ कपालों का पुरोडाश बनावे । उसकी याज्य आहुति यह है :— आयाहि तपसा जनेषु ( आश्व० ३।११ ) अनुवाक्य यह है :— आ नो याहि तपसा जनेषु ( आश्व० ३।११ )